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CAA हिंसा पोस्टर मामला: योगी सरकार को इलाहाबाद हाईकोर्ट से मिली फौरी राहत

इलाहाबाद हाई कोर्ट से मिली योगी सरकार को राहत.
इलाहाबाद हाई कोर्ट से मिली योगी सरकार को राहत.

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्‍वत: संज्ञान लेते हुए CAA हिंसा के आरोपियों के पोस्‍टर और बैनर हटाने का आदेश दिया था. फिलहाल यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.

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प्रयागराज. लखनऊ में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के दौरान हुई हिंसा में सार्वजानिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों के पोस्टर हटाने के मामले में योगी सरकार (Yogi Government) को इलाहाबाद हाईकोर्ट से फौरी तौर पर राहत मिल गई है. चीफ जस्टिस गोविंद माथुर और राकेश सिन्हा की पीठ ने सरकार को 10 अप्रैल तक की मोहलत दी है. सरकार को यह राहत सोमवार को दाखिल की गई अर्जी पर मिली. इसमें अनुपालन रिपोर्ट पेश करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में लंबित अपील का हवाला देकर अतिरिक्त समय मांगा गया था.

बता दें कि मामले का स्वत:संज्ञान लेते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सभी आरोपियों के पोस्टर हटाने का आदेश दिया था. साथ ही 16 मार्च तक हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के समाक्ष अनुपालन रिपोर्ट पेश करने को कहा गया था. लेकिन, प्रदेश सरकार हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई. हालांकि, शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक नहीं लगाई और मामले को बड़ी पीठ के लिए रेफर कर दिया. पोस्टर हटाने की समय-सीमा ख़त्म होने के बाद सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित होने का हवाला देकर और वक्त मांगा था. हाईकोर्ट में अब 10 अप्रैल को इस मामले की सुनवाई होगी. इस मोहलत को एक बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, क्योंकि यूपी सरकार पर अवमानना की कार्रवाई का खतरा मंडरा रहा था.

हलफनामे में कही थी ये बात
राज्य सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि इस मामले में राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल की है, जिसकी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में लम्बित है. लिहाजा, सरकार को अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने के लिए और अधिक वक्त चाहिए.
कोर्ट ने पोस्टर हटाने का दिया था आदेश


गौरतलब है कि सीएए को लेकर लखनऊ में हुई हिंसा के आरोपियों के पोस्टर लगाए जाने के मामले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 7 मार्च को स्‍वत: संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार से जवाब तलब किया था. चीफ जस्टिस गोविन्द माथुर और जस्टिस रमेश सिन्हा की डिवीजन बेंच ने इस मामले में 8 मार्च को सुनवाई पूरी कर जजमेंट रिजर्व कर लिया था. इसके बाद अगले दिन 9 मार्च को कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए लखनऊ के डीएम और पुलिस कमिश्नर को पोस्टर हटाए जाने का आदेश दिया था.

निजता के अधिकार का उल्लंघन बताया
कोर्ट ने आरोपियों के पोस्टर लगाए जाने की कार्रवाई को अनावश्यक और निजता के अधिकार का उल्लंघन माना था. कोर्ट ने साथ ही डीएम को आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट भी 16 मार्च को हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को सौंपने का आदेश दिया था. हालांकि, इस बीच हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ यूपी सरकार सुप्रीम कोर्ट चली गई थी.

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