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Magh mela:-बेहद प्राचीन है संगम की रेती पर कल्पवास की परंपरा,जानिए अध्यात्म से जोड़ने के साथ कितनी कठिन होती है यह तपस्या

Magh mela:-बेहद प्राचीन है संगम की रेती पर कल्पवास की परंपरा,जानिए अध्यात्म से जोड़ने के साथ कितनी कठिन होती है यह तपस्या

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कल्पवास पौष पूर्णिमा से माघी पूर्णिमा तक यानी पौष माह के 11वें दिन से शुरू होकर माघ माह के 12वें दिन तक चलता है. कल्पवास के दौरान कुछ सख्त नियमों का पालन किया जाता है, जिनके बगैर कल्पवास अधूरा माना जाता है.

    प्रयागराज:- यूं तो अनेकों शहर मौजूद हैं भारतभूमि के पटल पर लेकिन तीर्थों के राजा प्रयाग की बात ही अलग है.यह शहर अपने आप में संपूर्ण है.यहां की परंपराएं,यहां की संस्कृति लोगों को यहां खींच लाती हैं.ऐसी ही एक परंपरा कल्पवास की है जो लोगों को ईश्वर से जोड़ती है, अध्यात्म के रास्ते पर चलाती है.इसी परंपरा के चलते लोग संगम नगरी में सालों से मीलों का सफर तय करके यहां आते रहे हैं.इस पावन भूमि में धर्म और आस्था की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इसके छांव तले जो भी आता है बस यहीं का हो जाता है.यह शहर है मोक्ष का,धर्म का,अध्यात्म का.लोग कहते हैं कि प्रयाग नगरी भटके हुए को रास्ता दिखा देती है,अधर्मियो को धर्मात्मा बना देती है और आत्मा को परमात्मा से जोड़ देती है.इसी कड़ी में एक महत्वपूर्ण परंपरा कल्पवास की रही है,जो माघ महीने में शुरू होती है और लगभग एक महीने तक चलती है.तो चलिए जानते हैं कि क्या है कल्पवास और इसका सदियों पुराना इतिहास.जिस पर आज भी आधुनिकता हावी नहीं हुई है.लोग आज भी लाखों की संख्या पर संगम नगरी में आते हैं और एक महीने कल्पवास की कठिन तपस्या करते हैं.

    • क्या है कल्पवास
    मान्यता है कि कल्पवास से एक कल्प (ब्रह्मा का एक दिन) का पुण्य प्राप्त होता है.ऐसा माना जाता है कि जो कल्पवास की प्रतिज्ञा करता है वह अगले जन्म में राजा के रूप में जन्म लेता है.गंगा यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम की रेती पर श्रद्धालु एक महीने तक कल्पवास करते हैं.कल्पवास में एक विशेष तरह की दिनचर्या का पालन किया जाता है, एक सादगी भरा जीवन जिया जाता है. एक सात्विक दिनचर्या.कल्पवास पौष पूर्णिमा से माघी पूर्णिमा तक यानी पौष माह के 11वें दिन से शुरू होकर माघ माह के 12वें दिन तक चलता है. कल्पवास के दौरान कुछ सख्त नियमों का पालन किया जाता है, जिनके बगैर कल्पवास अधूरा माना जाता है.यह एक कठिन तपस्या होती है. भीषण सर्दी में उठकर ब्रह्म मुहूर्त में नहाना,जमीन पर सोना, सादा भोजन ग्रहण करने जैसे कई नियम इसमें शामिल हैं.जो भी एक बार कल्पवास का संकल्प लेता है उसे यह कम से कम 12 वर्षों तक जारी रखना होता है.

    • बेहद प्राचीन है यह परंपरा
    कल्पवास की यह परंपरा वेदकालीन अरण्य संस्कृति की देन है.पुराणों और रामचरितमानस में भी इसका उल्लेख किया गया है. बताया जाता है कि प्रयाग की धरती पर पहले जंगल हुआ करते थे यहां सिर्फ ऋषि मुनि भरद्वाज का आश्रम हुआ करता था.क्योंकि भगवान ब्रह्मा ने अपना पहला यज्ञ इसी पावन भूमि में किया था, इसी के चलते साधु-संत यहां हमेशा ही तपस्या और साधना किया करते थे,लेकिन इस पावन धरती पर गृहस्थ लोगों के लिए कल्पवास की परंपरा शुरू की गई.इसके अंतर्गत गृहस्थ लोग अपनी गृहस्थी को छोड़कर कुछ दिनों के लिए कल्पवास करते हैं.उन्हें इस दौरान विशेष तरह की शिक्षा-दीक्षा भी दी जाती है और ईश्वर को पाने के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी जाती है.

    • अध्यात्म की राह का एक पड़ाव है कल्पवास
    कल्पवास की परंपरा एक माध्यम है परमपिता परमेश्वर को जानने का.कल्पवास के दौरान आत्मा नवीन हो जाती है जिसके चलते मन और मस्तिष्क सकारात्मक विचारों से भर जाता है,शरीर ऊर्जावान हो जाता है.कहते हैं कि कल्पवास करने वाले लोगों से कई तरह के रोग दूर रहते हैं क्योंकि यह समय होता है आत्म शुद्धि और आत्म नियंत्रण का.अमूमन हम अपने गृहस्थ जीवन में कई बार बेचैन होते हैं और ईश्वर को ढूंढने का प्रयास करते हैं,उससे जुड़ने की कोशिश करते हैं.इसलिए कल्पवास का यह एक महीना वह समय होता है जब हम सांसारिक मोह-माया से दूर,गृहस्थी जीवन को पीछे छोड़कर एक महीने सिर्फ और सिर्फ ईश्वर की आराधना करते हैं,ईश्वर को याद करते हैं,जप-तप,भजन-कीर्तन करते हैं.

    (रिपोर्ट-प्राची शर्मा, प्रयागराज)

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