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UP: अयोध्या में BSP के ब्राह्मण सम्मेलन से पहले पढ़ लें इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश

विजय चंद्र श्रीवास्तव का कहना है कि इस मामले में याचिकाकर्ता या कोई भी दूसरा व्यक्ति अदालत में अवमानना का केस दाखिल कर सकता है.

विजय चंद्र श्रीवास्तव का कहना है कि इस मामले में याचिकाकर्ता या कोई भी दूसरा व्यक्ति अदालत में अवमानना का केस दाखिल कर सकता है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) के वकील विजय चंद्र श्रीवास्तव के मुताबिक़, इस मामले में आठ साल से ज़्यादा का वक़्त बीतने के बाद भी किसी भी पार्टी ने आज तक अपना जवाब दाखिल नहीं किया है. लिहाजा 2013 के बाद इस मामले में दोबारा कभी सुनवाई नहीं हो सकी है.

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प्रयागराज. बहुजन समाज पार्टी (BSP) शुक्रवार को उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण सम्मेलन (Brahmin Convention) की शुरुआत करेगी. भगवान राम की नगरी अयोध्या में होने वाले पहले सम्मेलन के ज़रिये बीएसपी जहां ब्राह्मणों वोटरों को रिझाने की कोशिश करेगी, वहीं विधानसभा चुनावों के लिए इसे मायावती के शंखनाद के तौर पर भी देखा जा रहा है. हालांकि, बीएसपी के इस ब्राह्मण सम्मेलन पर विवाद खड़ा हो गया है, क्योंकि इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने यूपी में सियासी पार्टियों के जातीय सम्मेलनों व रैलियों पर पाबंदी लगा रखी है. ऐसे में मामला एक बार फिर से न सिर्फ अदालत की दहलीज तक जा सकता है, बल्कि इस पर कोर्ट या सरकार रोक भी लगा सकती है. वहीं सत्ताधारी बीजेपी ने इसे बसपा की हताशा और निराशा करार दिया है.

यूपी में चार बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज़ हो चुकी मायावती की बहुजन समाज पार्टी 23 जुलाई को अयोध्या में ब्राह्मणों के सम्मेलन का आयोजन कर सूबे में कुछ महीनों बाद होने वाले विधानसभा चुनाव का बिगुल फूंकने जा रही है. हालांकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट की रोक के बावजूद एक जाति विशेष का यह सम्मेलन कैसे होगा, इस पर विवाद भी है और सवाल भी. हाईकोर्ट के आदेश की फ़िक्र न तो बीएसपी को है और न ही उस योगी सरकार को, जिस पर आदेश का पालन कराने की ज़िम्मेदारी है. दरअसल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 11 जुलाई साल 2013 को मोती लाल यादव द्वारा दाखिल पीआईएल संख्या 5889 पर सुनवाई करते हुए यूपी में सियासी पार्टियों द्वारा जातीय आधार पर सम्मेलन- रैलियां व दूसरे कार्यक्रम आयोजित करने पर पाबंदी लगा दी थी. जस्टिस उमानाथ सिंह और जस्टिस महेंद्र दयाल की डिवीजन बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा था कि सियासी पार्टियों के जातीय सम्मेलनों से समाज में आपसी मतभेद बढ़ते हैं और यह निष्पक्ष चुनाव में बाधक बनते हैं. अदालत ने जातीय सम्मेलनों पर पाबंदी लगाते हुए चुनाव आयोग और सरकार के साथ ही चार प्रमुख पार्टियों कांग्रेस -बीजेपी, सपा और बसपा को नोटिस जारी कर उनसे जवाब तलब कर लिया था और सभी से हलफनामा देने को कहा था.

 उसे सख्ती से रोकना भी चाहिए
इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकील विजय चंद्र श्रीवास्तव के मुताबिक़, इस मामले में आठ साल से ज़्यादा का वक़्त बीतने के बाद भी किसी भी पार्टी ने आज तक अपना जवाब दाखिल नहीं किया है. लिहाजा 2013 के बाद इस मामले में दोबारा कभी सुनवाई नहीं हो सकी है. अधिवक्ता विजय चंद्र श्रीवास्तव का कहना है कि आठ सालों से सुनवाई भले ही ठप्प पड़ी है, लेकिन 11 जुलाई 2013 को लगाई गई पाबंदी आज भी बरकरार है. ऐसे में बसपा सम्मेलन करती है तो यह सीधे तौर पर कोर्ट की अवमानना होगी. उनके मुताबिक़, इस तरह के जातीय सम्मेलनों पर रोक लगाना सरकार की ज़िम्मेदारी बनती है. सरकार को न तो ऐसे सम्मेलनों के लिए अनुमति देनी चाहिए और साथ ही अगर जाति के नाम पर कहीं भी सम्मेलन या कार्यक्रम आयोजित होते हैं, तो अदालत के आदेश का अनुपालन कराते हुए उसे सख्ती से रोकना भी चाहिए.

खुद हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल करेंगे
विजय चंद्र श्रीवास्तव का कहना है कि इस मामले में याचिकाकर्ता या कोई भी दूसरा व्यक्ति अदालत में अवमानना का केस दाखिल कर सकता है. अदालत इस पर सुओ मोटो यानी स्वतः संज्ञान ले सकती है. पार्टी के साथ उसके प्रमुख पदाधिकारियों और सम्मेलन से जुड़े नेताओं के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है. विजय श्रीवास्तव का कहना है कि अगर बीएसपी के ब्राह्मण सम्मेलनों के आयोजन के लिए सरकार या स्थानीय प्रशासनिक अमले की तरफ से अनुमति दी गई है तो यह हैरानी की बात है, क्योंकि अगर एक पार्टी के जातीय सम्मेलनों पर रोक नहीं लगेगी तो आने वाले दिनों में दूसरी पार्टियां भी खुलकर जातीय कार्ड खेलने की कोशिश करेंगी. उनका कहना है कि बीएसपी के ब्राह्मण सम्मेलनों पर रोक लगाए जाने की मांग को लेकर वह खुद हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल करेंगे.

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