• Home
  • »
  • News
  • »
  • uttar-pradesh
  • »
  • अवधी विशेष- अवधी कवितई मा गाँव-जवार कै पीरा

अवधी विशेष- अवधी कवितई मा गाँव-जवार कै पीरा

जायसी से लगाइ कै तुलसी दास तक कै भासा अवधी रही. अबौ येके स्वर मां कउनौ कमी नाही आय बा. - फोटो न्यूज 18

जायसी से लगाइ कै तुलसी दास तक कै भासा अवधी रही. अबौ येके स्वर मां कउनौ कमी नाही आय बा. - फोटो न्यूज 18

अवधी कै कुछ लोग बोली कहे कै गलती करि देत हुवै. अपने भंडारन के कारन अगर कहा जाई कि यै कउनौ भासा से कम नाहीं है, तौ बेजा बात ना होई। लेखक अवधी के वही मिठऊ लेकिन चटक असरदार आवाज कै याद करत हैं.

  • Share this:
अवधी भासा 1000 साल से भी ज्यादा पुरान भासा हुवै. अवधीभासी ज्यादातर मनई देहाती हुवैं, मजूर हुवैं, किसान हुवैं, कारीगर हुवैं. कुछ समाज मा अगड़े हये, कुछ पिछड़े. केऊ दलित बाय तौ केव वंचित. धन-दौलत से कुछ बड़मनई हये, मुला जादातर पिछड़ा हैं. जाति-सत्ता औ’ मर्द-सत्ता गाँवन मा गहिर पैठ बनाये है. देस-दुनिया कै बात-बतकही यनके सब के बीच पहुँचावै ताईं अवधी भासा से सटीक दूसर भासा नाहीं बा. बेकल उत्साही की एक पढ़ें-
हमकां रस्ता ना बतावा, हम देहाती मनई
हमरी नस नस मा अवधी है हम अवधी कां जानेन
अवधी हमकां आपन मानिस हम अवधी का मानेन
औरौ भासा ना पढ़वावा, हम देहाती मनई
पुरखै हमरे कुतुबन मंझन मलिक मोहम्मद बाबा
हमरे मुल्ला दाउद आजा यनहीं कासी काबा
हमकां आदर से गोहरावा, हम देहाती मनई’

बोली नाही हुवै अवधी

यक बात आउर बताउब जरूरी बा कि अवधी ‘बोली’ नाहीं हुवै. ‘बोली’ कहिकै येका छोट बनाउब ठीक नाहीं बा. अवधी बंग्ला, पंजाबी, मराठी, गुजराती की नाईं यक आजाद भासा हुवै. ई कउनौ गढ़ी भासा नाहीं बा, यहिका कढ़ी भासा कहि सकत हौ. जइसै कचकचाइकै फूल खिलत है, वइसनै अवधी अपनेआप विकसित भासा हुवै. अवधी कै आपन अलग लिपि नाहीं है. यही लिये येकर पहिचान नाहीं बनि पावा. अवधी बोल-बतकही कै जबानी भासा रही. मुँह से फूटी आवाज और संकेत कै विकास होत-होत ई भासा बनी. लिकिन जब याका लिक्खै कै जरूरत महसूस भै तब नागरी लिपि मा लिखा जाय लाग.

अवधी कै अथाह साहित्य भंडार

अवधी कै साहित्य भण्डार बहुत बड़ा बा. हिन्दी साहित्य मा ‘पद्मावत’ अउर ‘रामचरित मानस’ का जरूरी दरजा हासिल बा औ’ दुइनौ ग्रन्थ अवधी मा लिखा गै बा. पद्मावत तौ रामचरितमानसौ से बहुत पुरान हुवै. ठेठ अवधी वहिमा ज्यादा बा. तुलसी तौ संसकिरित, फारसी सब्दन कै बहुत प्रयोग किहे हैं.
तुलसी अउर जायसी के बाद बहुर ढेर सारे अवधी के कवि पैदा भये, जेकर हिन्दी साहित्य हिगारि कै चर्चा नाहीं करत. पढ़ीस, वंशीधर शुक्ल, रमई काका, रफीक सादानी, विश्वनाथ पाठक, रमाशंकर विद्रोही, जुमई खां ‘आजाद’ जइसन बहुत से कवि अवधी मा रचना किहे हैं जवन कि गाँव कै असिल तस्वीर पेस करत है.

टूटही मड़ई मा बइठ कै देखो
गाँव-जवार के मजूरन, किसानन, वंचितन, कां जानै क् हुवै तौ लोकगीत औ लोक कवियन कां जानब बहुत जरूरी बा. छपरा पै लौकी-कोहंड़ा चढ़ावै वाले कवितई से गाँव कै असिल तस्वीर नाहीं पेस हुवत है. जे समाज कै दंस नाहीं झेले बा ऊ खाली गाँव कै मनोहारी तस्वीर पेस करत है. साहित्य समाज कै दरपन कहहि जात है, लिकिन जाने-अनजाने समाज कै दंस औ’ अभाव वाली सच्चाई दरपन के पीछे लोगै छुपाय कै लिखत हैं जउनै वोकर तस्वीर सीसा मा ना देखाय परै. ऐसा वै लोग करत हैं जे समाजसत्ता कै सुख भोगे बाटे औ’ गाँव के वंचित-पीड़ित कै दुःख-दर्द कां महसूस नाहीं पउते. गाँव के जमीदार के ऊंच कुरसी पै बैठ कै गाँव देखै मा, औ’ सूअरबाड़े के पास टुटही मड़ई मा बइठ कै गाँव देखै मा - दुइनौ मा बहुत अंतर हुवत है.

अउरो कवि हैं

दूसर बात ई है कि अपनी मादरी बोली-बानी मा लिखे से भोगा हुआ, देखा हुआ औ’ महसूस कीन गवा यथार्थ बहुत असरकारी रूप मा अभिव्यक्त हुवत है. यही कारन है कि अवधी कवितई औ’ लोकगीत ज्यादा मार्मिक अउर असरकारी हुवत है. जहाँ आज हिंदी साहित्य मा अकविता कै चलन है वहीं अवधी कवियन कै कवितई औ’ लोकगीतन कां सुना जाय तौ जिउ जूड़ ह्वै जाय.
गुरू प्रसाद सिंह ‘मृगेश’ की कविता से गुजरा जाय –
‘तुम करौ कवितई बंद, बुढ़उनू जुग बदला.
पछियाव बही पुरव्इया, सबिहौं का बदलि रवैया
ई प्रगतिवाद के जग मा को पूछे कवित सवैया
ई दुर्मिल मत्त-गयंद, बुढ़उनू जुग बदला.’

अवधी सोहर

यक अवधी सोहर पढ़ा जाय, जेहिमा राम जी के छठ पूजा के दिन हिरन कै सिकार होइ जात है औ’ ऊ रसोई कै आइटम बनि जात है. हिरनी कौसल्या माई के पास जात है औ’ हिरन कै खलरी (खाल) माँगत है. लिकिन कौसिल्या माई खलरी नाहीं देतीं. वे कहिन् कि हमरे राम जब बड़ा होइहैं तौ हम यहि खलरी कै खझड़ी मिढ़ाइब जेसे हमरे लाल खेलिहैं –
‘मचिया ई बैठीं कौसिल्या रानी हिरनी अरज करै हो
रानी मसवा तौ चुरिहैं रसोइया खलरिया हमकां देतिऊ हो
पेड़वा पै टंगती खलरिया कि फिर-फिर देखतिउं हो
हे रानी देखि-देखि हिया भरमइतौं बुझतौं हिरना जीयत हो’

कौसिल्या माई कहत हैं कि –
‘जाव हिरनी जाव घर आपन खलरिया नाहीं देबै हो
हिरनी खलरी कै खझड़ी मिढ़इबै राम मोरे खेलिहैं हो’

हिरनी बड़े अनमने मुँह लटकाये लउट आवत है औ’ छिहुली (ढाक) के पेड़ के नीचे खड़ी होइ जात है. जब-जब खझड़ी कै आवाज आवत है तौ हिरनी कान उटेरि कै सुनत है औ अपने हिरना कै याद करत है –
जब-जब बाजै खझड़िया सबद सुनि अनकै हो
हे रामा ! छिहुली तरे ठाढ़ हिरनिया हिरनवां का बिसुरै हो’

यहि गीत कै ख़ास बात ई है कि ई बिरह-गीत अउर प्रेम-गीत दुइनौ है. यही मेर बहुत सारे अवधी लोकगीत बूढ़ी-बुजुर्ग महिलाओं को याद बाटै जो नये समाज संरचना मा लुप्तप्राय हुवत जात बा. यहिका सिरजै वाला काम नाहीं भै. अबह्यूं सौंकेर बा. बचा-खुचा बचि जाय उहै बहुत बा.

कुछ अउर कवियन मा ‘वंशीधर शुक्ल कै ‘अछूत कै होरी’ पढ़ा जाय-
हमैं ई होरिउ झुरसावैं
खेत बनिज ना गोरू गैया ना घर दूध न पूत
मड़ई परी गाँव के बाहर सब जन कहैं अछूत
द्वार कोऊ झंकइउ ना आवै
हमैं ई होरिउ झुरसावैं’

उत्तर प्रदेश के मुसहर जाति कै व्यथा-कथा माता प्रसाद ‘मितई’ कुछ यहि तरह से बयान करत हैं –
‘नावं मुसहरवा बा कउनौ सहरवा ना
कइसै बीती जिनगी हमार
मेघा औ’ मगर गोह साँप मूस खाई हम
करी गिलहरिया सिकार
कुकुरा के साथ धाई जूठी पतरिया पै
पेटवा है पपिया मड़ार.
अब ढकुलहिया मा पतवा मिलत नाहीं
कैसे बनई पतरी तोहार
दुलहा दुलहिनी कै डोलिया ढोवत रहे
उहौ रोजी छीनी मोटर कार’

क्रांति के स्वर

जुमई खां ‘आजाद’ के येक क्रांतिकारी गीत कै जिकर जरूर है-
‘बड़ी-बड़ी कोठिया सजाया पूंजीपतिया
दुखिया कै रोटिया चोराय-चोराय
अपनी महलिया मा किह्या उजियरवा
झोपड़ी मा अगिया लगाय-लगाय
कतहूँ बनी भिटवा कतहुं बनी गड़ही
कतहूँ बनी महला कतहुं बनी मड़ई
मटिया कै दियना तुहीं तौ बुझवाया
सोनवा कै बेनवा डोलाय-डोलाय’

अंत मा हम अपने अवधी ग्राम-गाथा से तीन छंद पेस करत हई. ई हमरे लरिकइयाँ कै देखी –सुनी औ’ महसूस कीन गवा कवितई हुवै-

सूअरबारा उजरी कोठरी, चुप्पे घुसरी ग़ुरबत पसरी
फुटही खपरी मुँह बाये परी, झिलरी खटिया कथरी-गुदरी

चूल्हा आगे टुटही खाँची, खाँची मा आमे कै पाती
डुडुवायँ बिरावैं माँग खायँ, मंगता-जोगी औ’ सन्यासी

कूकुर-बिलार घर ना झाकैं, मुसरी घुसरैं ना डेहरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह, बचा बा पाहीमाफी मा

टुटहा जस्ता दुइ-यक बरतन, ज्यों साँझ ढलै बाजै खनखन
जब खाय कां घर मा ना आटै, तब खायँ मरा डांगर जबरन

खरिहान कै गोहूँ खाय-खाय जो गोबर बैलय करत रहे
वोका बटोरि सुखवाय लियैं, फिर पीट-पाट कै पीस लियैं

दुःख-वीर दलिद्दर दलित रहे, गोबरहा अन्न मजबूरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह, बचा बा पाहीमाफी मा
अवधी मा तौ कवितई औ’ गीत-गवनई कै भंडार बा. लिकिन गद्य औ’ किहानी बहुत कम लिखि जात बा. आधुनिक साहित्यकारेन मा भारतेंदु मिश्र, प्रकाश चन्द्र गिरि, लिक गायक ब्रिजेश यादव,शैलेन्द्र कुमार शुक्ल, अरुण कुमार तिवारी व अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी जैसे साहित्यकार, आलोचक,  कवि , लेखक अवधी भासा के विकास के लिए जी-जान से लगे हैं. हम्मैं उम्मीद बा कि अवधी अपने आजाद भासा के तौर पर स्थापित होई औ’ अवधी साहित्य के दर्पण मा मेर-मेर कै तस्बीर देखे परी.

पढ़ें Hindi News ऑनलाइन और देखें Live TV News18 हिंदी की वेबसाइट पर. जानिए देश-विदेश और अपने प्रदेश, बॉलीवुड, खेल जगत, बिज़नेस से जुड़ी News in Hindi.

विज्ञापन