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हिंदी भाषा से जुड़े साहित्यकारों की कर्मस्थली रही है संगमनगरी

जाने-माने

जाने-माने हिन्दी साहित्य के स्तंभकार

प्रयागराज हमेशा से साहित्यिक आंदोलनों का केंद्र रहा है. जिसके चलते यहां ऐसे-ऐसे साहित्यकार हुए या यहां आकर रच-बस गए.

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    अगर बात करें भाषा की तो भाषा के विकास में, उसे बढ़ावा देने में उससे संबंधित साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान होता है. हिंदी भाषा की विकास यात्रा में भी हिंदी साहित्य ने अहम भूमिका निभाई है. हिंदी साहित्य (hindi literature)वक्त की सीढ़ियां चढ़ता गया और समाज में उस पायदान पर पहुंचा जहां से लोग आज इसे गर्व के साथ पढ़ते हैं. लेकिन इन सभी के बीच उन सभी साहित्यकारों को भी याद करना चाहिए जो हिंदी भाषा की आत्मा है. ऐसे कई साहित्यकार हुए जिन्होंने हिंदी में अपनी गौरवशाली रचनाएं लिखी और समाज को आईना दिखाया. एक रोचक बात यह है कि 18वीं और 19वीं शताब्दी के अनेकों साहित्यकार संगम नगरी की पावन भूमि से जुड़े हैं. बेशक उनका जन्म यहां या कहीं और हुआ हो लेकिन उन सभी की कर्मस्थली प्रयागराज ही रही है.
    गंगा जमुना तहजीब प्रेरणा रही है कई महान साहित्यकारों की. प्रयागराज साहित्यिक आंदोलनों का केंद्र भी रहा है. महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत, रामकुमार वर्मा, प्रेमचंद, धर्मवीर भारती, नरेश मेहता जैसे कई नाम है जिन्होंने इस धरती को अपनी कर्मस्थली बनाया और समाज को अपनी रचनाओं के रूप में बहुत कुछ दे गए. इसलिए प्रयागराज प्रदेश की साहित्यिक राजधानी(literature capital) के रूप में भी जानी जाती है. संक्षेप में कहें तो प्रयागराज हिंदी भाषा के विकास यात्रा का साक्षी रहा है. यही वह स्थान है जहां हिंदी भाषा वक्त के साथ पली-बढ़ी. अगर यूं कहें कि इलाहाबादियत और हिंदी भाषा का गहरा नाता है तो यह गलत नहीं होगा.

    इलाहाबाद संग्रहालय में संजोई गई है साहित्यकारों की यादें
    प्रयागराज से हिंदी साहित्यकारों का गहरा नाता रहा. इलाहाबाद विश्वविद्यालय, हिंदुस्तानी अकादमी जैसे कई स्थान हैं जहां महान साहित्यकारों ने काम किया और अपनी रचनाएं लिखी. इसी क्रम में इलाहाबाद संग्रहालय में मौजूद है-
    सुमित्रानंदन पंत विथिका(sumitranandan pant gallery). जहां प्रयागराज से जुड़े और राष्ट्रीय स्तर के जाने-माने साहित्यकारों की व्यक्तिगत वस्तुएं, असली पांडुलिपि मौजूद हैं जो आज की पीढ़ी के लिए सुरक्षित की गई हैं. सुमित्रानंदन पंत ने अपनी सारी व्यक्तिगत वस्तुओं को म्यूजियम में दान दे दिया जिसके बाद सुमित्रानंदन पंत वीथिका की स्थापना हुई. इसमें सुमित्रानंदन पंत का ज्ञानपीठ पुरस्कार, ताम्रपत्र, चश्मा, कलाकृतियां आदि मौजूद है. छायावाद की स्तंभ कहें जाने वाली महादेवी वर्मा की लिखी पांडुलिपि,पत्र शामिल है. रामकुमार वर्मा का पद्म पुरस्कार, टाई  ,मुंशी प्रेमचंद की पर्सनल डायरी भी रखी गई है. ऐसे ही अन्य साहित्यकारों की कृतियां और समान म्यूजियम में संरक्षित हैं.

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