मुकदमा चलाने के लिए ये जरूरी है कि जान-बूझकर SC/ST के साथ अपराध किया गया हो: HC
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मुकदमा चलाने के लिए ये जरूरी है कि जान-बूझकर SC/ST के साथ अपराध किया गया हो: HC
दिल्ली हाई कोर्ट ने हिंसा की जांच को लेकर निर्देश दिए हैं. (सांकेतिक फोटो)

इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने कहा है कि एससी/एसटी एक्ट के तहत मुकदमा तभी चलाया जाएगा, जबकि अपराध करते समय आरोपी को पता हो कि वह विशेष वर्ग का है. मुकदमा चलाने के लिए यह जरूरी है कि जान-बूझकर एससी/एसटी के साथ अपराध किया गया हो. यदि अपराध करने वाले को जानकारी नहीं है तो एससी/एसटी एक्ट के प्रावधान लागू नहीं होंगे.

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प्रयागराज. एससी/एसटी एक्ट (SC/ST Act) के तहत मुकदमा दर्ज करने को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने अहम फैसला दिया है. हाईकोर्ट ने कहा कि एससीएसटी एक्ट के तहत मुकदमा तभी चलाया जाएगा जब अपराध करते समय आरोपी को पता हो कि वह विशेष वर्ग के व्यक्ति के साथ अपराध कर रहा है. अपराध का मुकदमा चलाने के लिए यह आवश्यक है कि अनुसूचित जाति के सदस्य के साथ इसलिए अपराध किया गया कि वह अनुसूचित जाति का है. यदि अपराध करने वाले को इस बात की जानकारी नहीं है कि वह जिसके साथ अपराध कर रहा है वह अनुसूचित जाति का है तो उस स्थिति मेंअपराधी पर एससीएसटी एक्ट के प्रावधान लागू नहीं होंगे.

दुष्कर्म आरोपी को मिली राहत
कोर्ट ने अनुसूचित जाति की बच्ची से हुए दुष्कर्म के मामले में आरोपी को एससीएसटी एक्ट के उपबंधों के तहत मिली सजा से इस आधार पर बरी कर दिया और सत्र न्यायालय द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को घटाकर दस वर्ष कर दिया है. यह आदेश न्यायमूर्ति पंकज नकवी और न्यायमूर्ति एसएस शमशेरी की पीठ ने अलीगढ के शमशाद की अपील पर दिया है.

 
अभियुक्त शमशाद के खिलाफ नौ वर्षीय पीड़िता की मां ने 15 अप्रैल 2009 में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि अभियुक्त ने पीड़िता को बहला फुसलाकर उसके साथ दुष्कर्म किया. पुलिस ने दुष्कर्म के साथ ही एससीएसटी एक्ट की धाराओं में भी मुकदमा दर्ज कर चार्जशीट पेश की. सेशन कोर्ट ने पीड़िता के बयान और अन्य साक्ष्यों को देखते हुए शमशाद को उम्रकैद तथा 50 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई.


बहस की गयी कि अभियुक्त को इस बात की जानकारी नहीं थी कि पीड़िता एससी है इसलिए एससीएसटी एक्ट के प्रावधान लागू नहीं होंगे.

कोर्ट ने कहा कि अभियोजन यह प्रमाणित करने में असफल रहा है कि अभियुक्त ने पीड़िता के साथ इसलिए अपराध किया कि वह एससी है. अभियुक्त पीड़िता को पहले से नहीं जानता था इसलिए यहां एससीएसटी एक्ट के प्रावधान लागू नहीं होंगे. सजा पर बहस के दौरान बचाव पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों की नजीरें पेश कर सजा कम करने की मांग की. कोर्ट ने कहा कि घटना के समय अभियुक्त लगभग 20 साल का था. वह 12 वर्ष के करीब जेल में बिता चुका है. इस मामले में दस वर्ष की सजा न्याय की मंशा को पूरी करती है. कोर्ट ने जेल में बिताई गई अवधि को पर्याप्त सजा मानते हुए अभियुक्त को रिहा करने का आदेश दिया है.

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