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प्रयागराज:-पातालपुरी मंदिर जहां स्थित है बेहद प्राचीन और ऐतिहासिक अक्षय वट और सरस्वती कूप

प्रयागराज:-पातालपुरी मंदिर जहां स्थित है बेहद प्राचीन और ऐतिहासिक अक्षय वट और सरस्वती कूप

प्रयागराज

प्रयागराज स्थित पातालपुरी मंदिर

प्रयागराज में संगम तट के किनारे स्थित है बेहद प्राचीन पातालपुरी मंदिर. इस मंदिर में 40 देवी-देवता विराजमान हैं.यहां मौजूद अक्षयवट और सरस्वती कूप श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है. अगर बात करें अक्षय वट की तो यह वह पवित्र बरगद का वृक्ष है, जिसका कभी नाश नहीं हो सकता.यह चार युगों से यहां विद्यमान है.

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    संगम नगरी.. प्रयागराज का धर्म और आस्था से गहरा नाता रहा है. यहां सैकड़ों ऐसे मंदिर मौजूद है जो अलग-अलग देवताओं को समर्पित हैं.इनमें से कुछ मंदिर बेहद प्राचीन है,इन्ही में से एक पातालपुरी मंदिर भी है.जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है,यह स्थान जमीन के नीचे है. संगम तट के किनारे मौजूद है, ऐतिहासिक अकबर का क़िला और इस किले के अंदर एक तहखाने जैसे स्थान में यह मंदिर आज भी अपनी कई विशिष्टताओं के साथ विद्यमान है.
    चीनी यात्री ह्वेनसांग अपनी भारत यात्रा के दौरान यहां आए थे और इस स्थान का दौरा किया था.उस समय यह स्थान एक टीले के रुप में था.मुगलकाल में जब अकबर ने यहां किले का निर्माण करवाया तो पुराना मंदिर और ऐतिहासिक वृक्ष अक्षयवट पृथ्वी के धरातल से नीचे हो गए.

    <b>मंदिर में विद्यमान है 44 देवी-देवता</b>
    आप जब इस स्थान पर घूमने जाएंगे तो आपको स्वर्ग और नर्क की मान्यता का सार पता चलेगा. कहने का तात्पर्य है कि जब आप सीढ़ियां उतर कर नीचे जाएंगे तो प्रवेश द्वार पर आपको धर्मराज की मूर्ति दिखाई देगी और जब आप सीढ़ियां चढ़कर बाहर निकलेंगे तो आपको मृत्यु के देवता यमराज की मूर्ति दिखाई देगी. बीच में एक पतला गलियारा है यह स्थान है हमारे कर्म का स्थान पृथ्वीलोक. इसके अलावा मंदिर परिसर में छठवीं शताब्दी की मूर्तियां भी विद्यमान है, देवांगन की दीवारें भी हैं जिसे अकबर ने ढकवा दिया था. यहां वह स्थान भी मौजूद है जहां त्रेता युग में माता सीता ने अपने कंगन दान किए थे इस स्थान पर गुप्त दान किया जाता है. भगवान अपने अर्धनारीश्वर रूप में विराजमान है, साथ ही तीर्थों के राजा प्रयाग की भी प्रतिमा है. यहां भगवान शनि को समर्पित एक अखंड ज्योति है, जो 12 महीने प्रज्वलित होती रहती है.

    <b>यहां मौजूद है सरस्वती कूप और अक्षय वट</b>
    यहां मौजूद अक्षयवट और सरस्वती कूप श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है. अगर बात करें अक्षय वट की तो यह वह पवित्र बरगद का वृक्ष है, जिसका कभी नाश नहीं हो सकता.यह चार युगों से यहां विद्यमान है. मंदिर के पुजारी संदीप नाथ गोस्वामी बताते हैं कि भगवान श्री राम, माता सीता और भाई लक्ष्मण त्रेता युग में यहां आए थे और इस वृक्ष के नीचे तीन रात्रि विश्राम किया था. साथ ही यह भी मान्यता है कि जब प्रलय आएगी और संपूर्ण पृथ्वी जलमग्न रहेगी, उस समय भी अक्षयवट का अस्तित्व बरकरार रहेगा.
    सरस्वती कूप या काम्यकूप वह स्थान है जहां पहले लोग कूदकर अपनी जान दे देते थे,उनका मानना था कि इसके जल से मोक्ष की प्राप्ति होती है. अकबर ने अपने शासनकाल में इसे ढकवा दिया था. वर्तमान में इस स्थान पर कूंए का ढका हुआ भाग ही दिखाई देता है. जब आप इस स्थान पर जाएंगे तो आपको लाल रंग से चिन्हित एक गोलाकार जगह दिखाई देगी.बताया जाता है कि यह वही सरस्वती कूप है जिसे अकबर ने अपने शासनकाल में ढकवा दिया था.
    इस स्थान से अनेकों ऐसी कहानियां जुड़ी हैं, जो आपको बेहद रोचक लगेंगी. बेहद प्राचीन मूर्तियां और कहानियां लोगों को यहां घूमने के लिए आकर्षित करती हैं.
    <b>(रिपोर्ट- प्राची शर्मा)</b>

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