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प्रयागराज:-जैन धर्म का प्रमुख तीर्थ स्थल है कौशांबी स्थित प्रभाष गिरी पर्वत

प्रयागराज:-जैन धर्म का प्रमुख तीर्थ स्थल है कौशांबी स्थित प्रभाष गिरी पर्वत

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प्रयागराज से लगभग 60 किलोमीटर दूर स्थित है एक बेहद प्राचीन, खूबसूरत और धार्मिक स्थल प्रभास गिरी पर्वत. जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है एक ऐसा स्थान जहां प्रभास नाम का पहाड़ है.यह क्षेत्र कौशांबी के पभोसा गांव में स्थित है.यह स्थान जैन धर्म के लिए उनकी तीर्थस्थली है,साथ ही अन्य लोगों के लिए यह बेहद खूबसूरत पर्यटन स्थल भी है.

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    प्रयागराज से लगभग 60 किलोमीटर दूर स्थित है एक बेहद प्राचीन, खूबसूरत और धार्मिक स्थल प्रभास गिरी पर्वत. जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है एक ऐसा स्थान जहां प्रभास नाम का पहाड़ है.यह क्षेत्र कौशांबी के पभोसा गांव में स्थित है.यह स्थान जैन धर्म के लिए उनकी तीर्थस्थली है,साथ ही अन्य लोगों के लिए यह बेहद खूबसूरत पर्यटन स्थल भी है.यमुना नदी के दोआब क्षेत्र में स्थित इस स्थान की कई कहानियां हैं जो यहां के गांव वाले सुनाते हैं. यहां प्रभास गिरी नाम का एक पर्वत है जहां जैन मंदिर स्थित है.184 सीढ़ियां चढ़कर जब आप मंदिर पहुंचेंगे तो यहां आपको कई बेहद प्राचीन मूर्तियां मिलेंगी जो जमीन से खुदाई के दौरान निकाली गयी थीं.वर्तमान में इस क्षेत्र में चार जैन मंदिर है, पांच मंदिर तलहटी में और दो पहाड़ी पर स्थित हैं.

    जैन धर्म का प्रमुख तीर्थ स्थल है प्रभास गिरी
    जैन धर्म परंपरा के छठवें तीर्थंकर भगवान पद्मप्रभु ने इसी पहाड़ी पर तप किया और ज्ञान प्राप्त किया.प्रभाष गिरी से कुछ किलोमीटर दूरी पर ही भगवान पद्मप्रभु का जन्म भी हुआ था.इस स्थान पर भगवान पदम प्रभु के जीवन की कई कहानियों का चित्रण किया गया है,साथ ही मंदिर परिसर में एक मान स्तंभ भी बनाया गया है. ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति नास्तिकता के साथ मंदिर के अंदर प्रवेश करता है, मान स्तंभ के दर्शन मात्र से ही उसके अंदर का काम, क्रोध,कपट जैसे अंधकार दूर हो जाते हैं. यहां आस-पास में जैन पुरातत्व संबंधी सामग्री और मूर्तियां बहुत मिलती हैं.उत्खनन से प्राप्त अनेक चतुर्मुखी प्रतिमा से युक्त मान स्तंभ के अवशेष,अन्य विभिन्न मूर्तियां खोजी गई है.

    हिन्दूओं के लिए भी है खास
    मान्यता है कि यमुना तट पर स्थित यहां के जंगलों में ही भगवान श्री कृष्ण ने अपनी देह का त्याग किया था.जरा नाम की एक बहेलिया ने जब श्रीकृष्ण को हिरण समझकर पर तीर चलाया तभी उनकी मृत्यु हो गई.साथ ही यहां पर रोहित गिरी भी मौजूद है जहां श्री कृष्ण का एक मंदिर है.मंदिर में बहुला गाय की भी प्रतिमा है जिसकी अपनी अलग कहानी है. दरअसल एक समय में यहां चंद्रवती पुरी थी जहां राजा चंद्रसेन का राज था.इसी गांव में एक ब्राह्मण रहा करता था जिसके पास बहुला नाम की एक गाय हुआ करती थी,बहुला रोज इसी पहाड़ पर आकर चरती थी.एक बार गाय को सिंह ने पकड़ लिया, बहुला गाय अपने छोटे से बछड़े को याद करके रोने लगी. वह सिंह से कहने लगी कि बस मुझे एक बार जाने दो मैं अपने बछड़े को दूध पिला कर वापस आ जाऊंगी,वह अभी बहुत छोटा है. सिंह उसकी बात मानने को तैयार नहीं था वह कहने लगा मुझे भूख लगी है, मैं तुम पर विश्वास नहीं कर सकता.बहुला के बहुत समझाने पर सिंह ने उसे जाने दिया लेकिन वह जानता था कि बहुला गाय लौटकर नहीं आएगी.गाय अपने घर पहुंची,अपने बछड़े को पकड़ कर रोने लगी उसे दूध पिलाया और सारी कहानी बता कर वापस आने लगी. उसका बच्चा रोने लगा, गाय के साथ वाले रोने लगे. सिंह ने जब देखा कि बहुला गाय ने अपने वचन का पालन किया,वह कितनी सच्ची है तो उसके अंदर का अंधकार दूर हो गया और सत्य को देख कर उसे ईश्वर के दर्शन हुए, उसने कहा कि मां मुझे माफ कर दो मैंने आज तक बहुत सारे पाप किए है लेकिन तुम्हारे सत्य ने आज मुझे सही रास्ता दिखाया है. मंदिर में स्थित बहुला गाय की प्रतिमा लोगों के लिए पूजनीय है.

    (रिपोर्ट-प्राची शर्मा)

    Tags: Kaushambi news

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