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Khair Assembly Seat: यहां 50 साल तक चली चौधराहट, खैर में पार्टी से ज्यादा प्रत्याशियों का रसूख रखता है मायने

UP Chunav 2022: खैर विधानसभा सीट पर जीत हासिल करना बड़ी चुनौती.

UP Chunav 2022: खैर विधानसभा सीट पर जीत हासिल करना बड़ी चुनौती.

Khair Assembly Seat Election: खैर विधानसभा सीट को अलीगढ़ का दूसरा जाट लैंड कहा जाता है. जातीय समीकरण और किसान आंदोलन के ...अधिक पढ़ें

अलीगढ़. खैर (सुरक्षित) विधानसभा सीट अलीगढ़ की जाट बहुल सीटों में से एक है. यहां जाट वोटर निर्णायक भूमिका निभाता है. खैर को अलीगढ़ जिले का दूसरा जाट लैंड कहा जाता है. 2008 में परिसीमन के बाद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होने से पहले इस सीट पर जाट नेता ही जीतते रहे हैं. 2002 का चुनाव अपवाद है. इस चुनाव में बसपा ने अपने सोशल इंजीनियरिंग के तहत ब्राह्मण प्रत्‍याशी प्रमोद गौड़ पर दांव लगाया था. प्रमोद पहली बार चौधराहट तोड़ने में सफल रहे. राष्‍ट्रीय लोकदल (रालोद) के सत्‍यपाल सिंह मात्र 362 वोटों से प्रमोद से पीछे रह गए थे. हालांकि अगले ही चुनाव में सत्‍यपाल ने बदला ले लिया. 2007 में प्रमोद को 13779 वोटों से हराकर सत्‍यपाल विधानसभा पहुंचे. वर्तमान में भाजपा के अनूप प्रधान विधायक हैं. इस सीट का इतिहास बताता है कि यहां पार्टी से अधिक उम्‍मीदवार का अपना रसूख काम काम करता है. कई नेता पार्टी बदल-बदल कर अपने दम पर चुनाव जीतते रहे.

1952 में हुए पहले चुनाव में इस सीट से स्‍वतंत्रता सेनानी मोहन लाल गौतम निर्वाचित हुए थे. इसके बाद 1957 में हुए चुनाव से यहां जाट नेताओं की चौधराहट शुरू हो गई. लंबे समय तक जाट नेता चौधरी प्‍यारे लाल और चौधरी महेंद्र सिंह के बीच वर्चस्‍व की जंग चलती रही. 1967 और 74 में कांग्रेस और 77 में जनता पार्टी के टिकट से जीत दर्ज कर चौधरी प्‍यारे लाल महेंद्र सिंह पर भारी पड़ते रहे. महेंद्र सिंह सिर्फ एक बार 1969 में भारतीय क्रांति दल (बीकेडी) के टिकट पर जीतने में सफल हुए. 1980 में कांग्रेस से शिवराज सिंह जीतने में कामयाब हुए. 1985 में लोकदल के जगवीर सिंह जीते. जगवीर सिंह 1989 और 93 में भी वह जनता दल के टिकट पर विधानसभा पहुंचे.

भाजपा को सबसे पहले 1991 में महेंद्र सिंह ने खैर से जीत दिलाई थी. इसके बाद 1996 में भाजपा ने पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की बेटी ज्ञानवती सिंह को चुनाव लड़ाया. उन्‍होंने इस बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े जगवीर सिंह को 20 हजार से अधिक वोटों से हराया था. खैर के चुनावी इतिहास में चौधरी प्‍यारे सिंह और चौधरी जगपाल सिंह दो ऐसे नेता रहे, जिन्‍हें  मतदाताओं ने दोबारा चुनकर विधानसभा भेजा. इनके अलावा कोई भी दोबारा नहीं जीत पाया.

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सुरक्षित होने के बाद 2012 में हुए पहले चुनाव में खैर से रालोद के भगवती प्रसाद जीते थे. उन्‍होंने बसपा की राजरानी को 38 हजार से अधिक वोटों से हराया था. 2017 में भाजपा के अनूप प्रधान ने बसपा के राकेश कुमार मौर्य को 70 हजार से अधिक वोटों से हराया था. लगभग चार लाख के करीब वोटरों वाली खैर विधानसभा में एक लाख से अधिक जाट वोटर हैं. मुस्‍लिम 30 हजार, ब्राह्मण 50 हजार, जाटव 40 हजार, अन्‍य अनुसूचित जातियों के करीब 25 हजार वोटर हैं. कृषि कानूनों के प्रभाव के चलते इस बार इस सीट पर जीत को दोहराना चुनौती होगा. इस बार रालोद, भाजपा और बसपा के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है.

Tags: Aligarh news, UP Election 2022, UP news

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