ANALYSIS: शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे भगवान राम की शरण में बार-बार अयोध्या क्यों आ रहे हैं?

महाराष्ट्र की राजनीति में कम से कम दौरा करने वाले नेताओं में शुमार शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे पिछले 8 महीने में 2 बार अयोध्या आ चुके हैं. वो भी पूरी राजनीतिक तैयारी के साथ. क्या हैं इसके मायने?

Anil Rai | News18 Uttar Pradesh
Updated: June 17, 2019, 12:08 PM IST
ANALYSIS: शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे भगवान राम की शरण में बार-बार अयोध्या क्यों आ रहे हैं?
पार्टी के सांसदों के साथ शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे रविवार को अयोध्या पहुंचे थे. (फोटो- पीटीआई)
Anil Rai
Anil Rai | News18 Uttar Pradesh
Updated: June 17, 2019, 12:08 PM IST
महाराष्ट्र की राजनीति में कम से कम दौरा करने वाले नेताओं में शुमार शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे पिछले 8 महीने में 2 बार अयोध्या आ चुके हैं. वो भी पूरी राजनीतिक तैयारी के साथ. पहली बार जब उद्धव ठाकरे 25 नवंबर 2018 को अयोध्या आए, तो उस समय लोकसभा चुनावों की आहट तेज हो चुकी थी. बीजेपी और शिवसेना के रिश्ते तल्ख थे इसलिए शिवसेना ने पहले वहां रैली करने का ऐलान किया और बात बनती देख रैली स्थगित भी कर दी.

इस बार न तो चुनाव है और न ही बीजेपी से शिवसेना के रिश्ते तल्ख हैं. ऐसे में शिवसेना प्रमुख के अयोध्या दौरे के बाद राजनीतिक कयासों का दौर तेज है, क्योंकि राजनीति में कुछ भी बेवजह नहीं होता. ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि आखिर अपने सांसदों और बेटे आदित्य के साथ अयोध्या पहुंचे उद्धव ठाकरे ने राम मंदिर मुद्दे पर बीच का रास्ता क्यों लिया? क्योंकि शिवसेना की पहचान आक्रामक राजनीति से होती है.

राम मंदिर मुद्दे को किनारे नहीं किया जा सकता
उद्धव ठाकरे ने अपने पिता बाल ठाकरे को राजनीति करते हुए देखा है. इससे उनको एक बात का अंदाजा तो जरूर होगा कि धर्म को भले ही राजनीति से अलग करने की बात होती है लेकिन धर्म के बिना राजनीति होती नहीं है. ऐसे में राम मंदिर का मुद्दा भले ही चार दशक पुराना हो लेकिन अभी भी उससे किनारे नहीं किया जा सकता.

महाराष्ट्र की राजनीति में भी अयोध्या का प्रभाव
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण एक ऐसा मुद्दा है, जिसका असर उत्तर भारत के बाद सबसे ज्यादा महाराष्ट्र में है. इसके दो प्रमुख कारण हैं. पहला, महाराष्ट्र के शहरों में उत्तर भारतीयों की अच्छी खासी तादाद और दूसरा, 1992 में विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद हिंसा की जद में सबसे ज्यादा मुंबई ही आई थी. ऐसे में अयोध्या मुद्दा महाराष्ट्र के चुनावों में खासा असर डाल सकता है.

Ayodhya: Shiv Sena chief Uddhav Thackeray along with newly-elected party MPs arrive to offer prayers at the makeshift Ram Lalla temple, in Ayodhya, Sunday, June 16, 2019. Shiv Sena MP Sanjay Raut is also seen. (PTI Photo)(PTI6_16_2019_000038B)
पार्टी के नवनिर्वाचित सांसदों के साथ भगवान राम की नगरी में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे. साथ में संजय राउत. (फोटो- पीटीआई)

एक दौर में महाराष्ट्र की राजनीति में बीजेपी के बड़े भाई की भूमिका में रहने वाली शिवसेना की पहचान देश की राजनीति और खासकर महाराष्ट्र में उग्र हिंदुत्व वाली पार्टी के रूप में रही है, लेकिन बाल ठाकरे के निधन के बाद 2014 में हुए पहले ही विधानसभा चुनाव में शिवसेना ने अपने बड़े भाई होने का दर्जा खो दिया.

चुनाव के लिए शिवसेना ने अपने मोहरे चलने शुरू कर दिए
यहां तक कि 2014 के विधानसभा चुनाव में दोनों (बीजेपी-शिवसेना) का गठबंधन टूट गया और बीजेपी ने अकेले दम पर महाराष्ट्र के सत्ता की चाभी अपने हाथ में ले ली. 2019 का लोकसभा चुनाव भले ही दोनों दलों ने एक साथ लड़ा हो, लेकिन चुनावों से पहले सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों दलों की तल्खी कई बार आमने सामने भी आई. ऐसे में विधनासभा चुनाव में ज्यादा से ज्याद सीटे लेने के लिए शिवसेना ने अभी से अपने मोहरे चलने शुरू कर दिए हैं.

शिवसेना दबाव बनाए रखेगी
महाराष्ट्र की राजनीति पर करीब से नजर रखने वाले लोगों का मानना है कि अयोध्या में राम मंदिर मुद्दे पर आक्रमक होकर शिवसेना बीजेपी पर दबाव बनाने में लगी है, क्योंकि ये दबाव लोकसभा चुनाव में काम कर चुका है. हालांकि बीजेपी नेता चंद्रकांत पाटिल ये दावा कर चुके हैं कि दोनों पार्टियां विधानसभा चुनावों में बराबर-बराबर सीटों पर चुनाव लड़ेंगी, लेकिन जिस तरह से मंत्रिमंडल विस्तार में शिवसेना की मांग के बाद भी उसे उप-मुख्यमंत्री का पद नहीं मिला. ऐसे में जब तक गठबंधन में सीटों का औपचारिक ऐलान न हो जाए, तब तक शिवसेना दबाव बनाए रखना चाहेगी.

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