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Ayodhya Verdict: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हाईकोर्ट का फैसला ‘कानूनी रूप से टिकाऊ’ नहीं था

भाषा
Updated: November 10, 2019, 4:48 AM IST
Ayodhya Verdict: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हाईकोर्ट का फैसला ‘कानूनी रूप से टिकाऊ’ नहीं था
इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांटना शांति और स्थिरता के लिए भी वह सही नहीं था. (फाइल फोटो)

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने अयोध्या मामले (Ayodhya Case) के अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि विवादित जमीन के बंटवारे से किसी का हित नहीं सधेगा और ना ही स्थाई शांति और स्थिरता आएगी.

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नई दिल्ली. उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने अयोध्या मामले में शनिवार को दिए अपने ऐतिहासिक फैसले के दौरान कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय का 2010 का फैसला ‘कानूनी रूप से टिकाऊ’ नहीं था. इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) ने 2010 में विवादित 2.77 एकड़ जमीन को सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच तीन हिस्सों में बांट दिया था.

जमीन के बंटवारे से स्थाई शांति और नहीं स्थिरता आएगी
देश के सामाजिक ताने-बाने को लगातार चुनौती दे रही अयोध्या मामले की कानूनी लड़ाई पर पर्दा गिराते हुए शीर्ष अदालत ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि जमीन के बंटवारे से किसी का हित नहीं सधेगा और ना ही स्थाई शांति और स्थिरता आएगी.

उच्च न्यायालय ने ऐसा रास्ता चुना जो खुला हुआ नहीं था

सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि 30 सितंबर, 2010 के अपने फैसले में उच्च न्यायालय ने ऐसा रास्ता चुना जो खुला हुआ नहीं था और ऐसी राहत दी जिसकी मांग उनके समक्ष दायर मुकदमों में नहीं की गई थी.

स्थिरता बनाए रखने के लिहाज से भी हाईकोर्ट का फैसला सही नहीं था
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई. चन्द्रचूड, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर शामिल हैं. पीठ ने कहा, हम पहले ही इस नतीजे पर पहुंच चुके थे कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांटा जाना कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं था. यहां तक कि शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिहाज से भी वह सही नहीं था.
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अन्य मामलों में नहीं बनाया गया था रामलला को पक्ष
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा कि यह तय करते हुए कि रामलला विराजमान की ओर से दायर याचिका बेवक्त तो नहीं थी, हमें एक बात का ख्याल रखना होगा कि अन्य मामलों में रामलला को पक्ष नहीं बनाया गया था. यानी उपासक गोपाल सिंह विशारद, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड ने अपनी अर्जियों में रामलला को पक्ष नहीं बनाया था.

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First published: November 10, 2019, 3:48 AM IST
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