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माघ मेले में दंड़ी सन्यासियों ने खेली फूलों की होली, अबीर गुलाल उड़ाकर संतो ने ली विदाई
Allahabad News in Hindi

Sarvesh Dubey | News18 Uttar Pradesh
Updated: February 8, 2020, 5:42 PM IST
माघ मेले में दंड़ी सन्यासियों ने खेली फूलों की होली, अबीर गुलाल उड़ाकर संतो ने ली विदाई
माघ मेले में दंड़ी सन्यासियों ने खेली फूलों की होली

अखिल भारतीय दंडी स्वामी परिषद के संरक्षक स्वामी महेशाश्रम महाराज ने बताया कि संगम की रेती पर अनादि काल से कल्पवास की परंपरा चली आ रही है. इस परंपरा को देवताओं ने शुरू किया था, जिसे बाद में ऋषियों मुनियों ने अपना लिया है.

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प्रयागराज. प्रयागराज (Prayagraj) में संगम की रेती पर लगे माघ मेले (Magh Mela) में माघी पूर्णिमा की पूर्व संध्या पर साधु संतों की फूलों की होली का भव्य नजारा देखने को मिला. होली का पर्व भले ही अभी दूर है, लेकिन माघ मेले में आये साधु संतों ने फूलों की होली खेलकर होली के त्यौहार का आगाज कर दिया है. दंडी सन्यासियों ने परंपरा के मुताबिक दंडी बाड़ा के मठ मछली बंदर में फूलों और अबीर गुलाल उड़ाकर जमकर होली खेली. वैदिक मंत्रोच्चार के बीच संतो ने एक दूसरे पर अबीर गुलाल उड़ाये और पुष्प वर्षा भी की.

साधु संतों की इस भव्य और दिव्य होली को देखने के लिए पहुंचे भक्तों पर भी साधु संतों ने फूल बरसाकर और अबीर गुलाल उड़ाकर उन्हें आशीष प्रदान किया. इस मौके पर मंच पर विराजे साधु संतों ने एक माह तक संगम की रेती पर हुए कल्पवास के बाद एक दूसरे से भेंट मुलाकात की रस्म अदा की. परंपरा के अनुसार पौष पूर्णिमा से लेकर माघी पूर्णिमा तक कल्पवास के बाद मेले से विदा लेने से पहले साधु संत फूलों की होली खेलते हैं और माघी पूर्णिमा के स्नान के बाद अपने मठ मंदिरों को चले जाते हैं. जिसके बाद अगले साल फिर से माघ मेले में ही दंडी सन्यासी फिर एक-दूसरे से मिलते हैं.

देवताओं ने शुरू की थी कल्पवास की परंपरा
अखिल भारतीय दंडी स्वामी परिषद के संरक्षक स्वामी महेशाश्रम महाराज ने बताया कि संगम की रेती पर अनादि काल से कल्पवास की परंपरा चली आ रही है. इस परंपरा को देवताओं ने शुरू किया था, जिसे बाद में ऋषियों मुनियों ने अपना लिया है. उनके मुताबिक दंडी समाज सनातनी परंपरा और सिद्धान्तों को आगे बढ़ाते हुए हर वर्ष होली मिलन का आयोजन करता है.



इस आयोजन से जहां एक दूसरे से मिलना जुलना होता है, वहीं आभार प्रकट करने के साथ ही अगले साल फिर से मिलने का वायदा लेकर दंडी सन्यासी एक दूसरे से विदा लेते हैं. अखिल भारतीय दंडी स्वामी परिषद के अध्यक्ष स्वामी ब्रह्माश्रम महाराज के बताते हैं कि दंडी सन्यासियों की होली मिलन की परंपरा काफी पुरानी है. इसमें विचारों का भी मिलन हो जाता है. इस आयोजन के साथ ही माघी पूर्णिमा स्नान कर मां गंगा को प्रणाम करते हैं और सभी साधु संत मेले से विदा भी लेते हैं.

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First published: February 8, 2020, 5:41 PM IST
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