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कार्तिक पूर्णिमा: संगम नगरी प्रयागराज में धूमधाम से मनाई जाएगी देव दीपावली

News18 Uttar Pradesh
Updated: November 11, 2019, 2:53 PM IST
कार्तिक पूर्णिमा: संगम नगरी प्रयागराज में धूमधाम से मनाई जाएगी देव दीपावली
संगम नगरी प्रयागराज में धूमधाम से मनाई जाएगी देव दीपावली

स्कंद पुराण के मुताबिक जो व्यक्ति कार्तिक मास में प्रतिदिन स्नान करता है, वह यदि केवल इन तीन तिथियों में सूर्योदय से पूर्व स्नान करे तो भी पूर्ण फल का भागी हो जाता है. कार्तिक मास की पूर्णिमा को कार्तिक पूर्णिमा, त्रिपुरी पूर्णिमा या गंगा स्नान के नाम से भी जाना जाता है.

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प्रयागराज. कार्तिक पूर्णिमा (Kartik purnima) के मौके पर मंगलवार यानी 12 नंवबर को पूरे देश के साथ ही संगम नगरी प्रयागराज (Prayagraj) में बड़ी धूमधाम से मनाया जायेगा. भारतीय संस्कृति में कार्तिक पूर्णिमा का धार्मिक एवं आध्यात्मिक माहात्म्य है. कार्तिक पूर्णिमा को देवताओं की दीपावली के रूप में भी मनाये जाने की परम्परा है. इस दिन कई धार्मिक आयोजन, पवित्र नदी में स्नान, पूजन और कर्मकांड का विधान है. वर्ष के बारह मासों में कार्तिक मास आध्यात्मिक एवं शारीरिक ऊर्जा संचय के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है. कार्तिक पूर्णिमा हमें देवों की उस दीपावली में शामिल होने का मौका देती है, जिसके प्रकाश से मनुष्य के भीतर छिपी तामसिक वृत्तियों का नाश होता है. इस माह की त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा को पुराणों ने अति पुष्करिणी कहा है.

कार्तिक मास में प्रतिदिन संगम में स्नान का है महत्व

स्कंद पुराण के मुताबिक जो व्यक्ति कार्तिक मास में प्रतिदिन स्नान करता है, वह यदि केवल इन तीन तिथियों में सूर्योदय से पूर्व स्नान करे तो भी पूर्ण फल का भागी हो जाता है. कार्तिक मास की पूर्णिमा को कार्तिक पूर्णिमा, त्रिपुरी पूर्णिमा या गंगा स्नान के नाम से भी जाना जाता है. शास्त्रों में कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान करने का बहुत महत्व बताया गया है. माना जाता है कि इस दिन गंगा स्नान करने से पूरे वर्ष गंगा स्नान करने का फल मिलता है. इस दिन गंगा सहित पवित्र नदियों एवं तीर्थों में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है, पापों का नाश होता है.

कार्तिक पूर्णिमा को लेकर है मान्यता


ऐसी मान्यता है कि त्रिपुरासुर नाम के दैत्य के आतंक से तीनों लोक भयभीत थे. त्रिपुरासुर ने स्वर्ग लोक पर भी अपना अधिकार जमा लिया था. त्रिपुरासुर ने प्रयाग में काफी दिनों तक तप किया था. उसके तप से तीनों लोक जलने लगे. तब ब्रह्मा जी ने उसे दर्शन दिए, त्रिपुरासुर ने उनसे वरदान मांगा था कि उसे देवता, स्त्री, पुरुष, जीव, जंतु, पक्षी, निशाचर न मार पाएं. इसी वरदान से त्रिपुरासुर अमर हो गया और देवताओं पर अत्याचार करने लगा.

जिसके बाद सभी देवताओं ने मिलकर ब्रह्मा जी से इस दैत्य के अंत का उपाय पूछा, ब्रह्मा जी ने देवताओं को त्रिपुरासुर के अंत का रास्ता बताया. देवता भगवान शंकर के पास पहुंचे और उनसे त्रिपुरासुर को मारने के लिए प्रार्थना की. तब महादेव ने त्रिपुरासुर के वध का निर्णय लिया. महादेव ने तीनों लोकों में दैत्य को ढूंढ़ा. कार्तिक पूर्णिमा के दिन महादेव ने प्रदोष काल में अर्धनारीश्वर के रूप में त्रिपुरासुर का वध किया. उसी दिन देवताओं ने शिवलोक यानि काशी में आकर दीपावली मनाई.
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सिख धर्म के लोग प्रकाशोत्सव के रुप में मनाते हैं कार्तिक पूर्णिमा

कार्तिक पूर्णिमा के दिन को सिख धर्म के अनुयायी प्रकाशोत्सव के रूप में भी मनाते हैं. इसी दिन सिख धर्म के संस्थापक पहले गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ था। इस दिन सिख पंथ के अनुयायी सुबह स्नान कर गुरुद्वारे में जाकर गुरुवाणी सुनते हैं और नानक जी के बताए रास्ते पर चलने का प्रण भी लेते हैं. इसलिए इस पूर्णिमा को गुरु पर्व भी कहा जाता है. ज्योतिषाचार्य संजय वासुदेवा के मुताबिक कार्तिक पूर्णिमा पर विशेष संयोग बन रहा है. इस दिन दान पुण्य करने से मनुष्य के अंदर ऊर्जा का संचार होता है और शक्ति भी प्राप्त होती है.

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First published: November 11, 2019, 2:53 PM IST
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