प्रयागराज में आयोजित 2019 के कुम्भ मेले में जब बाल-बाल बचे थे लालजी टंडन
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प्रयागराज में आयोजित 2019 के कुम्भ मेले में जब बाल-बाल बचे थे लालजी टंडन
20 जुलाई 2019 को उन्हें मध्यप्रदेश का राज्यपाल नियुक्त किया गया था.

पंडित केसरी नाथ त्रिपाठी (Pandit Kesari Nath Tripathi) ने उन्हें लखनऊ की राजनीति का भीष्म पितामह बताते हुए कहा है कि वे अटल बिहारी बाजपेयी के निकट सहयोगियों में रहे हैं और उनके संसदीय क्षेत्र के विकास का भी श्रेय लालजी टंडन को ही जाता है

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प्रयागराज. मध्य प्रदेश के राज्यपाल लालजी टंडन (Lalji Tandon) का 85 वर्ष की आयु में मंगलवार को निधन (Death) हो गया. उनके निधन से लखनऊ समेत पूरे प्रदेश में शोक की लहर है. यूपी सरकार ने भी उनके निधन पर तीन दिन के राजकीय शोक की घोषणा कर दी है. लालजी टंडन का लखनऊ के मेदांता अस्पताल (Medanta Hospital) में निधन हुआ है. लालजी टंडन बीते कुछ समय से बीमार चल रहे थे और लखनऊ के मेदांता अस्पताल में भर्ती थे.  आज सुबह उनके निधन की जानकारी सबसे पहले उनके बेटे और योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री आशुतोष टंडन (Ashutosh Tandon) ने ट्वीट कर लोगों को दी है. लालजी टंडन के निधन पर सभी दलों के वरिष्ठ नेताओं ने शोक जताया है. इसके साथ ही उनके कई राजनीतिक मित्र भी उनके निधन से दुखी हैं.

लखनऊ में 12 अप्रैल 1935 को जन्मे लालजी टंडन लखनऊ वासियों के लिए जाना पहचाना नाम है. यहां की हर गलियों से लेकर मोहल्लों तक उन्हें जानने वाले लोग मौजूद हैं. उन्होंने नगर निगम में पार्षद से लेकर एमएलसी, विधायक, मंत्री और राज्यपाल तक का सफ़र तय किया. अटल बिहारी बाजपेयी के विश्वासपात्र रहे लाल जी टंडन लखनऊ में उनके संसदीय सीट के विकास कार्यों के वाहक बने तो उनके निधन के बाद उन्हें उनकी विरासत को भी आगे बढ़ाने का मौका मिला. लेकिन जब लखनऊ से राजनाथ सिंह चुनाव लड़ने आये तो उन्हें अपनी उम्र के लिहाज से खुद भी चुनाव न लड़ने का फैसला लिया. पार्टी के निष्ठावान और सिद्धान्तों के प्रति समर्पित रहे लाल जी टंडन को 21 अगस्त 2018 को बिहार का राज्यपाल बनाया गया. जिसके बाद 20 जुलाई 2019 को उन्हें मध्यप्रदेश का राज्यपाल नियुक्त किया गया. लालजी टंडन हर समुदाय में लोकप्रिय जननेता के रुप में जाने जाते थे.

प्रयागराज से था गहरा नाता
लाल जी टंडन का प्रयागराज से भी गहरा नाता था. यहां पर उनके अभिन्न मित्र और पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल पंडित केसरी नाथ त्रिपाठी (Pandit Kesari Nath Tripathi) रहते हैं. हर साल उनके जन्मोत्सव के कार्यक्रम में लालजी टंडन जरुर आते थे. उनके निधन पर पंडित केसरी नाथ त्रिपाठी शोकाकुल हैं. उनके संस्मरणों को याद करते हुए पंडित केसरी नाथ त्रिपाठी बताते हैं कि उनका लालजी टंडन के साथ कई दशकों का साथ रहा है. लालजी टंडन के निधन पर भावुक पंडित केसरी नाथ त्रिपाठी ने कहा है कि वे हमसे उम्र में छह माह के छोटे थे. लेकिन इस तरह से छोड़कर चले जायेंगे ये पता नहीं था. उन्होंने कहा है कि जिस तरह की उन्हें चिकित्सा मेदान्ता में मिल रही थी उससे लग रहा था कि वे जल्द स्वस्थ्य होकर लौटेंगे. लेकिन आज सुबह ये मनहूस खबर सुनकर गहरा आघात लगा है.
पंडित केसरी नाथ त्रिपाठी ने उन्हें लखनऊ की राजनीति का भीष्म पितामह बताते हुए कहा है कि वे अटल बिहारी बाजपेयी के निकट सहयोगियों में रहे हैं और उनके संसदीय क्षेत्र के विकास का भी श्रेय लालजी टंडन को ही जाता है. राजनीति में पार्षद से लेकर कैबिनेट मंत्री और राज्यपाल तक का सफर तय करने के बावजूद बेहद सरल इंसान थे. वे भाजपा के संस्थापक सदस्यों में एक थे और पार्टी के सिद्धान्तों के प्रति समर्पित कार्यकर्ता भी रहे. पंडित केसरी नाथ त्रिपाठी ने कहा है कि हमारे जन्मदिन पर भी वे प्रयागराज आया करते थे और घंटों बातचीत किया करते थे. उन्होंने कहा है कि उनके निधन से जहां देश और प्रदेश को अपूरणीय क्षति हुई है वहीं,  मेरे लिए भी उनका इस तरह से चले जाना व्यक्तिगत क्षति है.



प्रयागराज कुम्भ में बाल-बाल बचे थे लाल जी टंडन
एक बार ऐसा मौका भी आया जबकि लाल जी टंडन कुम्भ 2019 के दौरान प्रयागराज आये और एक बड़े हादसे का शिकार होने से बाल-बाल बचे. कुम्भ के दौरान अरैल में जहां पर सर्किट हाउस बनाया गया था उसमें देर रात दो बजे अचानक आग लग गई. ये आग लगने की घटना 12 फरवरी की रात दो बजे की है. जिस घटना में अस्थायी रुप से बनाये गए टेंटों में अचानक आग लग गई थी और कई टेंट धू-धूकर जल उठे. इसी सर्किट हाउस में लालजी टंडन भी ठहरे थे और उनका टेंट भी जलकर खाक हो गया था. लेकिन हादसे में लाल जी टंडन बाल बाल बच गए थे. जिसके बाद उन्हें शहर में स्थित सर्किट हाउस में शिफ्ट करा दिया गया था. उस दौरान उनके ओएसडी संजय चौधरी जो कि मेरे मित्र के बड़े भाई भी हैं फोन पर उनसे बात कर मैंने उनका कुशलक्षेम पूछा था. उन्होंने बताया कि बाबूजी पूरी तरह से स्वस्थ्य हैं. दरअसल लालजी टंडन का व्यक्तित्व बड़ा विशाल था. वे बड़ी से बड़ी घटनाओं पर कभी धैर्य नहीं खोते थे. यही वजह है कि कुम्भ के हादसे के बाद भी वे तनिक विचलित नहीं हुए और उन्होंने कुम्भ में स्नान किया और बिहार लौट गए.
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