आपके लिए इसका मतलब: यूपी में जारी है अवैध शराब के सहारे मौत बांटने का सिलसिला, 8 दिन में 25 लोगों ने तोड़ा दम

जहरीली शराब पीने से यूपी में 8 दिन में 25 लोगों की मौत.

जहरीली शराब पीने से यूपी में 8 दिन में 25 लोगों की मौत.

यूपी में पिछले आठ दिनों में अवैध देशी शराब (Lllegal Liquor) की वजह से अकेले प्रयागराज (Prayagraj) और उसके आसपास के दो जिलों में 25 से ज्‍यादा लोगों की मौत हो चुकी है. हैरानी की बात है कि योगी सरकार के सख्‍त कानून के बाद भी माफियाओं में कोई डर नहीं है.

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प्रयागराज. उत्‍तर प्रदेश में अवैध देशी शराब (Lllegal Liquor) का कहर लगातार बढ़ता ही जा रहा है. साफ है कि मिलावटी शराब पीने से होने वाली मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है. हालात कितने बेकाबू होते जा रहे हैं इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले आठ दिनों में अकेले प्रयागराज (Prayagraj) और उसके आसपास के दो जिलों में 25 से ज्‍यादा लोगों की मौत हो चुकी है. जबकि तमाम लोग अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती होकर मौत के खिलाफ जिंदगी की जंग जीतने के लिए लड़ रहे हैं. वहीं, होली के त्यौहार और पंचायत चुनावों (Holi and UP Panchayat Election) के दौरान यह आंकड़ा और तेजी से बढ़ने की आशंका है. यह हाल तब है, जब सूबे की सरकार ने अवैध शराब से मौत की घटनाओं को रोकने के लिए कानून में बदलाव किया है और मजबूत इच्छा शक्ति दिखाई है.

प्रयागराज और आसपास के जिलों में अवैध शराब से मौतों का सिलसिला बदस्तूर जारी है. हांलाकि ज्‍यादातर मामलों में सख्त कार्रवाई भी की गई है. इसके बावजूद अवैध शराब के गोरखधंधे का फलना फूलना न सिर्फ सिस्टम पर सवाल खड़े करता है बल्कि यह साबित करने के लिए भी काफी है कि जिम्मेदार लोग किस तरह से इसमें शामिल होकर इसे शह दे रहे हैं.

प्रयागराज में पिछले एक हफ्ते में अकेले हंडिया इलाके के तीन गांवों में जहरीली शराब पीने से पंद्रह लोगों की मौत हुई. हफ्ते भर पहले ही प्रयागराज से सटे प्रतापगढ़ जिले के संग्रामगढ़ इलाके में पांच लोगों ने दम तोड़ा था. इसी तरह महज दो दिन पहले चित्रकूट जिले में शराब पीने के बाद छह लोग जिंदगी से हाथ धो बैठे.


पूरे उत्तर प्रदेश का हाल है बुरा
ये घटनाएं तो महज बानगी भर हैं. कमोवेश यही हाल पूरे उत्तर प्रदेश का है. वेस्टर्न यूपी से लेकर पूर्वांचल और तराई इलाकों से लेकर बुंदेलखंड तक आए दिन कहीं न कहीं इस तरह की खबरें सुनने और देखने को मिल ही जाती हैं. वैसे अवैध शराब के इस काले धंधे को अब पूरी तरह खत्म कर पाना कतई आसान भी नहीं है, क्योंकि यह काम अब गांव-गांव, गली-गली कुटीर उद्योग की तरह फैल चुका है. दर्जनों और सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों की संख्या में लोग मौत बांटने के कारोबार से फल-फूल रहे हैं. बड़े-बड़े माफियाओं ने इस गोरखधंधे पर कब्जा कर लिया है. जबकि सरकारी अमले के जिन जिम्मेदार लोगों पर इसे रोकने की जिम्मेदारी है, वही अपने हिस्से और एक्स्ट्रा कमाई के फेर में न सिर्फ नजरें फेर रहे हैं बल्कि अवैध धंधे की इस फसल को खाद-पानी देकर उसे बढ़ाने में लगे हैं. कहा जा सकता है कि जाम के नाम पर इकठ्ठा हुए लोगों का ऐसा तगड़ा गैंग तैयार हो चुका है, जिसे तोड़ना कतई आसान नहीं है.

कानून का डर है कम

वरिष्ठ पत्रकार और समाजसेवी अनंत राम कुशवाहा के मुताबिक, अवैध शराब बनाने और बेचने का काम अब हर चौथे-पांचवें गांव होता है, वह भी चोरी-छिपे नहीं बल्कि धड़ल्ले से. सड़कों, रास्तों और खुले मैदानों में भट्टियां धधकती हैं. आबकारी विभाग, पुलिस महकमे और प्रशासन के दूसरे जिम्मेदार लोगों को एक-एक चीज की जानकारी होती है और सबका अपना हिस्सा फिक्स होता है. मिलीभगत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सरकारी ठेकों से अवैध शराब बिकने लगी है. पिछले साल नवंबर महीने में प्रयागराज के फूलपुर इलाके में जिन सात लोगों ने पाउच वाली दारू पीकर दम तोडा था, उन सभी ने सरकारी ठेके से मौत का जाम खरीदा था. ऐसे मामलों में सरकारी अमला हरकत में तब आता है, जब कई मौतों के बाद हड़कंप मचता है. खुद अपनी गर्दन फंसती हुई नजर आती है. कोहराम मचने के बाद भी बड़ी मछलियों या यूं कहें कि माफियाओं पर हाथ डालने के बजाय सिर्फ मोहरों पर ही हाथ डाला जाता है. कार्रवाई के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की जाती है. सरकारी फाइलों को दुरुस्त भर किया जाता है. जिन जगहों पर एक्शन के नाम पर खुद अपनी ही पीठ थपथपाई जाती है, वहां हफ्ते दस दिन बाद ही फिर से भट्ठी सुलगने लगती है. सरकार ने जहरीली शराब से मौत की घटनाओं में फांसी तक की सजा देने का नियम बना दिया है, लेकिन अधिकांश मामलों में एनएसए और गैंगस्टर तक की कार्रवाई नहीं होती.



कुशवाहा ने आगे कहा कि अवैध शराब का सिलसिला पहले शौकिया तौर पर शुरू हुआ था. लोगों ने कम कीमत में नशा करने के लिए पहले खुद अपने हाथ शराब बनानी शुरू की. फिर यह दोस्तों और रिश्तेदारों को दी जाने लगी. इसके बाद इस अवैध शराब ने रोजगार के अवसर पैदा कर दिए.

मुनाफा बढ़ने लगा तो माफिया और दूसरे प्रभावशाली लोग इस खेल के असली खिलाड़ी बन गए. नशा बढ़ाने के लिए वह चोरी छिपे तैयार होने वाली शराब में यूरिया-नौसादर और कई केमिकल का इस्तेमाल करने लगे. कई बार यही चीजें अवैध शराब को जहरीली बना देती हैं और इसे पीने वाले की मौत भी हो जाती है.


पुलिस ने कही यह बात

वहीं, आईजी प्रयागराज रेंज केपी सिंह का कहना है कि पुलिस अवैध शराब के धंधे का नेटवर्क तोड़ने के लिए लगातार कार्रवाई कर रही है. उनके मुताबिक, अवैध शराब के धंधे में शामिल लोगों के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट में भी कार्रवाई हो रही है. इसके साथ ही पिछले दस सालों में जो लोग भी अवैध शराब में लिप्त पाये गए हैं और उनके खिलाफ केस रजिस्टर हुए हैं उनकी जानकारी भी जुटाई जा रही है. आईजी के मुताबिक, पूरे मामले की जांच हो रही है जो भी अधिकारी कर्मचारी दोषी पाये जायेंगे, उनके विरुद्ध भी कठोर कार्रवाई की जायेगी.

बहरहाल, अवैध शराब का कारोबार इस कदर संगठित तरीके से होने लगा है कि होली जैसे त्यौहार और चुनावों के मौके पर महीने भर पहले से ही बुकिंग शुरू हो जाती है. ऑर्डर इतने ज्‍यादा मिल जाते हैं कि उनकी सप्लाई तक नहीं हो पाती. सरकार भले ही लाख कोशिशें कर ले, लेकिन इसका कोई खास असर इसलिए नहीं नजर आएगा क्योंकि जिन पर इसे रोकने की जिम्मेदारी, वही अपने जेब भरने की लालच में इस गोरखधंधे को बढ़ाते हैं. शराब के जरिये रोजगार पाने और और अपने परिवार का पेट पालने वाले भी आसानी से इससे पीछा नहीं छुड़ा पाते. अगर इन लोगों को जागरूक कर इन्हें रोजगार के दूसरे साधन मुहैया करा दिए जाएं तो शायद कुछ लोगों का दिल पसीज सकता है. साफ कहा जा सकता है कि जब तक सरकार सियासी बयानबाजी और किताबी दावों से बाहर निकलकर मजबूत इच्छा शक्ति दिखाते हुए सख्त कदम नहीं उठाएगी, तब तक प्लास्टिक के पाउच में मौत बांटने का सिलसिला इसी तरह जारी रहेगा.
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