प्रयागराज: कल्पवास के दौरान इस मिट्टी के 'चूल्हे' को लेना मत भूलिएगा

कल्पवास के दौरान इस मिट्टी के 'चूल्हे' को लेना मत भूलिएगा
कल्पवास के दौरान इस मिट्टी के 'चूल्हे' को लेना मत भूलिएगा

दरअसल तंबुओं के नगर में एक माह कल्पवास करने वालों के टेंट में वैसे तो गैस सिलिंडर के प्रयोग होने लगे हैं, मगर अब भी ऐसे कल्पवासी और साधु-संत हैं, जो मिट्टी के चूल्हे पर बना भोजन ही ग्रहण करते हैं.

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प्रयागराज. संगम नगरी प्रयागराज (Prayagraj) में माघ मेला (Magh Mela) लगने वाला है. गांव-गिरांव में कल्पवासी कल्पवास का ताना बाना बुनने लगे हैैं तो प्रशासन उनके लिए संगम क्षेत्र में पांटून पुल, टेंट नगरी सहित अन्य व्यवस्थाएं करने में जुट गया है. कल्पवासियों का कल्पवास पूरी सुचिता और शुद्धता के साथ पूर्ण हो, इसके लिए दारागंज में गंगा किनारे की बस्ती में मिट्टी के चूल्हे तैयार कर रहीं महिलाएं कह रही हैं.

दरअसल तंबुओं के नगर में एक माह कल्पवास करने वालों के टेंट में वैसे तो गैस सिलिंडर के प्रयोग होने लगे हैं, मगर अब भी ऐसे कल्पवासी और साधु-संत हैं, जो मिट्टी के चूल्हे पर बना भोजन ही ग्रहण करते हैं. संत विष्णु महाराज कहते हैं कि कल्पवास में शुद्धता को पहली प्राथमिकता माना जाता है. इसके लिए मिट्टी के बने चूल्हे और गोबर के बने उपले शुद्धता की कसौटी पर खरे माने जाते हैं. यह बात वर्षों से गंगा तट पर मिट्टी का चूल्हा तैयार करने वाली इन महिलाओं को भली भांति पता है. इसीलिए वह कल्पवास का समय आने पर बिना किसी आर्डर के दो माह पहले से यह काम शुरू कर देती है.

वर्षों से माघ और कुंभ मेला के लिए मिट्टी के खास चूल्हे बनाने वाली महिलाएं कहती है कि वह अब भी रोज औसतन 40-50 चूल्हे बना लेती है. इस साल वह 3 हजार चूल्हे बनाएंगी. पिछले साल कुंभ के दौरान उन्होंने ज्यादा चूल्हे बनाए थे. मिट्टी का चूल्हा बनाने में व्यस्त महिलाएं कहती है कि यह सिर्फ कमाई के लिए ही नहीं, बल्कि उन आस्थावानों के लिए भी कार्य है जो गंगा की मिट्टी के चूल्हे पर ही बनाया भोजन ग्रहण करते है.



इस कारण हम सब वर्षों से इस परंपरा को संजोए है और चूल्हे, गोरसी बनाते है. यही नहीं, उपली पाथने का भी काम करती है. यह उपली ठंड में कल्पवासी जलाते है. उपली आम तौर पर कल्पवासियों को कड़ाके की ठंड में हाथ-पैर सेंकने में मदद पड़ती है. कुल मिलाकर यह कह सकते हैं की साधु-संतों व कल्पवासियों की पहली पसंद होतें हैं गाय का गोबर और गंगा की मिट्टी के बने चूल्‍हे.
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