मैं तीर्थों का राजा प्रयागराज हूं, आस्था के साथ ही आजादी की लड़ाई का भी रहा हूं साक्षी
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मैं तीर्थों का राजा प्रयागराज हूं, आस्था के साथ ही आजादी की लड़ाई का भी रहा हूं साक्षी
संगम नगरी प्रयागराज का पौराणिक महत्व रहा है.

मेरे नाम की व्याख्या लोग कुछ इस तरह से करते हैं. 'प्र' यानि बहुत बड़ा और 'याग' यानि यज्ञ. 'प्रकृष्टो यज्ञो अभूद्यत्र तदेव प्रयागः इस प्रकार से मेरा नाम 'प्रयागराज' (Prayagraj) पड़ा.

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  • Last Updated: August 30, 2020, 7:35 AM IST
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प्रयागराज. मैं तीर्थों का राजा प्रयागराज (Prayagraj) हूं. मेरा वर्णन सिर्फ इतिहास (History) में ही नहीं बल्कि वेदों, पुराणों और उपनिषदों में भी बड़ी महत्ता के साथ किया गया है. मैं सिर्फ नगर ही नहीं, बल्कि पूरे भारत (India) के आस्थावान लोगों के आस्था का केन्द्र भी हूं. मेरी गोद में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती खेला करती हैं. इस पावन धरती पर ऋषियों के ऋषि महर्षि भारद्वाज की तपोस्थली और आश्रम स्थित है. यहीं पर भगवान श्रीराम चन्द्र सीता और लक्ष्मण जी ने वन जाते हुए पहला प्रवास किया. मैं राम की चरणों की धूल भी हूं. हां, मैं प्रयागराज हूं.

मेरे नाम में ही छिपा है मेरा अस्तित्व

मेरे नाम की व्याख्या लोग कुछ इस तरह से करते हैं. 'प्र' यानि बहुत बड़ा और 'याग' यानि यज्ञ. 'प्रकृष्टो यज्ञो अभूद्यत्र तदेव प्रयागः इस प्रकार से मेरा नाम 'प्रयागराज' पड़ा. मेरे नाम का दूसरा मतलब भी है. वह स्थान जहां बहुत से यज्ञ हुए हों. पृथ्वी को बचाने के लिए भगवान ब्रह्मा ने यहीं पर एक बहुत बड़ा यज्ञ अनुष्ठान किया था. इस यज्ञ में ब्रह्मा स्वयं पुरोहित, भगवान विष्णु यजमान और भगवान शिव उस यज्ञ के देवता बनकर पधारे थे. यज्ञ के अंत में तीनों देवताओं ने अपनी शक्ति पुंज के द्वारा पृथ्वी के पाप बोझ को हल्का करने के लिए एक 'वृक्ष' उत्पन्न किया. यह एक बरगद का वृक्ष था, जिसे आज अक्षयवट के नाम से जाना जाता है. यह वृक्ष किले में आज भी विद्यमान है.



रघुकुल के राजा भागीरथ अपने पूर्वजों को तारने के लिए मां गंगा को पृथ्वी पर लाये. मेरी गोद में ही मां गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती की त्रिवेणी का भी वास है. समुद्र मंथन के बाद अमृत कलश की कुछ बूंदें यहां पर गिरने से संगम की धरती भी पावन हो उठी और तीन हजार सालों से कुम्भ और महाकुम्भ का भी आयोजन होता चला आ रहा है. भगवान श्री राम चौदह वर्ष का वनवास पूरा करने और लंकापति रावण का अंत कर अयोध्या लौटने के दौरान भी प्रयागराज ही आये थे. उन्होंने यहीं पर ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति के लिए कोटि शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की आराधना की थी.
1853 में अकबर ने बदल दी थी मेरी पहचान

धर्म और अध्यात्म के नगर प्रयागराज की पहचान 1853 में बदल गयी. मुगल शासक बादशाह अकबर ने यमुना के तट पर एक शानदार किले का निर्माण कराया और प्रयागराज का नाम बदलकर अल्लाहाबाद कर दिया. जिसके बाद कालान्तर में मैं इलाहाबाद के नाम से मशहूर हो गया. गुलामी के इस नाम के साथ मेरा वास्ता 435 वर्षों तक बना रहा. अंग्रेजी राज के दौरान मैं कई वर्षों तक संयुक्त प्रान्त की राजधानी के तौर पर भी जाना जाता रहा. 1857 की पहली आजादी की क्रान्ति में मैं चौदह दिनों तक अंग्रेजों की गुलामी से आजाद रहा और मेरी छाती पर चौदह दिनों तक आजादी का झंडा लहराता रहा. कठिन संघर्षों के बाद जब देश आजाद हुआ, और उत्तर प्रदेश राज्य का गठन हुआ.

आजादी की लड़ाई का भी साक्षी हूं

मैं प्रदेश के चार बड़े महानगरों में से एक था. लेकिन संगम, द्वादश माधव, नागवासुकी, अलोपशंकरी शक्ति पीठ के कारण पूरे भारत में मैं तीर्थ के रुप में प्राचीन काल की भांति स्थापित रहा है. हांलाकि देश की आजादी के दौरान कई बड़े बदलाव भी हुए. यहीं पर अल्फ्रेड पार्क में खुद को गोली मारकर चन्द्रशेखर आजाद ने अपनी शहादत दी. तो वहीं स्वराज भवन और आनंद भवन भी आजादी की लड़ाई के दौरान स्वतन्त्रता सेनानियों का प्रमुख केन्द्र रहा. आजादी के पहले की इमारतों में पब्लिक लाइब्रेरी, इलाहाबाद हाईकोर्ट, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी, खुसरो बाग आज भी मेरी शान को बढ़ा रही है.

1853 में अकबर ने बदल दी थी मेरी पहचान

धर्म और अध्यात्म के नगर प्रयागराज की पहचान 1853 में बदल गयी. मुगल शासक बादशाह अकबर ने यमुना के तट पर एक शानदार किले का निर्माण कराया और प्रयागराज का नाम बदलकर अल्लाहाबाद कर दिया. जिसके बाद कालान्तर में मैं इलाहाबाद के नाम से मशहूर हो गया. गुलामी के इस नाम के साथ मेरा वास्ता 435 वर्षों तक बना रहा. अंग्रेजी राज के दौरान मैं कई वर्षों तक संयुक्त प्रान्त की राजधानी के तौर पर भी जाना जाता रहा. 1857 की पहली आजादी की क्रान्ति में मैं चौदह दिनों तक अंग्रेजों की गुलामी से आजाद रहा और मेरी छाती पर चौदह दिनों तक आजादी का झंडा लहराता रहा. कठिन संघर्षों के बाद जब देश आजाद हुआ, और उत्तर प्रदेश राज्य का गठन हुआ.

आजादी की लड़ाई का भी साक्षी हूं

मैं प्रदेश के चार बड़े महानगरों में से एक था. लेकिन संगम, द्वादश माधव, नागवासुकी, अलोपशंकरी शक्ति पीठ के कारण पूरे भारत में मैं तीर्थ के रुप में प्राचीन काल की भांति स्थापित रहा है. हांलाकि देश की आजादी के दौरान कई बड़े बदलाव भी हुए. यहीं पर अल्फ्रेड पार्क में खुद को गोली मारकर चन्द्रशेखर आजाद ने अपनी शहादत दी. तो वहीं स्वराज भवन और आनंद भवन भी आजादी की लड़ाई के दौरान स्वतन्त्रता सेनानियों का प्रमुख केन्द्र रहा. आजादी के पहले की इमारतों में पब्लिक लाइब्रेरी, इलाहाबाद हाईकोर्ट, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी, खुसरो बाग आज भी मेरी शान को बढ़ा रही है.

सेहत से ज्यादा स्वाद को वरीयता

प्रयागराज के सफर को मज़ेदार बनाने का काम करते हैं यहां के मशहूर और लजीज़ ज़ायके. सुबह होते ही दुकानों पर कचौड़ी-सब्जी बनने का सिलसिला शाम को इमरती और चाट पर ही खत्म होता है. नमकीन से लेकर मीठे तक स्नैक्स की ढेरों वैराइटी यहां मौजूद है जो पूरी तरह से आप पर निर्भर करता है कि खाना क्या है. पूर्वांचल के खानपान में जो अलग बात नज़र आती है वो ये कि यहां मसालों को भरपूर इस्तेमाल किया जाता है. यहां सेहत से ज्यादा स्वाद को वरीयता दी जाती है.
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