ANALYSIS: क्या मुसलमानों पर चल पाएगा प्रियंका गांधी का जादू?

रोड शो में प्रियंका गांधी के साथ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया भी मौजूद थे. यह रोड शो एयरपोर्ट से कांग्रेस ऑफिस तक था.

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Updated: February 11, 2019, 9:36 PM IST
ANALYSIS: क्या मुसलमानों पर चल पाएगा प्रियंका गांधी का जादू?
(फाइल फोटो- प्रियंका गांधी)
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Updated: February 11, 2019, 9:36 PM IST
यूसुफ़ अंसारी

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस लोकसभा चुनाव से पहले अपनी पूरी ताकत झोंकने में जुट गई है. इसका नजारा लखनऊ में राहुल गांधी के साथ प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया के रोड शो में दिखा. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और ज्योतिरादित्य सिंधिया के सहारे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को खड़ा करना चाहते हैं. इसीलिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं. लेकिन असल बात यह है कि कांग्रेस चुनाव से पहले अपनी ताकत दिखा कर उत्तर प्रदेश के मुसलमानों को अपनी तरफ खींचने की कोशिश कर रही है.

इस कोशिश में वह कितना कामयाब हो पाएगी इसका आंंकलन करने के लिए हमें उत्तर प्रदेश की राजनीति के कई पहलुओं पर गौर करना होगा. उत्तर प्रदेश मेंं 18.5 फ़ीसदी मुसलमान हैंं. सोलहवीं लोकसभा में उत्तर प्रदेश से एक भी मुस्लिम सांसद नहीं है. आम तौर पर मुसलमानों का रुझान उस राजनीतिक दल को वोट देना होता है जो बीजेपी को हराने की स्थिति में हो. मौजूदा स्थिति में सपा-बसपा गठबंधन प्रदेश की हर लोकसभा सीट पर बीजेपी के मुकाबले ज्यादा मजबूत नजर आ रहा है.



लिहाजा मुस्लिम एकजुट होकर इस गठबंधन की तरफ जाता हुआ दिख रहा है. कांग्रेस की हालत उत्तर प्रदेश में बेहद खराब है पिछले लोकसभा चुनाव में उसे जहां लोक सभा की सिर्फ 2 सीटें अमेठी और रायबरेली मिली थींं. वही विधानसभा चुनाव में कांग्रेस दहाई का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई. कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक दूसरी पार्टियों में चला गया है.

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सवर्णों ने बीजेपी की शरण ले ली है तो दलित बीएसपी की तरफ चला गया है. मुसलमान सपा-बसपा में बंट गया है. कांग्रेस की हालत को देखते हुए समाजवादी पार्टी और बीएसपी ने गठबंधन में शामिल करना मुनासिब नहीं समझा. ये गठबंधन चुनाव के बाद कांग्रेस के समर्थन से तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने के लिए ख्वाब देख रहा है.

दरअसल कांग्रेस ने सपा बसपा को दबाव में लेने के लिए ही प्रियंका को मैदान में उतारा है. कांग्रेस की रणनीति को राहुल गांधी के एक बयान से समझा जा सकता है. प्रियंका गांधी का महासचिव बनाकर पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभार देने के ऐलान के बाद राहुल गांधी ने कहा था कि उन्होंने प्रियंका गांधी को सिर्फ दो चार महीनों के लिए उत्तर प्रदेश नहीं भेजा है बल्कि उत्तर प्रदेश में अगला मुख्यमंत्री कांग्रेस से बनवाने के लिए भेजा है.
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हाल ही में कांग्रेस महासचिवों और राज्यों के स्वतंत्र प्रभारियों की बैठक में प्रियंका गांधी ने कहा है कि जब तक उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की विचारधारा का परचम नहीं फहराया जाता तब तक वो चैन से नहीं बैठेंगी.

इन बयानों से ज़ाहिर है उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी का मकसद बीजेपी से लड़ना कम है और सपा बसपा की कब्र खोदना ज्यादा है. सपा-बसपा को तभी जमीन दिखाई जा सकती है जब कांग्रेस अपने परंपरागत मुस्लिम वोट बैंक को वापस खींच लाए.

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की चुनावी रणनीति इसी को लेकर बन रही है कि किसी भी तरह मुस्लिम वोट बैंक को अपनी तरफ खींच लिया जाए. प्रियंका गांधी को महासचिव बनाकर पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान इसलिए दी गई है कि वो मोदी और योगी के गढ़ के साथ ही वहां समाजवादी पार्टी और बीएसपी के गढ़ में भी सेंध मारकर कुछ वोट वापस ला सकें.

प्रियंका गांधी के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है. इस चुनौती से पार पाना फिलहाल मुमकिन नहीं दिखता है. दरअसल प्रियंका गांधी के कांग्रेस महासचिव बनाए जाने के बाद यह पहला चुनाव होगा जहां वो पार्टी के आधिकारिक नेता के तौर पर चुनावी रणनीति बनाएंगी और प्रचार भी करेंगी.

लिहाजा अभी से यह नहीं कहा जा सकता कि उनका जादू कितना चलेगा. अभी तक वो सोनिया गांधी की बेटी के नाते उनकी चुनावी एजेंट रहीं हैं और राहुल के भाई के नाते उनके क्षेत्र में प्रचार करती रही हैं.

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अगर देखा जाए तो अभी तक प्रियंका कोई बहुत बड़ा करिश्मा नहीं कर पाई हैंं. रायबरेली और अमेठी में लोकसभा सीट जीतने के अलावा विधानसभा चुनाव में वह कोई करिश्मा नहीं दिखा पाईंं हैं. साल 2004 में जब राहुल गांधी पहली बार अमेठी से चुनाव लड़ने गए थे तब प्रियंका रायबरेली में सोनिया गांधी की चुनाव एजेंट थी साथ ही अमेठी में भी प्रचार कर रही थींं.

तब बगल की सुल्तानपुर सीट से कांग्रेस ने कैप्टन सतीश शर्मा को मैदान में उतारा था. प्रियंका गांधी ने 3 दिन लगातार सुल्तानपुर में रहकर कैप्टन सतीश शर्मा के लिए प्रचार किया. लेकिन कैप्टन सतीश शर्मा वह सीट जीत नहीं पाए थे बल्कि तीसरे नंबर पर रहे थे.

साल 2007 और 2012 के विधानसभा चुनाव में प्रियंका गांधी कई दिन तक रायबरेली और अमेठी में डेरा डाले रहींं लेकिन कांग्रेस दो विधानसभा सीट ही जीत पाईंं. इसलिए अभी मुकम्मल तौर पर यह नहीं कहा जा सकता कि प्रियंका के आने के बाद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की लहर चलने लगेगी.

जहां तक मुस्लिम मतदाताओं का सवाल है. मुस्लिम मतदाता बहुत सोच-समझकर वोट करता है. मुसलमानों की पहली प्राथमिकता बीजेपी को हराने वाले उम्मीदवार को वोट देने की होती है. पार्टी उसके लिए दूसरी प्राथमिकता पर है. मुसलमानों की एक कोशिश यह भी रहती है कि मुस्लिम सांसद भी जीत कर लोकसभा पहुंचे जहां उसे मुस्लिम उम्मीदवार मजबूत दिखाई देता है वह पार्टी ना देख कर उसे जिताने की कोशिश भी करता है.

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देशभर से कांग्रेस का फीडबैक कहता है कि राहुल गांधी ने जिस तरह गुजरात चुनाव के बाद नरेंद्र मोदी से सीधी टक्कर ली है उससे मुसलमानों में यह संदेश गया है कि मोदी से सिर्फ राहुल गांधी लड़ रहे हैं.

लिहाजा लोकसभा चुनाव में क्षेत्रीय दलों को वोट देने के बजाय कांग्रेस को वोट देना चाहिए. इससे सभी क्षेत्रीय दलों में बेचैनी भी है. इसलिए क्षेत्रीय दल कांग्रेस के साथ गठबंधन करने में आनाकानी भी कर रहे हैं. कांग्रेस को हर राज्य में अलग से रणनीति बनानी पड़ रही है एक रणनीति थी बीजेपी से निपटने के लिए है तो दूसरी रणनीति क्षेत्रीय दलों को काबू में रखने की.

उत्तर प्रदेश में राजनीतिक समीकरण अलग तरह के है. कांग्रेस भले ही सभी 80 सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा कर रही हो लेकिन हकीकत यह है कि कांग्रेस के पास 30 सीटों पर ही मजबूत उम्मीदवार है. यानी वो 30 सीटों पर मजबूती से चुनाव लड़ सकती है. बाकी सीटों पर वह बीजेपी और सपा-बसपा गठबंधन का खेल बिगाड़ सकती है. ऐसे में मुसलमानों के लिए सपा-बसपा को छोड़कर कांग्रेस की तरफ खिंचे आने की कोई तुक नजर नहीं आ रही.

हां, कांग्रेस को उन सीटों पर मुसलमानों के वोट मिल सकते हैं जहां सपा-बसपा गठबंधन का उम्मीदवार मुस्लिम नहीं होगा और कांग्रेस का उम्मीदवार या तो मुसलमान हो या फिर सवर्ण जाति का हो और बेहद मजबूत हो. जाहिर सी बात है ऐसी सीटें बहुत कम होंगी. बहुत बड़े पैमाने पर मुसलमानों का झुकाव कांग्रेस की तरफ हो इसकी संभावनाएं कम ही दिखती है.

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वैसे कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में लोकसभा की बहुत ज्यादा सीटें मिलने की उम्मीद नहीं है. फिलहाल उसकी रणनीति प्रियंका के बहाने सपा-बसपा गठबंधन पर दबाव बनाने की है. कुछ वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं का कहना यह है कि अगर दबाव में आकर सपा-बसपा गठबंधन कांग्रेस के लिए 10 सीटें भी छोड़ देता है तो यह कांग्रेस के लिए फायदे का सौदा होगा.

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सभी 80 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार फजीहत कराने के बजाय 10 सीटों पर अकेले और 15 सीटों पर गठबंधन के साथ दोस्ताना मुकाबला कर के चुनाव लड़ने से इज्जत बच सकती है और कुछ सीटें भी हाथ लग सकती है.

सोलहवीं लोक सभा में उत्तर प्रदेश से एक भी मुस्लिम सांसद नहीं है. इसका मलाल मुस्लिम समुदाय को है. मुस्लिम समुदाय चाहता है कि सतरहवीं लोकसभा में उत्तर प्रदेश से कम से कम सम्मानजनक संख्या में मुस्लिम सांसद जीत कर लोक सभा में पहुंचे लिहाजा उसका झुकाव सपा बसपा गठबंधन की तरफ है क्योंकि इन दोनों के वोट से मुस्लिम उम्मीदवारों के जीतने की संभावना ज्यादा है.

लोकसभा चुनाव की बिसात पर कांग्रेस उत्तर प्रदेश में बुरी तरह फंसी हुई है. उसे हर कदम फूंक-फूंक कर रखना पड़ रहा है. एक तरफ से देशभर में बीजेपी से लड़ना है. तो वहीं यूपी में बीजेपी के साथ सपा-बसपा गठबंधन के साथ से शह मात के खेल में कांग्रेस के लिए हर कदम पर चुनौती है. कदम-कदम की इस चुनौती से निपटने के लिए राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को जोश से ज्यादा होश से काम लेना होगा.

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