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आज के ही दिन इलाहाबाद से दोबारा बना था प्रयागराज, जानें 435 सालों का इतिहास

Sarvesh Dubey | News18 Uttar Pradesh
Updated: October 18, 2019, 12:44 PM IST
आज के ही दिन इलाहाबाद से दोबारा बना था प्रयागराज, जानें 435 सालों का इतिहास
अपने नाम में ही हज़ारों साल का इतिहास समेटे है प्रयागराज

मैं तीर्थों का राजा प्रयागराज (Prayagraj) हूं. मेरा वर्णन सिर्फ इतिहास (History) में ही नहीं बल्कि वेदों, पुराणों और उपनिषदों में भी बड़ी महत्ता के साथ किया गया है. मैं सिर्फ नगर ही नहीं बल्कि पूरे भारत (India) की आस्था (Faith) का केन्द्र भी हूं. मेरी गोद में गंगा (Ganges), यमुना (Yamuna) और अदृश्य सरस्वती खेला करती हैं. इस धरती पर महर्षि भारद्वाज की तपोस्थली और आश्रम भी स्थित है. यहीं पर भगवान श्रीराम चन्द्र सीता और लक्ष्मण ने वन जाते हुए पहला प्रवास किया था. मैं राम की चरणों की धूल भी हूं. हां मैं प्रयागराज हूं.

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प्रयागराज. मेरे नाम की व्याख्या लोग कुछ इस तरह से करते हैं. 'प्र' यानि बहुत बड़ा और 'याग' यानि यज्ञ. 'प्रकृष्टो यज्ञो अभूद्यत्र तदेव प्रयागः इस प्रकार से मेरा नाम 'प्रयागराज' पड़ा. मेरे नाम का दूसरा मतलब भी है, वह स्थान जहां बहुत से यज्ञ हुए हों. पृथ्वी (Earth) को बचाने के लिए भगवान ब्रह्मा (Lord Bramha) ने यहीं पर एक बहुत बड़ा यज्ञ अनुष्ठान किया था. इस यज्ञ में ब्रह्मा स्वयं पुरोहित, भगवान विष्णु यजमान और भगवान शिव उस यज्ञ के देवता बनकर पधारे थे. यज्ञ के अंत में तीनों देवताओं ने अपनी शक्ति पुंज के द्वारा पृथ्वी के पाप बोझ को हल्का करने के लिए एक 'वृक्ष' उत्पन्न किया. यह एक बरगद का वृक्ष था जिसे आज अक्षयवट के नाम से जाना जाता है. यह वृक्ष किले में आज भी विद्यमान है. रघुकुल के राजा भागीरथ अपने पूर्वजों को तारने के लिए मां गंगा को पृथ्वी पर लाये. मेरी गोद में ही मां गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती की त्रिवेणी का भी वास है. समुद्र मंथन के बाद अमृत कलश की कुछ बूंदें यहां पर गिरने से संगम की धरती भी पावन हो उठी और यहां तीन हजार सालों से कुम्भ और महाकुम्भ का भी आयोजन होता चला आ रहा है. भगवान श्री राम (Lord Ram) चौदह वर्ष का वनवास पूरा करने और लंकापति रावण (Ravan) का अंत कर अयोध्या (Ayodhya) लौटने के दौरान भी प्रयागराज ही आये थे. उन्होंने यहीं पर ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति के लिए कोटि शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की आराधना की थी.

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1857 की क्रान्ति के बाद यहां 14 दिनों तक लहराया आजादी का झंडा
धर्म और अध्यात्म के नगर प्रयागराज की पहचान 1853 में बदल गयी. जबकि मुगल शासक बादशाह अकबर ने यमुना के तट पर एक शानदार किले का निर्माण कराया और प्रयागराज का नाम बदलकर अल्लाहाबाद कर दिया. जिसके बाद कालान्तर में मैं इलाहाबाद के नाम से मशहूर हो गया. गुलामी के इस नाम के साथ मेरा वास्ता 435 वर्षों तक बना रहा. अंग्रेजी राज के दौरान मैं कई वर्षों तक संयुक्त प्रान्त की राजधानी के तौर पर भी जाना जाता रहा. 1857 की पहली आजादी की क्रान्ति में मैं चौदह दिनों तक अंग्रेजों की गुलामी से आजाद रहा और मेरी छाती पर चौदह दिनों तक आजादी का झंडा लहराता रहा. कठिन संघर्षों के बाद जब देश आजाद हुआ, और उत्तर प्रदेश राज्य का गठन हुआ, मैं प्रदेश के चार बड़े महानगरों में से एक था. लेकिन संगम, द्वादश माधव, नागवासुकी, अलोपशंकरी शक्ति पीठ के कारण पूरे भारत में मैं तीर्थ के रुप में प्राचीन काल की भांति स्थापित रहा है. हालांकि देश की आजादी के दौरान कई बड़े बदलाव भी हुए. यहीं पर अल्फ्रेड पार्क में खुद को गोली मारकर चन्द्रशेखर आजाद ने अपनी शहादत दी. तो वहीं स्वराज भवन और आनन्द भवन भी आजादी की लड़ाई के दौरान स्वतन्त्रता सेनानियों के प्रमुख केन्द्र रहे. आजादी के पहले की इमारतों में पब्लिक लाइब्रेरी, इलाहाबाद हाईकोर्ट, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी, खुसरो बाग आज भी मेरी शान को बढ़ा रहे हैं.

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435 साल बाद मिला प्राचीन नाम प्रयागराज
लेकिन 435 सालों की गुलामी को तोड़कर 18 अक्टूबर 2018 को मेरा पुर्नजन्म हुआ. जिस दिन मुझे मेरे प्राचीन नाम प्रयागराज नाम से पुकारा गया. आज मेरे पुर्नजन्म का एक साल पूरा हो गया है. बीते एक साल में मैंने कई नये उतार-चढ़ाव देखें हैं, तो मुझमें कई बदलाव भी हुए हैं. इलाहाबाद रहते हुए जो पहचान मुझे पहले मिली, उससे कहीं अधिक मेरे पुराने नाम के वापस लौट आने से मेरे नाम को प्रसिद्धि मिल रही है. मेरी सबसे बड़ी पहचान यहां लगने वाले कुम्भ और महाकुम्भ के पर्व हैं. महाकुम्भ के दौरान मैं विराट हो जाता हूं. मेरी विशलता अलौकिक होती है. संगम के किनारे इलाहाबाद से अलग मैं सचमुच का प्रयाग का दर्शन कराता हूं. मेरी भव्यवता और दिव्यता देखने के लिए देश विदेश से करोड़ों श्रद्धालु संगम की गोद में समा जाते हैं. 2019 के कुम्भ से लेकर अब तक मेरा काफी कुछ कायाकल्प हो गया है. मैं जो पहले इलाहाबाद था आज मैं प्रयागराज हूं. प्रयागराज की मेरी नयी पहचान अब लोगों को उनके धर्म, संस्कृति और परम्पराओं का बोध करा रही है. हालांकि अभी भी मेरे मन में थोड़ी टीस बची है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट, इलाहाबाद जंक्शन और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी को मेरा नाम अब भी नहीं मिला है. लेकिन मुझे उम्मीद है कि केन्द्र व राज्य की सरकारें मेरी इस पीड़ा को भी जल्द दूर करेंगी और मेरी नयी पहचान से साथ ये तीनों भी चीजे जुड़ जायेंगी.
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First published: October 18, 2019, 12:44 PM IST
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