इलाहाबाद: 29 साल से फाइलों में लटकी नगर निगम पेंशन घोटाले की जांच पर हाईकोर्ट हुआ सख्त

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा विजिलेंस जांच में जानबूझकर देरी की गई. अब एसआईटी जांच का आदेश कर दिया गया है. जांच का अंत होना चाहिए और 3 माह में जांच पूरी कर कार्रवाई करने का निर्देश दिया है.

Sarvesh Dubey | News18 Uttar Pradesh
Updated: August 29, 2018, 2:31 PM IST
इलाहाबाद: 29 साल से फाइलों में लटकी नगर निगम पेंशन घोटाले की जांच पर हाईकोर्ट हुआ सख्त
इलाहाबाद हाईकोर्ट (फाइल फोटो)
Sarvesh Dubey | News18 Uttar Pradesh
Updated: August 29, 2018, 2:31 PM IST
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 29 साल से तमाम जांचों और फाइलों में लटके इलाहाबाद नगर निगम ​पेंशन घोटाला मामले में 3 महीने में जांच पूरी करने का निर्देश दिया है. हाईकोर्ट ने कहा कि मामले में दोषी अधिकारियों पर तुरन्त कार्रवाई हो.  बता दें 16 फरवरी 1985 से 30 जून 1995 के नगर निगम में पेंशन के नाम पर करोड़ों का फर्जी भुगतान किया गया. 1999 की ऑडिट रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि दस साल में 4 करोड़ 75 लाख 80 हजार रूपये की बंदरबाट कर ली गई. पता चला कि पेंशनर सिर्फ 900 थे लेकिन 2800 लोगों को पेंशन दे दी गयी.

मामले में सेंट्रलाइज्ड कैडर के वीके पांडेय, श्याम सुंदर गुप्ता, के के शर्मा व संगम लाल वर्मा एकाउन्ट अधिकारियों पर डायरेक्टर स्थानीय निकाय ने कार्रवाई का आदेश दिया.  केके शर्मा मामले में दोषी करार दिए गए, वहीं उनके खिलाफ प्रतिकूल प्रविष्टि व दो इंक्रीमेंट रोकने का दंड दिया गया. वहीं सहायक एकाउंटेंट राज बहादुर माथुर व अन्य कर्मचारियों पर भी की कार्रवाई की गई. मामले में मुख्य नगर अधिकारी ने जुलाई 2000 में रिपोर्ट दी. इस दौरान रिटायर हुए राज बहादुर माथुर की पेंशन, ग्रेच्युटी आदि जब्त कर ली गई.

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इसके बाद गबन राशि की वसूली का आदेश हुआ, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई. कोर्ट ने मामले में याचिका खारिज कर दी.  न्यायमूर्ति एसपी केशरवानी ने कहा कि सरकार एक एजेंसी से दूसरी को जांच सौंपती रही. मामले में बड़े अधिकारियों को बचाने की कोशिश की गई. एफआईआर भी किया. कई स्तर की जांचे बैठायी गईं. लेकिन कार्रवाई किसी पर नहीं हो सकी. एक ही समय एक व्यक्ति को एक से अधिक बार पेंशन भुगतान कर करोड़ों हजम कर लिया गया. मामले में 2004 में विजिलेंस जांच बैठाई गई. 9 साल बाद शासन को रिपोर्ट भेजी गयी.

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इसके बाद मुख्य सचिव ने 13 दिसम्बर 2017 को हाई पावर जांच कमेटी गठित कर दी. पुलिस को जांच से रोका. कमेटी ने पाया 19 आरोपियों में से 11 की मौत हो चुकी है. बचे 8 आरोपियों में से 7 रिटायर हो चुके हैं. फिर 31 मई 2018 को प्रमुख सचिव, नगर विकास ने एसआईटी जांच का आदेश जारी कर दिया. एसआईटी वित्तीय अनियमितता हुई है या नहीं, का पता लगाएगी. जीवित आरोपियों की सम्पत्ति की भी जांच करेगी. 19 में से 8 ही जीवित है और दोषियों का पता लगाएगी.

कोर्ट ने कहा विजिलेंस जांच में जानबूझकर देरी की गई. रिकॉर्ड न मिल पाने के कारण चार्जशीट दाखिल नहीं कर सकी. अब एसआईटी जांच का आदेश कर दिया गया है. कोर्ट ने कहा जांच का अंत होना चाहिए और 3 माह में जांच पूरी कर कार्रवाई करने का निर्देश दिया है.
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