अयोध्या में बन रही मस्जिद में न गुंबद होगा और न ही मीनारें, जानें क्‍या होगा खास

अयोध्या में बन रही मस्जिद में नहीं होगा गुंबद और मीनार (प्रतीकात्मक तस्वीर)
अयोध्या में बन रही मस्जिद में नहीं होगा गुंबद और मीनार (प्रतीकात्मक तस्वीर)

इस मस्जिद (Mosque) कॉम्प्लेक्स की लाइब्रेरी, म्यूज़ियम आदि सभी धर्म, जाति और वर्गों के लोगों के लिए होगा. इसलिए यहां सबके लिए कुछ न कुछ खास होगा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 21, 2020, 1:12 PM IST
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अयोध्या. अयोध्या में प्रस्तावित मस्जिद कॉम्प्लेक्स (Ayodhya Masjid Complex) के लिए विस्तृत योजनाओं पर काम शुरू हो चुका है. खास बात है कि अयोध्या में बन रही मस्जिद में गुंबद और मीनारें नहीं होंगी. धन्नीपुर में बन रही मस्जिद का आकार चौकोर हो सकता है. इंडो इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन (IICF) के सचिव और प्रवक्ता अतहर हुसैन सिद्दीकी ने कहा कि अयोध्या के धन्नीपुर गांव में 15000 वर्ग फीट क्षेत्र में मस्जिद बनायी जानी है. आर्किटेक्ट प्रोफेसर एसएम अख्तर ने बताया कि धन्नीपुर मस्जिद की इस्लामिक कल्चर के तहत डिजाइन तैयार कर रहे हैं.

एसएम अख्‍तर ने बताया कि ट्रेडिशनल इस्लामिक आर्किटेक्चर में गुंबद और मीनार का प्रयोग नहीं होता है. इसलिए इस बार अयोध्या में बन रही मस्जिद का अलग आकर होगा. 15000 स्क्वायर फीट में मस्जिद का निर्माण का कार्य किया जाएगा. इस मस्जिद का नाम बाबरी मस्जिद के नाम पर नहीं रखा जाएगा.

सांप्रदायिकता से ऊपर होगा ये निर्माण
मस्जिद निर्माण प्रक्रिया में क्‍यूरेटर के तौर नियुक्‍त प्रोफेसर पुष्‍पेश पंत इस मस्जिद कॉम्प्लेक्स की लाइब्रेरी, म्यूज़ियम आदि सभी धर्म, जाति और वर्गों के लोगों के लिए होगा. इसलिए यहां सबके लिए कुछ न कुछ खास होगा. इससे पहले आर्किटेक्ट प्रोफेसर अख्तर भी कह चुके हैं मस्जिद और कॉम्प्लेक्स के डिज़ाइन में इंडो इस्लामिक कल्चर और साझा संस्कृति की झलक होगी. अख्तर के मुताबिक यह निर्माण न तो पुरानी शैली का होगा और न ही पुरानी तकनीक का.
चप्पे चप्पे पर होंगी 'अवध' की यादें


तकरीबन 418 वर्गमीटर के दायरे में बनने के लिए प्रस्तावित म्यूज़ियम और लाइब्रेरी में 'अवध' पूरी तरह दिखेगा. म्यूज़ियम में इंडो इस्लामी संस्कृति के बेहतरीन निर्माणों जैसे रूमी दरवाज़ा, इमामबाड़ा, मज़ारों और मंदिरों के मॉडल्स बतौर यादगार रखे जाएंगे. लाइब्रेरी में उर्दू ​की अहम किताबों के हिंदी अनुवाद होंगे. प्रोफेसर पंत इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर चुके हैं और उन्हें उम्मीद है कि अगले 2 सालों में काम पूरा हो जाएगा.
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