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2019 में बीजेपी के लिए क्यों जरूरी है 'अटल' पॉलिटिक्स

गठबंधन सरकार चलाने में वाजपेयी को थी महारत
गठबंधन सरकार चलाने में वाजपेयी को थी महारत

हिंदी पट्टी के तीन राज्यों-मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हार के बाद 2019 में बीजेपी के लिए इसलिए जरूरी है अटल बिहारी वाजपेयी वाली पालिटिक्स. पार्टी को क्षेत्रीय दलों के साथ न सिर्फ गठबंधन बढ़ाना होगा बल्कि पुराने साथियों के साथ संबंध और प्रगाढ़ करने होंगे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 25, 2018, 11:59 AM IST
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मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बीजेपी की हार के बाद मोदी विरोधी दलों की एकजुटता 2014 के लोकसभा चुनाव के मुकाबले इस बार ज्यादा दिख रही है. बदलते हालात में एनडीए (नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस) में बीजेपी के सहयोगी या तो उसे आंख दिखा रहे हैं या साथ छोड़कर जा रहे हैं. दूसरी ओर राज्य स्तर पर मोदी विरोधी दलों के गठबंधन के प्रयास शुरू हो गए हैं. इससे भगवा कैंप की चुनौती बढ़ती नजर आ रही है. एनडीए में अब सिर्फ 44 पार्टियां रह गई हैं, तीन दल साथ छोड़ चुके हैं.

ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि अगर 2019 में बीजेपी को अपनी सरकार बनानी है तो उसे क्षेत्रीय दलों के साथ न सिर्फ गठबंधन बढ़ाना होगा बल्कि पुराने साथियों के साथ संबंध और प्रगाढ़ करने होंगे. वैसा काम करना होगा जैसा अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था. मतलब ये कि पीएम नरेंद्र मोदी को ‘अटल नीति’ पर चलना होगा. (ये भी पढ़ें: अटल बिहारी वाजपेयी के इस कदम से बौखला गया था पाकिस्तान! )

क्या थी वाजपेयी की गठबंधन नीति
अटल बिहारी वाजपेयी विचारधारा की दृष्टि से राजनीति के विपरीत धुव्रों को भी साधकर रखते थे. उनकी सरकार में दक्षिणपंथी विचारधारा के विरोधियों ने भी महत्वपूर्ण मंत्रालय अच्छी तरह संभाले. उनके समय में जॉर्ज फर्नांडीज जैसा समाजवादी नेता एनडीए का संयोजक था. अटल ने भारतीय राजनीति की तीन देवियों- मायावती, ममता और जयललिता को साधा. सियासी विश्लेषकों का कहना है कि विपरीत विचारधारा के लोगों को साथ लेकर चलना अटल बिहारी वाजपेयी की खूबी थी. अटल की लोकप्रियता को भुनाने की कोशिश में जुटी बीजेपी को 2019 में सत्ता पाने के लिए उनकी गठबंधन नीति को भी अपनाना पड़ेगा.
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इस समय बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए के सामने चुनौती यह है कि उसके सहयोगी या तो साथ छोड़ रहे हैं या फिर आलोचक की मुद्रा में आ चुके हैं. चंद्रबाबू नायडू की तेलगू देशम पार्टी (टीडीपी) और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (आरएलएसपी) न सिर्फ एनडीए छोड़ चुकी हैं बल्कि मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा भी खोले हुए हैं.

जम्मू एंड कश्मीर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) से तो खुद बीजेपी ने ही नाता तोड़ लिया था. बदले हालात में लोक जन शक्ति पार्टी और जनता दल युनाइटेड ने बिहार में पार्टी से सीटों की कड़ी सौदेबाजी की है. सपा, बसपा, आरजेडी, शिवसेना और इनेलो जैसे कई क्षेत्रीय दल अपना सियासी वजूद बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. जो क्षेत्रीय दल सत्ता में हैं वो भी इस जद्दोजहद में लगे हुए हैं कि कैसे कांग्रेस और बीजेपी से पार पाते हुए वापसी की जाए. (ये भी पढ़ें: क्यों 26 साल पहले बर्खास्त की गई थीं बीजेपी की चार राज्य सरकारें?)

इस समय बीजेपी की सबसे पुरानी सहयोगी पार्टी शिवसेना उससे नाराज है. अकाली दल हरियाणा में अलग चुनाव लड़ने की बात कर रहा है. यूपी में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के नेता ओम प्रकाश राजभर आए दिन बीजेपी नेताओं पर निशाना साध रहे हैं. पार्टी के दलित सांसदों की नाराजगी जग जाहिर हो चुकी है. इन्हें मनाना 2019 के लिहाज से काफी जरूरी है. शायद ये ‘अटल’ गठबंधन नीति से मान जाएं.

वरिष्ठ पत्रकार आलोक भदौरिया के मुताबिक "क्षेत्रीय पार्टियां कभी नहीं चाहतीं कि कांग्रेस या बीजेपी आगे बढ़ें. क्योंकि कांग्रेस और बीजेपी मजबूत होंगे तो वो कमजोर होंगी. क्षेत्रीय दलों की ताजपोशी कमजोर कांग्रेस और कमजोर बीजेपी ही कर सकते हैं. इसलिए क्षेत्रीय दल अपना वजूद बचाने के साथ-साथ इस कोशिश में लगे हुए हैं कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों मजबूत न होने पाएं."

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हालांकि इस वक्त भी यूपीए के मुकाबले काफी ज्यादा पार्टियां एनडीए से जुड़ी हुई हैं. फिर भी क्षेत्रीय दलों को जोड़े रखने की चुनौती सत्तारूढ़ पार्टी पर ही ज्यादा है. क्योंकि क्षेत्रीय पार्टियों का साथ कम होते ही 2019 में बीजेपी के लिए खतरा काफी बढ़ जाएगा.

वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी, अटल पर लिखी गई अपनी किताब में लिखते हैं “वाजपेयी ने देश की सबसे बड़ी गठबंधन सरकार चलाई थी और गठबंधन पर कभी अपना राजनीतिक एजेंडा थोपने की कोशिश नहीं की. गठबंधन सरकारों की बड़ी परेशानी सहयोगी दल होते हैं और उन्हें खुश रखना कोई भी फैसला करने से ज्यादा मुश्किल काम होता है. इसका सबसे ज्यादा खामियाजा वित्त मंत्री को भुगतना होता है तो नाराजगी प्रधानमंत्री को झेलनी होती है."

अमित शाह की कोशिश!
पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की यह कोशिश है कि छोटे से छोटे दलों को भी अपने साथ जोड़ कर रखा जाए, उनकी नाराजगी दूर की जाए. उन्होंने लोक जनशक्ति पार्टी को मना लिया है. इस समय एनडीए में 44 दल हैं. 2019 का चुनावी बिगुल बजा नहीं है फिर भी बीजेपी ने नए साथियों की तलाश शुरू कर दी है. सूत्रों का कहना है कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने राज्य इकाईयों के प्रमुखों से संभावित दोस्तों की लिस्ट तैयार करने को कहा गया है.

2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने ऐसी ही रणनीति अपनाई थी. माना जाता है कि बीजेपी की इतनी बड़ी जीत के पीछे क्षेत्रीय दलों से गठबंधन का बड़ा हाथ था. जब से यूपी में सपा-बसपा और बिहार में आरजेडी, आरएलएसपी और कांग्रेस ने हाथ मिलाया है तब से बीजेपी की चिंता काफी बढ़ गई है. क्योंकि यूपी में 80 और बिहार में 40 लोकसभा सीटें हैं. इतनी सीटें किसी भी पार्टी को केंद्र की सत्ता तक पहुंचा सकती हैं. इसीलिए शाह ने यूपी में मिशन 74 का नारा दिया है. पिछले चुनाव से एक सीट ज्यादा जीतने का नारा. लेकिन क्या यह गठबंधन बिना संभव है?

ऐसे में पार्टी यह कोशिश कर रही है कि न सिर्फ अपना दल और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी को जोड़कर रखा जाए बल्कि एनडीए के कुनबे को और मजबूत भी किया जाए. ऐसे में अटल बिहारी वाजपेयी की तरह गठबंधन धर्म निभाकर घोर विरोधी विचारधारा वाले दलों को भी साथ में शामिल किया जा सकता है. इसलिए बीजेपी को छोटे दलों के साथ गठबंधन के दरवाजे और दिल दोनों खुला रखना होगा. क्योंकि 2019 में 2014 जैसी सफलता आसान नहीं है.

वरिष्ठ पत्रकार मार्क टुली ने वाजपेयी के बारे में लिखा है कि ‘गठबंधन सरकार चलाने में वाजपेयी का व्यवहार बहुत काम आया. वाजपेयी के हर राजनीतिक दल में अच्छे रिश्ते रहे. उनको महागठबंधन में महारत हासिल थी. वह कैबिनेट की बैठक में भी बहुत कम बोलते और हर एक की बात सुनते थे.'

पार्टी नेताओं के साथ अमित शाह और नरेंद्र मोदी (file photo)         पार्टी नेताओं के साथ अमित शाह और नरेंद्र मोदी (file photo)

बीजेपी प्रवक्ता राजीव जेटली कहते हैं “ बीजेपी पहले भी अटल जी के बताए रास्ते पर चल रही थी, अब भी चल रही है और आगे भी चलती रहेगी. चाहे उनकी विकास परियोजनाएं हों या फिर गठबंधन नीति हो. अटल जी के समय पार्टी का जो उभार हो रहा था वो पीएम नरेंद्र मोदी और अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व में निखरकर सामने आ गया है. हमारे वरिष्ठ नेताओं ने हमेशा अपने गठबंधन साथियों को खुश रखा है और आगे भी रखेंगे.”

कैसे और कहां से होगी भरपाई?
गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों जैसे पश्चिम बंगाल, पूर्वोत्तर, ओडिशा में उसे अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद है. इसीलिए इन पर पार्टी फोकस कर रही है. लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य में उसे सीटें कम होने की चिंता सता रही है. क्योंकि यहां बीजेपी विरोधी गठबंधन मजबूत होता नजर आ रहा है. आंध्र प्रदेश में टीडीपी की भरपाई जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस कर सकती है. इसी तरह उसे अन्य राज्यों में भी नए साथियों की संभावना तलाशनी होगी.

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