'मृतक आश्रितों को नौकरी के बजाय विशेष पैकेज दिया जाए'

कोर्ट ने कहा कि आश्रितों की भारी संख्या होने के कारण अगर सभी की नियुक्ति कर दी गई तो प्रतियोगिता से खुली भर्ती के लिए अवसर नहीं बचेगा.

Sarvesh Dubey | News18 Uttar Pradesh
Updated: July 24, 2019, 6:55 PM IST
'मृतक आश्रितों को नौकरी के बजाय विशेष पैकेज दिया जाए'
यह आदेश न्यायमूर्ति पंकज मित्तल और न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की खंडपीठ ने दिया (Demo Pic)
Sarvesh Dubey | News18 Uttar Pradesh
Updated: July 24, 2019, 6:55 PM IST
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मृतक कर्मचारी आश्रितों के हित में ऐतिहासिक पहल की है. सरकारी सेवा में समान अवसर व सामाजिक न्याय में सामंजस्य स्थापित करने के लिए कोर्ट ने राज्य सरकार को मृतक आश्रितों को विशेष पैकेज देने का सुझाव दिया है. कोर्ट ने कहा है कि मृतक आश्रितों की भारी संख्या और पदों की कमी को देखते हुए सरकार ऐसा तरीका अपनाए, जिससे खुली प्रतियोगिता से योग्यों की नियुक्त हो और आश्रितों को भी सामाजिक न्याय मिल सके.

कोर्ट ने सुझाव दिया है कि सरकार आश्रित परिवार को मृत कर्मचारी की सेवा निवृत्ति या अचानक आई आपत्ति से उबरने के लिए 3 से 5 वर्ष तक कर्मचारी को मिल रहे वेतन का भुगतान करने का कानून बनाए. ऐसा करने से खुली प्रतियोगिता से नियुक्ति के अवसर बढ़ेंगे और आश्रित को भी सहायता मिल सकेगी.

कोर्ट ने पुलिस विभाग में सीधी भर्ती कोटे के 5 फीसदी पदों पर आश्रितों की नियुक्ति के नियम को वैध करार दिया है. और कहा है कि ऐसा न करने से आश्रितों की संख्या अधिक होने से सीधी भर्ती के अवसर कम होंगे. कोर्ट ने प्रदेश के सभी विभागों के लिए आश्रितों को सामाजिक न्याय के कानून बनाने के लिए आदेश की प्रति मुख्य सचिव को प्रेषित करने का आदेश दिया है.

यह आदेश न्यायमूर्ति पंकज मित्तल और न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की खंडपीठ ने अंकुर गौतम व अन्य की याचिका को ख़ारिज करते हुए दिया है.


तो प्रतियोगिता से खुली भर्ती के लिए अवसर नहीं बचेगा
याचिका पर अधिवक्ता प्रभाकर अवस्थी ने बहस की. इनका कहना था कि नियम 5(1) अनुच्छेद 14 व 16 के विपरीत है, क्योंकि यह केवल 5 फीसदी रिक्तियों पर ही आश्रित की नियुक्ति की अनुमति देता है. इससे बहुत से आश्रित नियुक्ति नहीं पा सकेंगे. इस नियम के अनुसार, सीधी भर्ती के 5 फीसदी रिक्तियों पर आश्रितों की संख्या ज्यादा होने पर टेस्ट से मेरिट पर चयन किया जाएगा.

कोर्ट ने कहा कि सामान्य अवधारणा है कि कानून सही है, अब जो इसे चुनौती देगा, उसे सिद्ध करना होगा कि किस प्रकार यह संविधान के उपबन्धों के विपरीत है. कोर्ट ने कहा कि आश्रितों की भारी संख्या होने के कारण अगर सभी की नियुक्ति कर दी गई तो प्रतियोगिता से खुली भर्ती के लिए अवसर नहीं बचेगा. ऐसे में युक्तिसंगत वर्जना की जा सकती है. नियम 5 में कोई अवैधानिकता नहीं है.
Loading...

यह बैकडोर एंट्री है
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि नियुक्तियां सीधी भर्ती से ही की जानी चाहिए, आश्रित की अनुकम्पा नियुक्ति अपवाद है. जो सामाजिक न्याय के तहत की जाती है. यह आश्रित का अधिकार नहीं है कि उसे नियुक्त ही किया जाए. अचानक आई विपत्ति से बचाव के लिए यह व्यवस्था की गई है. यह बैकडोर एंट्री है. जिसे सही नहीं कहा जा सकता है. लेकिन ऐसा तरीका अपनाया जाए, जिससे खुली प्रतियोगिता से योग्य की नियुक्ति व सामाजिक न्याय दोनों की पूर्ति हो सके. इसलिए सभी सरकारी विभागों, निकायों में आश्रित की नियुक्ति के लिए नियम बनाए जाए.

पुलिस विभाग में खाली पदों का 50 फीसदी सीधी भर्ती व 50 फीसदी पदोन्नति से भरे जाने का नियम है. कोर्ट ने सुझाव दिया है कि 5 साल या कर्मी की सेवानिवृत्ति जो पहले हो, तक आश्रित को कर्मी को मिल रहा वेतन दिया जाय. ताकि मृतक आश्रित अचानक आई आपदा से उबर सके.

ये भी पढ़ें--

साध्वी प्राची बोलीं- मुस्लिमों की बनाई कांवड़ न खरीदें कांवड़िए, माला और भाला साथ लेकर चलें

यूपी के सात और शहरों को 'स्मार्ट सिटी' के रूप में विकसित करेगी योगी सरकार, ये है प्लान

केंद्र सरकार ने अब उदित राज, राम शंकर कठेरिया सहित इन नेताओं की हटाई सुरक्षा

जानिए कौन है यह बच्चा, जिसके साथ संसद में खेल रहे हैं पीएम नरेंद्र मोदी
First published: July 24, 2019, 6:55 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...