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जानिए क्यों UP के इस गांव में दूध बेचना अभिशाप है!

जानिए क्यों UP के इस गांव में दूध बेचना अभिशाप है!

फोटो: न्यूज18 फोटो

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कुआं खेड़ा गांव की आबादी लगभग 7,000 हैं और लगभग हर घर में एक गाय जरूर है. गांव वालों के मुताबिक, यहां एक दिन में दुग्ध उत्पादन 30,000 लीटर के आस-पास होता है.

    यूपी में आगरा के कुआं खेड़ा गांव में अधिकतर लोग जानवर तो पालते हैं, लेकिन यहां के लोग आसपास के गांवों में दूध बांट आते हैं या फिर दान कर देते हैं. जाटव समुदाय की बहुलता वाले इस गांव में दूध बेचना अशुभ माना जाता है. कहते हैं इस गांव में लोगों ने सैकड़ों सालों से दूध नहीं बेचा है. इनका मानना है कि जिसने भी दूध बेचने की कोशिश की है, उसने नुकसान ही उठाया है. कई बार तो गाय मर जाने की भी खबर आई है.

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    कुआं खेड़ा गांव की आबादी लगभग 7,000 हैं और लगभग हर घर में एक गाय जरूर है. गांव वालों के मुताबिक, यहां एक दिन में दुग्ध उत्पादन 30,000 लीटर के आसपास होता है. न्यूज18 से बातचीत में कुआं खेड़ा के ग्राम प्रधान राजेंद्र सिंह यादव कहते हैं, 'हम दूध या तो किसी जरूरतमंद को दे देते हैं या फिर आपस में बांट लेते हैं. लेकिन हम लोग दूध को बेचते नहीं हैं, क्योंकि हमारे यहां इसे अशुभ माना जाता है. कुआं खेड़ा के प्रधान का दावे के साथ कहना है कि हमने सैकड़ों सालों से दूध नहीं बेचा है और जिसने भी दूध बेचने की कोशिश की है, उसने नुकसान ही उठाया है. कई बार तो गायों मरने की घटना हो चुकी है.

    कुआ खेड़ा के ग्राम प्रधान राजेंद्र सिंह यादव की फोटो


    राजेंद्र बताते है कि यह परंपरा सैंकड़ों सालों से चली आ रही है. गांव के किसी भी व्यक्ति ने दूध बेचने की कोशिश नहीं की. वहीं, आसपास के गांवों के लोग डेयरी बिजनस से अच्छी-खासी कमाई कर रहे हैं. वे गांवों और शहरों में दूध और अन्य प्रोडक्ट बेचते हैं. दूसरी तरह कुआं खेड़ा के निवासी दूध दान करने में गर्व महसूस करते हैं.

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    कुआं खेड़ा गांव के विकास के लिए निरंतर प्रयास करने वाले ग्राम प्रधान राजेंद्र सिंह यादव ने कहा, हम लोग गांव में पशुओं से मिलने वाले दूध को छाछ, मक्खन और दही के लिए इस्तेमाल करते है. इसके बाद जो दूध बचता है उसको गांव के बाहर से आने वाले लोगों को मुफ्त में बांट दिया जाता है. वहीं दूसरे गांव में किसी लड़की के शादी होने पर दूध फ्री में देते है.

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    गांव के इतिहास के बारे में बताते हुए राजेंद्र कहते है कि यहां के रहने वाले 7 पीढ़ी के लोग आज तक दूध नहीं बेचा. इस गांव में कई लोग अन्य व्यवसायों से कमाई करते हैं. दूध बांटने या दान करने से आजीविका पर कोई संकट नहीं आता है बल्कि इससे सामाजिक एकता और बढ़ती है.

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