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अयोध्या विवाद और सुप्रीम कोर्ट के फैसले से किसे क्या मिला?

Mohd Shabab | News18 Uttar Pradesh
Updated: November 25, 2019, 1:33 PM IST
अयोध्या विवाद और सुप्रीम कोर्ट के फैसले से किसे क्या मिला?
अयोध्या विवाद में कई फर्श से अर्श तक पहुंचे.

असल में साल 1853 में जब अयोध्या विवाद ने जन्म लिया और उसके बाद जब इस मामले का राजनीतिकरण हुआ तो इससे जुड़े तमाम लोग अर्श से फर्श तक पहुंच गए.

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अयोध्या. अयोध्या विवाद (Ayodhya Dispute) पर 9 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुना दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने विवादित जमीन का मालिकाना हक रामलला (Ramlala) को दिया है, जबकि सुन्नी वक्फ बोर्ड (Cunni Waqf Board) को कोर्ट ने मस्जिद के लिए अयोध्या में ही अलग जगह 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया. इसके साथ ही कोर्ट ने सरकार को 3 महीने के भीतर ट्रस्ट बनाकर मंदिर निर्माण की रुपरेखा तय करने के लिए भी कहा. आपको बता दें कि चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने यह फैसला सर्वसम्मति से सुनाया.

मामले का राजनीतिकरण हुआ

असल में साल 1853 में जब अयोध्या विवाद ने जन्म लिया और उसके बाद जब इस मामले का राजनीतिकरण हुआ तो इससे जुड़े तमाम लोग अर्श से फर्श तक पहुंच गए. हालांकि उनमें तमाम लोग ऐसे भी रहे जो इस पूरे मामले को सिर्फ अक मुकदमें के तौर पर देखते थे और दिली तौर पर इससे जुड़े. हाशिम अंसारी, हाजी महमूद, परम हंस राम चंद्र दास, सत्येंद्र दास, महंत दिग्विजय नाथ, महंत अवैद्यनाथ, देवरहा बाबा, महंत नृत्यगोपाल दास, राम विलास वेदांती, अशोक सिंहल, कल्याण सिंह, उमा भारती, विनय कटियार, लाल कृष्ण आडवानी, विष्णु हरि डालमियां, जफरयाब जिलानी, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जैसे तमाम संगठन औऱ लोगों की फेहरिस्त बहुत लंबी है जो इस मुद्दे के इर्ग-गिर्द रहे या फिर इस मामले का फेस भी बने.

किसी भी नेता या संस्था से कुछ नहीं मांगा: इकबाल

बाबरी मस्जिद के पक्षकार और अयोध्या के रहने वाले इकबाल अंसारी जो कि हाशिम अंसारी के बेटे हैं कहतें हैं कि हमारे पिता ने कभी इस मु्दे से कुछ फायदा उठाने की जरूरत नही समझी. कभी किसी नेता या संस्था से कुछ नहीं मांगा और वही परंपरा हमने भी कायम रखी. हमने अपने पुश्तैनी काम को किया और हमारे बच्चे भी वही काम कर रहे हैं. वरिष्ठ पत्रकार और राजनीति के जानकार रतममणिलाल कहतें हैं कि मैने अपनी आंखों से इस मामले को मुद्दा बनते देखा है. मैने इस चीज को भी समझा है कि कैसे इस मामले ने लोगों को बना दिया. वहीं ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पूर्व सदस्य मौलाना सलमान नदवी कहतें हैं कि जिन्होंने इस मुद्दों को तिजारत बनाया उन्होंने इसका फायदा उठाया. बाकि तो इस मुद्दे से दिल से जुड़े लोग थे.

इस मामले में उस वक्त को भी नहीं भूलना चाहिए जब मुस्लिम और हिंदू पक्षकार एक ही रिक्शे पर मुकदमा लड़ने जाया करते थे. अयोध्या में हाशिम अंसारी और राम चंद्र परमहंस दास की ये मोहब्बत भी नस्लों के लिए एक उदाहरण बनी. हालांकि वक्त के गुजरने के साथ बहुत कुछ बदलते हुए भी देखा गया. कई फर्श से अर्श तक बढ़े तो बहुत अयोध्या में ही खड़े होकर अयोध्या को बदलते हुए देखते रहे.

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First published: November 25, 2019, 1:33 PM IST
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