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Success Stories: एक साल की उम्र में हुआ पोलियो, फिर मां-बाप हो गए अलग; संघर्षों को मात देकर अब देश के लिए जीत रहे मेडल

तस्वीरों में जिस युवा को हाथों में बहुत सारे मेडल थामे देख रहे है. इस युवा खिलाड़ी का नाम यश कुमार है. यश कुमार 25 वर्ष ...अधिक पढ़ें

रिपोर्ट :- हरिकांत शर्मा

मंजिलें उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है,पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है… जी हां, सफलता किसी के हाथ और पैरों की मोहताज नहीं होती, बल्कि उसे पाने के लिए हौसलों में दम होना जरूरी है. यहां हम एक ऐसे ही युवा की कहानी बताने जा रहे हैं, जिन्होंने अपनी शारीरिक कमियों के बदले अपने जज़्बे, जुनून और हौसलों से अपने सपनों को आकार दिया और सफलता की एक नई कहानी लिख डाली. तस्वीरों में जिस युवा को हाथों में बहुत सारे मेडल थामे देख रहे है. इस युवा खिलाड़ी का नाम यश कुमार है. यश कुमार 25 वर्ष के हैं और आगरा के दयालबाग ,अगन बाग के रहने वाले हैं.

बचपन में जब यश कुमार 1 साल के थे, तब उन्हें पोलियो हो गया था. पोलियो की वजह से कमर के नीचे के हिस्सा ने काम करना बंद कर दिया. अपने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे. बड़े संघर्ष से निकलकर यश अब पैरा कैनो एथलीट हैं . उन्होंने मार्च के महीने में हुई एशियन चैंपियनशिप थाईलैंड में सिल्वर और ब्रॉन्ज मेडल जीता है. वर्ष 2019 में वर्ल्ड चैंपियनशिप जोकि हंगरी में खेला गया था .उस प्रतियोगिता में यश ने पांचवा स्थान हासिल किया. यश आगरा के साथ साथ देश का नाम भी रोशन कर रहे है. सुनिए यश कुमार के संघर्षों की कहानी खुद उनकी ज़ुबानी.

संघर्षों में बीता बचपन
यश कुमार बताते हैं कि जब महज 1 साल के थे तब उन्हें पोलियो हो गया था. पोलियो की वजह से कमर के नीचे का हिस्सा काम करना छोड़ गया.जैसे-जैसे यश बड़े होते गए उनके सामने कई सारी चुनौती आने लगी .शारीरिक रूप से अक्षम होने की वजह से यश को घ्रणित भाव से देखा जाने लगा. लोग ताने मारते थे कि कुछ नहीं कर पायेगा. उसकी दिव्यांगता का मजाक उड़ाया गया. मुश्किल हालातों ने यश का पीछा यही तक ही नहीं छोड़ा, इससे एक कदम आगे जब यश 3 साल के थे तब उनके माता-पिता एक दूसरे से अलग हो गए. यश का बचपन बेहद मुश्किल हालातों में बीता है. लेकिन चारों तरफ निराशा में रहने वाले यश को हमेशा से लगता था कि वह ऐसी जिंदगी जीने के लिए नहीं बने हैं. उन्होंने ठाना कि अपने दम पर अपना नाम कमाना है. मेहनत की और पैरा कैनोएथलीट बने. यस अब देश विदेशों में पैरा कैनोचैंपियनशिप में भाग लेते है.

आपके शहर से (आगरा)

बिना संसाधनों के 2019 की पैरा कैनो की शुरुआत
यश कुमार बताते हैं कि खासकर पूरे उत्तर प्रदेश में पैरा कैनोकी ट्रेनिंग के लिये कोई अनुकूल व्यवस्था नहीं है. उन्होंने 2019 में पैरा कैनोकी ट्रेनिंग शुरू की थी. उनके पास खुद की अपनी वोट तक नहीं थी. उन्हें पता चला कि एमपी के भिंड में कोई पैरा कैनोखेल की ट्रेनिंग कराता है, तो यश ट्रेंनिग के लिये भिंड चले गए. महज 3 महीने की ट्रेनिंग के बाद वर्ल्ड चैंपियनशिप हंगरी में खेलने गए. जहां पर उन्होंने पूरे विश्व के खिलाड़ियों की स्पर्धा में पांचवां स्थान प्राप्त किया. इस पूरी प्रतियोगिता में अलग-अलग 36 देशों के खिलाड़ी हिस्सा लेने आए थे .इसके बाद उन्होंने 2020 में नेशनल चैंपियनशिप में 1 गोल्ड और सिल्वर जीता. 2021 में कोविड-19 आ गया और ठीक से ट्रेनिंग को समय नही मिला. इस वजह से वह भोपाल में आयोजित हुई प्रतियोगिता में गोल्ड पर निशाना लगाने से चूक गए. हालांकि इस प्रतियोगिता में उन्होंने सिल्वर मेडल जीता था.

आर्थिक चुनौतियां है सामने
यश की पारिवारिक स्थिति शुरू से ही ठीक नहीं है. मां-बाप बचपन से ही अलग रहने लगे थे .ऐसे में उनके लालन-पालन से लेकर उनके निजी खर्चों के लिए बेहद संघर्ष का सामना करना पड़ता था. ऐसे हालातों में उनके ताऊ और ताई उनके लिए सहारा बने .उनके ताऊ दुर्ग विजय सिंह ऑल इंडिया रेडियो से रिटायर्ड हैं. जबकि उनके ताई गायत्री देवी हिंदी की टीचर है. मुश्किल हालातों में यह दोनों शक़्स यश की हिम्मत बने. कई बार ऐसा होता था कि उन्हें अपने निजी खर्चे पर इवेंट के लिए जाना पड़ता था .कई बार पैसे ना होने की वजह से चैंपियनशिप छूट गयी.

दिव्यांग खिलाड़ी न हारे हिम्मत
यश का सपना है कि वे भारत के लिए ओलंपिक में मेडल लेकर आएंगे और आगरा समेत हिंदुस्तान का नाम पूरे विश्व में रोशन करेंगे. यश दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए कहते हैं कि वह हिम्मत हार के सरकार के भरोसे ना बैठे. सरकार की तरफ से दी जाने वाली सुविधाएं नाममात्र है. खुद उनको अभी तक सरकार की तरफ से कोई अनुदान नहीं मिला. इसलिए दिव्यांग खिलाड़ी अपने आप को किसी से कम नहीं समझे. क्या हुआ कि वह शारीरिक रूप से अक्षम है. लेकिन अपनी मेहनत के बदौलत वह अपनी अलग पहचान बनायेंगे.

Tags: Medal

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