MISSION PAANI: पानी संकट से घबराने की नहीं जल संरक्षण के लिए यज्ञ में आहुति देने की जरूरत

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Updated: August 27, 2019, 10:39 PM IST
MISSION PAANI: पानी संकट से घबराने की नहीं जल संरक्षण के लिए यज्ञ में आहुति देने की जरूरत
Bada-Talab

जल संचयन (Water Conservation Campaign) की तकनीकी और प्रबंधन पर अध्ययन और मध्ययुगीन काल में कृषि (Agriculture) के पैटर्न में परिवर्तन अभी भी काफी आकर्षक है. मध्ययुगीन भारत के विद्वानों द्वारा किए गए अध्ययन (Research) सामान्य प्रकृति के हैं. जल संकट (Water Crisis In India) की गंभीरता और विकटता से जूझने और समाधान का मार्ग तलाशने तथा लोगों में जागरुकता लाने के लिए हमें अपने अतीत के जल-विरासत संरक्षण उपायों तथा तकनीकों की ओर लौटना होगा.

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(डॉ. जिब्राईल) 

‘सीखो उन पुरखों से जिन्होंने पानी (Water) के साथ कभी मनमानी नहीं की’, यह अनुपम मिश्र जी (Anupam Mishra Environmentalist) के शब्द हैं. यह शब्द शत-प्रतिशत सत्य हैं कि जल, प्रत्येक जीवित वस्तु और मनुष्यों के लिए सदैव आवश्यक रहा है. इंसान अपने अथक प्रयासों से इसे प्राप्त करने के लिए हमेशा से प्रयासरत रहा है. जल से उत्पन्न जीवन एक सार्वभौमिक रूप से स्वीकार्य सत्य है और सभी जीवित प्राणियों का अस्तित्व प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जल की प्राप्ति पर निर्भर है. आम तौर पर यह माना जाता है कि जल सामान्य रूप से विश्व (WORLD) में बहुत सीमित हो चुका है, पर भारत (INDIA) तथा विश्व के रेगिस्तानों में विशेष रूप से ’थार तथा सहारा के रेगिस्तानों’ में इसकी कमी सोचनीय और विचारयोग्य है. इसलिए, विशेष रूप से रेगिस्तानी क्षेत्र में सिंचाई के लिए पानी का उपयोग प्रारंभ से ही कल्पना से परे था, लेकिन हमने अपने सर्वेक्षण के दौरान देखा कि ‘थार रेगिस्तान’ के कर्मठ लोगों ने अपने प्रयासों द्वारा इसे संभव बना दिया. मनुष्य ने पीने के लिए और अन्य रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी सतत गतिविधियों हेतु जल प्राप्त करने के लिए अपने सबसे कठिन प्रयासों का निवेश किया.

भूवैज्ञानिकों का तर्क है कि जल, पृथ्वी पर सबसे मूल्यवान और नवीकरणीय प्राकृतिक संसाधन है. जल पौधों, जानवरों और मनुष्यों के जीवन को बनाए रखता है. पृथ्वी पर शुद्ध जल की कुल मात्रा मानव आबादी की सभी आवश्यकताओं को पूरा कर सकती है, जो कि विश्व के लगभग तीन चौथाई क्षेत्र में विस्तारित है. विश्व की आधी आबादी को अपने अस्तित्व के लिए भूजल पर निर्भर माना जाता है. भारत में कृषि, औद्योगिक और घरेलू क्षेत्र की जल आवश्यकताओं को पूरा करने में भूजल की एक महत्वपूर्ण भूमिका है. भारतीय संदर्भ में एक बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधन के रूप में इसका महत्व इस तथ्य से समझा जा सकता है कि 85 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण घरेलू जल आवश्यकताओं, 50 प्रतिशत शहरी जल आवश्यकताओं और 50 प्रतिशत से अधिक सिंचाई आवश्यकताओं को भूगर्भीय जल संसाधनों से पूरा किया जा रहा है.

30 करोड़ से अधिक लोगों को पेयजल का संकट

21वीं शताब्दी के दूसरे दशक में, 30 करोड़ से अधिक लोग भारत के विभिन्न क्षेत्रों में पेयजल की प्राप्ति हेतु संघर्ष कर रहे हैं. राजस्थान में विस्तारित रेगिस्तान के लोग सैकड़ों वर्षों से इस कठिन समस्या का सामना करते रहे हैं. पेयजल के साथ-साथ दैनिक कार्यों की पूर्ति हेतु वांछनीय पर्याप्त जल की अनुपलब्धता भारत के सामने आने वाली सबसे बड़ी समस्याओं में से एक रही है. वर्षा जल के कृषि उपयोग से अधिकांश व्यर्थ होने वाले जल की कमी का एक विश्वसनीय समाधान किया जा सकता है. यदि समय पर जल का संरक्षण नहीं किया गया तो धीरे-धीरे जल का स्तर घटता जाएगा और भविष्य में अपरिवर्तनीय प्रतिकूल परिस्थितियों का निर्माण होगा.

पीएम मोदी पानी बचाने के अभियान को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने वाले हैं


भारत के एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र द हिंदू ने ‘इंडियाज वेल्स आर ड्राइंग अप’ के शीर्षक के तहत एक रिपोर्ट 2017 में प्रकाशित की थी. इस समाचार पत्र के मुताबिक सम्पूर्ण भारत में सन 2017 में, 2006-2016 की तुलना में कुओं में जल की औसत गिरावट 61 प्रतिशत दर्ज की गई. यह जानकारी यह भी स्पष्ट करती है कि सर्वेक्षण किए गए 27 राज्यों में से 19 में (मिजोरम, मणिपुर, नागालैंड और सिक्किम का सर्वेक्षण नहीं किया गया था), कुओं में भूजल का स्तर 50 प्रतिशत से अधिक गिर गया. शेष राज्यों में यह 50 प्रतिशत से भी अधिक गिर गया है. इस तथ्य से आसानी से समझा जा सकता है कि किस प्रकार भूजल स्तर में गिरावट आ रही है.
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पुराने समय में नदी, नाले और तालाब पर विशेष ध्यान था
पूर्वकाल में प्रत्येक तालाब के पायतन (आगोर) के रखरखाव के लिए विशेष ध्यान दिया जाता था. पुराने तालाबों में आज जो तालाब जीवित हैं वे वर्तमान में भी मानव और पशु आबादी के लिए पानी के मुख्य स्रोत की भूमिका निभा रहे हैं. कई पुरा-दस्तावेजों के अध्ययन और सर्वेक्षण के दौरान तथा जानकार व्यक्तियों और बुजुर्गों से मुलाकात से यह पता चला कि मध्यकाल के दौरान राजस्थान के रेगिस्तानी लोगों ने जल को संजोने के लिए कुशल योजना बनाई थी और इसके अंतर्गत कई जल निकायों जैसे - तालाब, तलाई, कुआं, बावड़ी, झालरा व नालों का निर्माण करवाया. अधिकांशतः इन जल-निकायों को विभिन्न राजाओं, रानियों, धनिक व्यापारियों और अन्य द्वारा विकसित किया गया और उन्हें उनके नाम या उनके द्वारा निर्मित किया गया है.

आने वाले समय में जिस तरीके से पीने के पानी की किल्लत पूरॆ देश में शुरू हो रही है, देश के कई हिस्सो में या तो सूखा पड़ रहा है या भूजल स्तर नीचे जा रहा है उससे पूरा देश संकट में हैं .


उदाहरण के लिए जैसलमेर में गडसीसर तालाब, फलोदी में रानीसर तालाब और सेठ सांगिदास का कुआं, बीकानेर में लक्षेश्वर बावड़ी और आचार्यों का कुआं, अलवर में सूरजकुंड, (उक्त सभी जल संरचनाएं राजस्थान से सम्बद्ध हैं); पालम बावड़ी और कई नदियां (हरियाणा से सम्बद्ध है); तालाब, कुएं और नदियां (सभी बिहार से); विजयसागर, कल्याणसागर, मदनसागर, जौहरकुंड सागर ताल, कटोराताल (सभी मध्यप्रदेश से सम्बद्ध है); शाही पुल, काशी घाट, हम्माम, हौज-ए-खास और अटाला मस्जिद हौज (सभी निकाय उत्तर प्रदेश से सम्बद्ध है); और कई विद्युत उत्पादन परियोजनाएं (उत्तराखंड से सम्बद्ध है) इत्यादि. उक्त क्षेत्रों में स्थित कुछ तालाब आज भी अपनी पहचान को बनाए रखे हुए हैं.

राज्य सरकार से समय-समय पर वित्तीय सहायता भी मिलती है
कुछ जलीय इकाइयों को उनके मरम्मत कार्य हेतु राज्य सरकार से समय-समय पर वित्तीय सहायता भी मिलती है, लेकिन उनमें से अधिकतर अनियोजित आधुनिकीकरण और शहरीकरण की वजह से अच्छी स्थिति में नहीं हैं. जल निकायों, विशेष रूप से तालाबों के पायतन क्षेत्रों पर कुछ प्रभावशाली स्थानीय लोगों द्वारा अतिक्रमण कर लिया गया है या विभिन्न उद्योगपति इन तालाबों के पायतन (आगोर) क्षेत्र में नए उद्योग स्थापित करने में संलग्न हैं.

दैनिक जागरण से एक साक्षात्कार में प्रतिष्ठित और जाने-माने विद्वान प्रोफेसर इरफान हबीब ने आगोर क्षेत्र के कम होने और धीरे-धीरे जलीय संरचनाओं के पतन की ओर अग्रसर होने पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि इनके पीछे मुख्य कारण आधुनिकीकरण और शहरीकरण है.

जलीय इकाइयों को उनके मरम्मत कार्य हेतु राज्य सरकार से समय-समय पर वित्तीय सहायता भी मिलती है


नदी, तालाब का उपयोग जानवर भी करते हैं
कई जल निकाय आज भी जीवित हैं और तालाब के जल का उपयोग अभी भी किया जा रहा है, लेकिन विशेष रूप से स्थानीय आबादी द्वारा इस जल का बहुधा उपयोग जानवरों और अन्य उद्देश्यों के लिए ही किया जा रहा है. तालाबों के पायतन क्षेत्र को कम या ज्यादा नष्ट कर दिया गया है और इसके आगोर में आवासीय भवनों का निर्माण कर दिया गया है. इसलिए सर्वेक्षण किए गए क्षेत्रों के मौजूदा जल निकायों में से अधिकांश सूख गए हैं या बहुत बुरी स्थिति में हैं. भारत के किलों में भी अच्छी जल संचयन प्रणाली और किलों के स्मारकों के अंदर जल की आपूर्ति है. आम तौर पर, किला परिसरों के अंदर, कुओं का इस्तेमाल विभिन्न इमारतों को पानी की आपूर्ति के लिए किया जाता था. हालांकि, इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु कुछ किलों में खूबसूरत बावड़ी का उपयोग भी किया जाता था. ऐसे किले देश के कई शहरों में देखे जा सकते हैं जैसे- राजस्थान में अहिछत्रगढ़, मेहरानगढ़, आम्बेर या आमेर, दिल्ली में लालकिला, जौनपुर में बना सल्तनत काल का किला इत्यादि.

सिंचाई और कृषि उत्पादन के लिए जल अनिवार्य है. मध्ययुगीन भारत में प्रयुक्त होने वाली कृषि प्रौद्योगिकी पिछले कुछ दशकों के दौरान विद्वानों के ध्यान में आ गई है. क्षेत्र सिंचाई के उद्देश्य के लिए जल संचयन की तकनीकों और प्रबंधन पर अध्ययन और मध्ययुगीन काल में कृषि के पैटर्न में परिवर्तन अभी भी काफी आकर्षक है. मध्ययुगीन भारत के विद्वानों द्वारा किए गए अध्ययन सामान्य प्रकृति के हैं. प्रोफेसर इरफान हबीब अपने महान कार्य में भारतीय कृषि के एक महत्वपूर्ण पहलू के रूप में ‘कृत्रिम सिंचाई’ के महत्व पर जोर देते हैं. भारत एक विशाल देश है और विभिन्न क्षेत्रों के किसानों द्वारा कई तरह की सिंचाई पद्धतियों को नियोजित करता है. हालांकि, अब क्षेत्रीय स्तर पर सिंचाई प्रौद्योगिकी की जांच करना उचित है.

अध्ययन में भी जल संचयन पर जोर दिया गया है
यदि एक विचार भारत को ‘हाइड्रोलिक सभ्यता’ के रूप में दर्शाता है, तो दूसरा मानता है कि सिंचाई ने अतीत में प्रशासन की एक महत्वपूर्ण शाखा बनाई और कुछ उल्लेखनीय सिंचाई परियोजनाएं प्राचीन और मध्ययुगीन भारत के शासकों द्वारा प्रारम्भ की गईं. हालांकि, प्रोफेसर एचसी वर्मा के अपने कार्यों में से एक का तर्क है कि अठारहवीं शताब्दी तक देश में शायद ही कभी ‘कृत्रिम सिंचाई’ थी. यह केवल उन्नीसवीं शताब्दी (1866) में कृत्रिम सिंचाई के माध्यम से कृषि क्षेत्र में वृद्धि और सुधार के संबंध में ए न्यू पॉलिसी के अंतर्गत लॉर्ड लॉरेंस द्वारा शुरू की गई थी जिसके कारण उत्तरी भारत में हजारों मील की दूरी तक चलने वाली नई बड़ी नहरों का खुलना शुरू हुआ. जिसने भारत में सामान्य तौर पर और पंजाब में विशेष रूप से जहां कॉलोनी कैनाल्स ने स्वयं एक वर्ग बनाया.

Jal Shakti Minister Gajend Singh Shekhawat-जलशक्ति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत
जलशक्ति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत। फाइल फोटो


लेकिन, साहित्यिक, पुरातात्विक आंकड़ों और सर्वेक्षण के अध्ययन ने यह सिद्ध कर दिया है कि सूखे क्षेत्र में ‘कृत्रिम सिंचाई’ विशेषतः मरुस्थलीय राजस्थान में पालीवाल ब्राहमणों द्वारा मध्ययुग के पूर्वार्द्ध व उत्तरार्द्ध काल में सिंचाई के लिए एक तकनीक ‘खड़ीन’ के रूप में ईजाद की थी, यहां तक कि इस व्यवस्था को उन्होंने आज भी जिंदा रखा हुआ है. जिसके प्रयोग से खेती की जा रही है. इससे लोगों को जागरूक करने की आवश्यकता है.

जाने-माने पर्यावरणविद अनुपम मिश्र जल संचयन पर सर्वे कर चुके हैं
अनुपम मिश्र द्वारा कुएं और तालाबों पर एक पत्रकारिता के दृष्टिकोण से लेकिन उपयोगी सर्वेक्षण किया जा चुका है. उनका सर्वेक्षण मुख्य रूप से साक्षात्कार के रूप में मौखिक साक्ष्यों पर आधारित रहा है. उन्होंने रेगिस्तानी क्षेत्र में कुओं और तालाबों के निर्माण की तकनीकों और विधियों के बारे में जानकारी दी. विभिन्न भौगोलिक और स्थलाकृतिक परिस्थिति में किसानों के प्रयासों के स्तर को समझने के लिए विभिन्न क्षेत्रों के सिंचाई कार्यों का व्यवस्थित भौतिक सर्वेक्षण करना आवश्यक है.

राजस्थान के शुष्क क्षेत्र में, जल संचयन यहां के सामाजिक व्यवस्था की जड़ों में गहराई तक समाया हुआ है. अनिल अग्रवाल और सुनीता नारायण ने सर्वेक्षण किया और लगभग छह सौ गांवों से जानकारी एकत्र की, और पाया कि वहा के जागीरदार या राजस्व संग्रहकर्ता ने वहां के लोगों के लिए किसी प्रकार के जल निकाय का निर्माण नहीं करवाया था. पूर्व में निर्मित प्रायः सभी जल निकायों को पूर्ववर्ती राजाओं, जागीरदारों और सरदारों द्वारा उनके व्यक्तिगत उपयोग के लिए आरक्षित किया गया था. लोगों को मोटे तौर पर उनके लिए झुकना पड़ा. उदाहरण के लिए, जोधपुर के मेहरानगढ़ किले के भीतर स्थित रानीसर झील राज परिवार के उपयोग के लिए आरक्षित थी. लेकिन निकटवर्ती पदमसर झील का जल स्थानीय जनसंख्या द्वारा उपयोग किया जाता था. स्थानीय लोगों ने भी कई जल निकायों का निर्माण किया था.

राजस्थान में, विभिन्न पारंपरिक जल संसाधन प्रणाली जैसे कि नदी, तालाब, कुआं, जोहड, बंधा, सागर, समंद और सरोवर. ये सब कहने के लिए नाम है, लेकिन इनमें से प्रत्येक एक निश्चित प्रणाली है. यह भी ध्यान देने योग्य है कि राजस्थान में और देश के अन्य हिस्सों में इस तरह की प्रणालियां हमेशा से प्रचलित रही है. इसी कड़ी में हरियाणा राज्य को भी उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है, जिसके बारे में जलपुरुष श्री राजेन्द्र जी ने अपने एक वक्तवय में यह बताया कि हरियाणा में तीन प्रकार के जोड़े (जोहड़) देखे जा सकते हैं, (1) ऐसा जोड़ा जो पानी इकट्ठा करके सिर्फ पीने के लिए प्रयोग में आता था, (2) ऐसा जोड़ा जो पानी इकट्ठा करके खेती करने के काम में आता था, तथा (3) ऐसा जोड़ा जो बिल्कुल गन्दे पानी को इकट्ठा करने में प्रयोग होता था. इन्होने यह भी बताया कि हरियाणा में कुछ जोहड़ का पानी बिल्कुल मीठा होता था.

हरियाणा में कुछ जोहड़ का पानी बिल्कुल मीठा होता था.


लोगों को लोक कल्याण के काम करने चाहिए
एक प्रमाण के रूप में, अठारहवीं शताब्दी के उर्दू के एक लोकप्रिय कपलेट में जल निकायों और स्मारकों के निर्माण के संबंध में मोहम्मद अफजल खान ने अपने आलेख में लिखा है कि 'नाम मंजूर है तो, फैज के असबाब बना, पुल बना चाह, मस्जिद और मेहराब बना' (यदि आप अपने नाम को कायम रखना चाहते हैं तो लोक कल्याण के लिए चीजें बनाएं; पुल बनाएं, कुएं खुदवाये और मस्जिदों और मेहराबों का निर्माण करें)

यह सत्य है कि प्राचीन काल से ही हर शासक अपने-अपने तरीके से जलापूर्ति के लिए कार्य किए हैं. इसी प्रकार क्षेत्रीय राजाओं ने भी इन कार्यों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते रहे हैं. इसी कड़ी में इस समय वर्तमान सरकार ‘जल शक्ति मन्त्रालय’ के रुप में नए मंत्रालय का गठन किया है जब इसकी आवश्यकता है, क्यों कि आज भारत ही नहीं बल्कि पूरा विश्व पानी की किल्लत से जूझ रहा है.

 

News18 के अभियान मिशन पानी की लॉन्चिंग के दौरान अभिनेता अमिताभ बच्‍चन.


जल संकट की गंभीरता और विकटता से जूझने और समाधान का मार्ग तलाशने तथा लोगों में जागरूकता लाने के लिए हमें अपने अतीत के जल-विरासत संरक्षण उपायों तथा तकनीकों की ओर लौटना होगा. हमें अपने पारम्परिक जल स्रोतों यथा- सर-सरोवर, झरने, तालाब, कुएं, बावड़ियां तथा कुंड पुनर्जीवित और संरक्षित करने होंगे और वर्षा जल के संचय को सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान करनी होगी. जिस प्रकार राजस्थान सदा से ही जल संरक्षण उपायों को अपनाने में अग्रणी रहा है. गांव-गांव में बने टांके, नाडी, जोहड़, जैसलमेर व जोधपुर क्षेत्र में वर्षा जल संग्रहण के लिए खड़ीन का प्रयोग, तालाब, झीलों, बावड़ी, कुंई (बेरी) एवं झालरा आदि के माध्यम से जल-प्रबंधन को यहां हमेशा से बखूबी सम्पादित किया जाता रहा है. आवश्यकता है कि हम अपनी इन पारंपरिक जल प्रणालियों की महत्ता तथा उपादेयता को पुनर्जीवित व पुनर्स्थापित करें. अपनी ऐतिहासिक स्रोत-सामग्री का उपयोग कर इस बारे में शोध को वरीयता प्रदान करें, जिससे हम स्वयं को तथा अपने वर्तमान और भविष्य को जल-संकट की विभीषिका से राहत प्रदान करने में सक्षम हो सकें.

जल समस्या के लिए कई उपाए करने की जरूरत है
जल समस्या के समाधान हेतु निम्नलिखित प्रयास करने आवश्यक है-(1) सर्वप्रथम जल का आवश्यकतानुसार प्रयोग करने और इसकी उपयोगिता के बारे में प्रचार कर जनजागृति लाने हेतु ठोस कदम उठाने चाहिए. (2) जल प्रबन्ध हेतु वर्षा का पानी का संचय करने के लिए घरों में अधिकाधिक ‘टांको’ का निर्माण किया जाए. (3) खेतों में ‘खड़ीन’ बनाकर पानी को रोका जाए और नदियों के पानी को ‘एनीकट’ बना कर रोका जाए, जिससे भूमिगत जल स्तर बढ़ेगा. पानी के नियंत्रण हेतु प्रयास किए जाएं. इसके लिए घरों में पानी के सही मीटर लगाए जाएं, इससे पानी व्यर्थ में खर्च होने की रोकथाम होगी.(4) धार्मिक स्थलों पर प्रयोग होने वाले जल का सदुपयोग किया जाए. उदाहरणार्थ जल संकट से निपटने के लिए मध्यप्रदेश से मुस्लिम समाज ने एक प्रेरक पहल किया जिसके तहत ‘वज़ू’ (नमाज़ पढ़ने से पहले शारीरिक स्वच्छता हेतु हाथ-मुंह धोने की क्रिया) के लिए प्रयोग होने वाला पानी ड्रेनेज के बजाय ज़मीन में उतारने की तयारी है. जिसे ‘वाटर हार्वेस्टिंग’ कहा जाता है. इसी प्रकार इस आर्टिकल के लेखक ने भी अपने पैत्रिक गांव मलूकपुर, जिला जौनपुर (उ.प्र.) में वजू के पानी के लिए ‘वाटर हार्वेस्टिंग’ का प्रयोग किया.

भूवैज्ञानिकों का तर्क है कि जल, पृथ्वी पर सबसे मूल्यवान और नवीकरणीय प्राकृतिक संसाधन है


इसके साथ ही जलाशयों और नदी-नालों का पानी दूषित होने से बचाया जाओ. पानी के वाष्पीकरण की रोकथाम करने हेतु उपाय किए जाएं. पानी का प्रयोग बाग-बगीचों में, भवन-निर्माण कार्यों और फैक्ट्रियों में अधिक होता है और इसमें पेयजल का ही उपयोग किया जाता है. इसके लिए अलग से साधारण पानी की व्यवस्था करना अपरिहार्य है. बड़े बगीचों में कुएं भी खोदे जा सकते है. हमारे जो परम्परागत स्रोत रहे हैं उनके रख-रखाव की व्यवस्था आवश्यक है, जिससे उनका उपयोग भी साथ में किया जा सके. अपरोक्ष रूप से जुड़ा एक मुद्दा भ्रष्टाचार भी है. सरकार जल संकट की समस्या के समाधान हेतु बड़ी धनराशि खर्च करती है परंतु भ्रष्टाचार के कारण योजनाएं फलीभूत नहीं होती. बांध, एनीकट और खड़ीन कमजोर निर्माण के कारण टूट जाते हैं और करोड़ों की योजनाएं पानी में बह जाती हैं. इसकी रोकथाम हेतु कारगर उपाय करने चाहिए.

सरकारी और गैरसरकारी स्तर पर काम करने की जरूरत
एक बिंदु यह भी विचारणीय है कि जंगली जानवरों के निरंतर बढ़ने से खेतों में फसलों को भारी नुकसान होने लगा है. रात्रि में सुअर, हिरन, नील गायें आदि खेतों में घुसकर फसलों को क्षति पहुंचाते हैं. इससे अब गांवों में अनेक खेत खाली पड़े हैं. अर्थात वर्षा के पानी से जो खेती होती है उस पर बुरा असर पड़ा है. खेतों का वह पानी व्यर्थ में ही बह जाता है, उसका उपयोग बन्द हो गया है. इसके लिए सरकारी वन-विभाग को चाहिए कि ऐसे वन्य जीवों को पकड़ कर वन संरक्षण में उनकी व्यवस्था की जाए और यह अभियान तेजी से चलाया जाए. प्रत्येक नागरिक ही यह जिम्मेदारी है कि वह अपने प्रयासों से एक-एक बूंद जल को सहेजने का कार्य करें.

हमारे देश में प्रकृति की सबसे बड़ी देन बर्फ से ढका हुआ विशाल हिमालय का पहाड़ और उसमें से अनवरत निकलने वाली नदियां हैं, उससे जल संकट का समाधान किया जा सकता है. हमें घबराने की आवश्यकता नहीं है. हम सब मिलकर इस पावन यज्ञ में योगदान दें. उपरोक्त जलस्रोतों एवं उपयोगिता को संज्ञान में लेते हुए निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि पानी के विभिन्न स्रोतों को सुरक्षित रखना हमारा कर्तव्य है. इस कार्य हेतु समाज में जागरूकता उत्पन्न करने कि आवश्यकता है, क्योंकि बिना पानी के न तो जीवन संभव है और न तो पूर्णरूप से विकास. अतः हम सब मिलकर जल को सुरक्षित रखने हेतु सरकार तथा अन्य संस्थाओं द्वारा किए जा रहे प्रयासों के सफल बनाने में योगदान प्रदान करें. हम प्रण करें कि ‘सुरक्षित जल सुरक्षित जीवन एवं समुचित विकास’ही हमारे जीवन का ध्येय है. ‘रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून, पानी गए ना उबरे मोती-मानस-चून’

(लेखक अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के सेंटर ऑफ एडवांस्ड स्टडी में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)

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First published: August 27, 2019, 9:01 PM IST
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