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HC: वेब सीरीज मिर्जापुर के लेखक, निर्देशक के खिलाफ उत्पीड़नात्मक कार्यवाही पर रोक, बशर्ते...

मिर्जापुर वेब सीरीज के लेखकों और निर्देशकों ने HC में याचिका दाखिल की है.
मिर्जापुर वेब सीरीज के लेखकों और निर्देशकों ने HC में याचिका दाखिल की है.

Allahabad High Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वेब सीरीज मिर्जापुर के मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि केस की विवेचना जारी रहेगी. याचीगण विवेचना में सहयोग करेंगे. यदि वे सहयोग नहीं करते हैं तो दी गई राहत निरस्त की जा सकेगी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 20, 2021, 7:43 AM IST
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प्रयागराज. इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court)ने वेब सीरीज मिर्जापुर (Web Series Mirzapur) के लेखक व निर्देशक को राहत देते हुए उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी के तहत उत्पीड़नात्मक कार्यवाही पर रोक लगा दी है. साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार से याचिका पर जवाब मांगा है. सीरीज के लेखकों और निर्देशकों करन अंशुमान, गुरमीत सिंह, पुनीत कृष्णा और विनीत कृष्णा ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर प्राथमिकी रद्द रने और गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग की है. याचिका पर न्यायमूर्ति प्रींतकर दिवाकर और न्यायमूर्ति दीपक वर्मा की खंडपीठ ने सुनवाई की.

इससे पूर्व हाईकोर्ट ने 29 जनवरी को इसी मामले में सीरीज के निर्माता फरहान अख्तर और रीतेश सिधवानी के खिलाफ उत्पीड़नात्मक कार्यवाही पर रोक लगाई थी. कोर्ट ने कहा है कि मामले की विवेचना जारी रहेगी और याचीगण विवेचना में सहयोग करेंगे. यदि वे सहयोग नहीं करते हैं तो दी गई राहत निरस्त की जा सकेगी. मिर्जापुर सीरीज को लेकर मिर्जापुर कोतवाली देहात में प्राथमिकी दर्ज कराई गई है.

ये है आरोप



आरोप है कि इस सीरीज से एक वर्ग विशेष की भावनाएं आहत हुई हैं और मिर्जापुर जिले की क्षवि को नुकसान पहुंचा है. सीरीज में मनगढंत तथ्य दिए गए हैं. सरकारी वकील का कहना था कि वेब सीरीज से लोगों की धार्मिक और सामाजिक भावनाएं आहत हुई हैं. जबकि याचीगण के अधिवक्ताओं का कहना था कि वेब सीरीज में दिखाए गए तथ्यों से कोई अपराध नहीं बनता है. सीरीज कल्पनाओं पर आधारित है. पात्र भी काल्पनिक है.
महानिदेशक विजलेंस से HC ने पूछा जांच मे देरी का कारण

उधर एक अन्य मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लंबे समय तक जांच लटकाए रखने पर तल्ख टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा है कि इससे जांच अधिकारी की अक्षमता ही दिखाई देती है. कोर्ट ने जिलाधिकारी एटा कार्यालय के कर्मचारी के खिलाफ लंबे समय से जांच लंबित होने पर महानिदेशक विजलेंस से व्यक्तिगत हलफनामा मांगा है. वरिष्ठ लिपिक महेश कुमार यादव की याचिका पर न्यायमूर्ति अजय भनोट ने यह आदेश दिया है.

जांच लटकने से हो रहा मानसिक उत्पीड़न: याची

याची के अधिवक्ता सुनील यादव का कहना था कि याची के खिलाफ 2017 से विभागीय जांच को लटकाए रखा गया है, जिससे उसका मानसिक उत्पीड़न हो रहा है. नियमानुसार किसी भी सरकारी कर्मचारी के विरुद्ध शुरू की गई विभागीय कार्यवाही 6 माह में निस्तारित की जानी चाहिए. अपवाद की दशा में यह समय सीमा ज्यादा से ज्यादा 12 माह तक हो सकती है. लेकिन वर्तमान मामले में कर्मचारी महेश यादव को 2017 में निलंबित करने के बाद दो बार एक समान आधार पर आरोप पत्र दिया गया, जिसका समय सीमा के अंतर्गत याची ने साक्ष्य समेत विस्तृत जवाब भी दे दिया.

डीएम की ओर से जवाब दाखिल कर बताया गया कि कर्मचारी कि खिलाफ विजलेंस जांच चल रही है इसलिए विभागीय जांच को स्थगित रखा गया है. इस पर न्यायालय ने महानिदेशक विजलेंस से चार मार्च तक व्यक्तिगत हलफनामे पर जांच के निस्तारण में अनावश्यक देरी पर स्पष्टीकरण देने का आदेश दिया है और यह भी पूछा है कि जांच पूरी होने में कितना समय लगेगा?
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