Amethi Lok sabha Result 2019, अमेठी लोकसभा रिजल्ट 2019: कांग्रेस के अभेद्य किले में स्मृति ईरानी ने लगाई सेंध, जानिए जीत की 10 वजहें

अमेठी में केंद्रीय मंत्री और बीजेपी प्रत्याशी स्मृति ईरानी ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को 55120 वोटों से हरा दिया है.

News18 Uttar Pradesh
Updated: May 24, 2019, 9:19 AM IST
Amethi Lok sabha Result 2019, अमेठी लोकसभा रिजल्ट 2019: कांग्रेस के अभेद्य किले में स्मृति ईरानी ने लगाई सेंध, जानिए जीत की 10 वजहें
अमेठी में केंद्रीय मंत्री और बीजेपी प्रत्याशी स्मृति ईरानी ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को 55120 वोटों से हरा दिया है.
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Updated: May 24, 2019, 9:19 AM IST
अमेठी में केंद्रीय मंत्री और बीजेपी प्रत्याशी स्मृति ईरानी ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को 55120 वोटों से हरा दिया है. स्मृति को 468514, वहीं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को 413394 वोट मिले हैं. इस लोकसभा सीट को कांग्रेस के अभेद्य दुर्ग के रूप में जाना जाता था. आखिर स्मृति ईरानी कैसे कांग्रेस के किले को ध्वस्त करने में कामयाब हुईं? आइए जानते हैं कुछ प्रमुख कारण...

नरेंद्र मोदी ने कहा छोटी बहन


2014 में जब पहली बार स्मृति ईरानी चुनाव लड़ने अमेठी पहुंची थीं तो एक बात ने सभी का ध्यान वहां खींचा था. जिले में एक चुनावी रैली के दौरान तब के बीजेपी के पीएम प्रत्याशी नरेंद्र मोदी ने कहा था कि स्मृति उनकी छोटी बहन की तरह हैं. एक लोकप्रिय पीएम कैंडिडेट द्वारा यह बात कहे जाने के बाद पूरे देश में इसे लेकर खूब चर्चाएं हुई थीं. कहा जाता है कि अमेठी में उस बार नरेंद्र मोदी की उस रैली का बहुत असर पड़ा था और राहुल गांधी अब तक के सबसे छोटे अंतर से जीते थे.

अमेठी में गांधी परिवार

अमेठी गांधी पारिवार की पारंपरिक सीट मानी जाती है. लंबे समय से यह सीट परिवार के पास है. इस सीट पर 2019 से पहले हुए सभी लोकसभा चुनावों में सिर्फ एक बार बीजेपी जीत हासिल कर सकी थी. 1999 से यह सीट पहले सोनिया गांधी फिर राहुल गांधी के पास रही है. माना जा रहा है कि लंबे समय से गांधी परिवार के पास यह सीट रही है, इस वजह से जनता ने यहां से बदलाव का मूड बनाकर वोट किया. हालांकि ऐसा माना जाता है कि अमेठी के लोग गांधी परिवार से अपनी नजदीकी मानते हैं, लेकिन इसके बावजूद इस बार राहुल गांधी को मुश्किलों का सामना करना पड़ा.

बीजेपी के निशाने पर था अमेठी
भारतीय राजनीति में प्रतीकों का बेहद महत्व रहा है. अमेठी की सीट पर कांग्रेस अध्यक्ष की हार सामान्य हार के तौर पर नहीं याद की जाएगी. बीजेपी इस बात को जानती है. इसी वजह से लगातार इस सीट को लेकर फोकस बनाए रखा गया. बीते पांच सालों के दौरान बीजेपी की तरफ से इस सीट पर लगातार निगाह रखी गई. 2014 की हार को 2019 में जीत में तब्दील करने के लिए सारी जान झोंकी गई.
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स्मृति ईरानी के लगातार दौरे
सामान्य तौर पर देखा जाता है कि जिस सीट पर उम्मीदवारों की हार हो जाती है वहां पर उनकी सक्रियता कम हो जाती है, लेकिन स्मृति का मामला इससे अलग है. 2014 की 'छोटी हार' ने एक तरीके से उनके हौसले को बढ़ा दिया था. पांच सालों में उन्होंने 42 बार अमेठी के दौरे किए. स्थानीय कार्यकर्ताओं में यह भरोसा जगाया कि इस सीट से भी कांग्रेस को हराया जा सकता है. एक वेबसाइट में प्रकाशित एक रिपोर्ट में बीजेपी के स्थानीय नेता कहते हैं कि 2014 में स्मृति ने अमेठी में सिर्फ 15 दिन गुजारे थे. उन्हें यहां के लोगों का भरपूर स्नेह मिला था. चुनाव प्रचार के दौरान स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी को लापता सांसद भी कहा था. स्थानीय बीजेपी नेता बताते हैं कि स्मृति ईरानी ने मोदी सरकार की योजनाओं को क्षेत्र में पहुंचाने के बहुत से प्रयास किए.



विकास का पहिया कमजोर
अमेठी के बारे में एक शिकायत यह भी की जाती है कि लंबे समय से इस क्षेत्र ने गांधी परिवार को लोकसभा भेजा, लेकिन ये इलाका विकास मापदंडों पर पिछड़ा रहा. राहुल गांधी इस सीट पर 2004 से लगातार जीतते रहे, लेकिन जब विकास की बात हुई तो अमेठी हमेशा पिछली पायदान पर ही खड़ा दिखाई दिया. स्थानीय लोगों में इस बात को लेकर एक आम राय हुई. बीजेपी ने इस दौरान अपना कनेक्ट यहां की जनता से बढ़ाने की कोशिश की जिसका नतीजा स्मृति ईरानी की जीत के रूप में नजर आया.

पूरे यूपी में ढहा कांग्रेस का किला
बात महज अमेठी की नहीं है. पूरे उत्तर प्रदेश में ही कांग्रेस किला भरभरा गया है. कभी यूपी कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था. लेकिन बीते कुछ दशकों के दौरान पार्टी की पकड़ इस राज्य में बेहद कमजोर हुई है. दो दशकों से ज्यादा समय तक सपा और बसपा ने यूपी की राजनीति पर राज किया. लेकिन 2014 में बीजेपी की प्रचंड कामयाबी के बाद तो चौथे पायदान पर नजर आ रही है. पूरे प्रदेश में सिर्फ रायबरेली की एक सीट पर पार्टी को जीत नसीब हो पाई. महागठबंधन और बीजेपी के बीच सीधा मुकाबला दिखाई दिया. भले ही कांग्रेस ने चुनाव प्रचार में सभी का ध्यान खींचा हो, लेकिन ये वोटों में तब्दील नहीं हो पाया.

बीजेपी का मजबूत प्रचार तंत्र
अमेठी में बीजेपी की जीत में पार्टी के मजबूत प्रचार तंत्र ने भी बेहद सटीक तरीके से काम किया. पार्टी के अलावा आरएसएस के सभी संगठनों ने प्रचार में जबदस्त भूमिका निभाई. डोर टू डोर कैंपेनिंग के जरिए मतदाताओं को ये भरोसा दिलाया गया कि अमेठी का भविष्य स्मृति ईरानी हैं, राहुल गांधी नहीं. सोशल मीडिया से लेकर जमीनी प्रचार तक बीजेपी कांग्रेस से कहीं आगे नजर आई. इसके उलट राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष होने के नाते पूरे देश में चुनाव प्रचार पर ध्यान देना था, इस वजह से वो यहां अपना ध्यान पूरी तरीके से नहीं दे पाए. हालांकि यहां उनके प्रचार की जिम्मेदारी उनकी बहन प्रियंका गांधी पर थी लेकिन वो भी कोई कमाल नहीं दिखा सकीं.

लंबे समय से सांसद राहुल गांधी
इस सीट से स्मृति ईरानी की जीत में एक अहम कारण यह भी माना जा रहा है कि राहुल गांधी या गांधी परिवार यहां पर लंबे समय से काबिज है. आम जनता के बीच इस बार सीट पर एकाधिकार के नैरेटिव को तोड़ना भी अहम मुद्दा रहा. कहा जा सकता है कि लंबे समय से एक परिवार के पास इस सीट के होने की वजह से जबरदस्त एंटी इंकंबैंसी फैक्टर ने भी काम किया.

2014 में जीत का फासला छोटा



2014 में राहुल की जीत का छोटा मार्जिन वो पहली शै थी जहां से बीजेपी का यह विश्वास पक्का हो गया कि यह कांग्रेसी दुर्ग ढहाया जा सकता है. इस वजह से पांच सालों के शासन के दौरान कभी भी इस सीट पर फोकस कम नहीं किया गया. ऐसा लगा जैसे स्मृति ईरानी पिछले पांच सालों से इस समय का इंतजार कर रही थीं.

चुनावी क्षेत्र से कट गए थे राहुल
राहुल की इस बड़ी चुनावी हार के पीछे एक यह भी कारण बताया जा रहा है कि वो अपने चुनावी क्षेत्र से कट गए थे. भले ही यहां की जनता का परिवार की वजह से उनसे कनेक्ट बना हुआ था, लेकिन खुद राहुल की तरफ से ऐसे कोई प्रयास नहीं किए जिससे जनता का विश्वास जीता जा सके.

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