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Ayodhya Verdict: सुप्रीम कोर्ट ने माना, मुख्य गुम्बद के नीचे का हिस्सा भगवान राम की जन्मभूमि

भाषा
Updated: November 10, 2019, 6:16 AM IST
Ayodhya Verdict: सुप्रीम कोर्ट ने माना, मुख्य गुम्बद के नीचे का हिस्सा भगवान राम की जन्मभूमि
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि, उपासक गोपाल सिंह विशारद, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड ने अपनी अर्जियों में रामलला को पक्ष नहीं बनाया था. (राम मंदिर का प्रतीकात्मक चित्र)

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने मुस्लिम पक्ष (Muslim Side) की इस दलील को खारिज कर दिया कि रामलला विराजमान की ओर से दायर याचिका (Petition) बेवक्त है क्योंकि घटना 1949 की है और याचिका 1989 में दायर की गई है.

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नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई (Chief Justice Ranjan Gogoi) की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने ने शनिवार को अयोध्या मामले में दिए अपने ऐतिहासिक निर्णय में इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) के फैसले के इस हिस्से को बरकरार रखा कि मुख्य गुम्बद के नीचे का हिस्सा भगवान राम की जन्मभूमि है. संविधान पीठ ने कहा कि यह तय करते हुए कि रामलला विराजमान की ओर से दायर याचिका बेवक्त नहीं थी, हमें एक बात का ख्याल रखना होगा कि अन्य मामलों में रामलला को पक्ष नहीं बनाया गया था. इसका अर्थ यह है कि उपासक गोपाल सिंह विशारद, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड ने अपनी अर्जियों में रामलला को पक्ष नहीं बनाया था.

रामलला की ओर से दायर मुकदमा बेवक्त नहीं क्योंकि उनकी लगातार पूजा हो रही थी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 1989 में ‘भगवान श्रीरामलला विराजमान’ की ओर से दायर याचिका बेवक्त नहीं थी क्योंकि अयोध्या में विवादित मस्जिद की मौजूदगी के बावजूद उनकी ‘पूजा-सेवा’ जारी रही. ‘नियंत्रण का कानून’ तकलीफ में आए पक्ष को एक तय सीमा के भीतर अपनी ओर से मुकदमा/अपील दायर करने को कहता है.

कोर्ट ने नहीं माना यह तर्क

22/23 दिसंबर, 1949 को मुख्य गुंबद के नीचे कथित रूप से प्रतिमा रखे जाने के बाद संपत्ति जब्त कर ली गई और सुन्नी बक्फ बोर्ड को कथित रूप से उस जमीन से हटा दिया गया. उसे इस घटना के 12 साल के भीतर शिकायत दर्ज कराने का अधिकार था. कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया कि रामलला विराजमान की ओर से गलत समय पर याचिका दायर की गई है क्योंकि घटना 1949 की है और याचिका 1989 में दायर की गई है.

कभी बंद नहीं हुई रामलला की सेवा-पूजा
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा कि मुकदमा संख्या 5 में दोनों, पहले (रामलला) और दूसरे (जन्मभूमि) का अपना-अपना न्यायिक व्यक्तित्व है. पहले पक्ष का न्यायिक व्यक्तित्व उपासकों से अलग है. पीठ ने कहा कि 29 दिसंबर, 1949 में विवादित संपत्ति की जब्ती के बावजूद महत्वपूर्ण बात यह है कि रामलला की ‘सेवा-पूजा’ कभी बंद नहीं हुई.

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First published: November 10, 2019, 2:37 AM IST
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