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Ayodhya Verdict: क्या हैं अयोध्या पर दिए गए फैसले के कानूनी मायने?

News18Hindi
Updated: November 9, 2019, 12:23 PM IST
Ayodhya Verdict: क्या हैं अयोध्या पर दिए गए फैसले के कानूनी मायने?
सुप्रीम कोर्ट ने आज अयोध्या पर अपना फैसला सुना दिया है. पांच जजों की पीठ ने ये फैसला सुनाया.

Ayodhya Case: सुप्रीम कोर्ट (Suprem Cuourt) ने अयोध्या की विवादित जमीन पर अपना फैसला सुना दिया है. इस फैसले को राष्ट्रीय संदर्भ में कैसे देखा जाएगा, इसकी समीक्षा कर रहे हैं सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता..

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  • Last Updated: November 9, 2019, 12:23 PM IST
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अयोध्या (Ayodhya) की विवादित जमीन को लेकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने अपना फैसला सुना दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने 2.77 एकड़ जमीन पर मंदिर बनाए जाने का रास्ता साफ कर दिया है. मंदिर निर्माण के लिए जमीन रामलला विराजमान को देते हुए कोर्ट ने सरकार को तीन महीने में ट्रस्ट बनाने का आदेश दिया है. लेकिन सवाल ये है कि इस फैसले के कानूनी मायने क्या हैं?

अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद देश के सबसे बड़े और चर्चित मुकदमे का अंत होना चाहिए, लेकिन इस फैसले के बाद दूसरे पक्षों द्वारा पुनरावलोकन या फिर क्यूरेटिव पिटिशन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. लेकिन पांच जजों द्वारा सहमति से दिए गए इस फैसले के बाद अब इसमें किसी बदलाव की गुंजाइश कम है. इस फैसले में अनेक अहम बातें कही गई हैं. विवादित स्थान पर परंपरा के आधार पर राम जन्मभूमि की मान्यता को पुरातत्व विभाग की खुदाई के प्रमाणों के आधार पर कानूनी मान्यता दी गई है. फैसले के अनुसार सुन्नी वक्फ बोर्ड अयोध्या में अन्य स्थान पर पांच एकड़ जमीन दी जाएगी, जहां पर मस्जिद का निर्माण किया जा सकता है. बाबरी मस्जिद ध्वंस करने वालों के खिलाफ इस फैसले के बावजूद, आपराधिक मामला चलता रहेगा निर्मोही अखाड़े के दावे को लिमिटेशन के आधार पर अस्वीकार करने के बावजूद, मंदिर के लिए बनाए जाने वाले नए ट्रस्ट में उन्हें प्रतिनिधित्व देने की बात कही गई है.  शिया पक्ष के दावे को भी अस्वीकार कर दिया गया है.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को अयोध्या के 1993 कानून के तहत ट्रस्ट बनाने और जमीन सौंपने के लिए निर्देश दिए हैं. तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहराव ने हलफनामा देकर कहा था कि यदि पुरातत्व विभाग की खुदाई से मंदिर के पक्ष में प्रमाण मिले तो फिर मंदिर हेतु जमीन दी जा सकती है, जिसके लिए अयोध्या कानून की धारा 6 में प्रावधान हैं. थिंक टैंक सीएएससी द्वारा प्रकाशित मेरी पुस्तक 'Ayodhya Ram temple in Courts' में इस बात विस्तार से बताया गया है. फैसले के पहले ही मैंने कहा था कि पुरातत्व विभाग की खुदाई के प्रमाणों के आधार पर केंद्र सरकार द्वारा इस जमीन को राम मंदिर के निर्माण हेतु दिया जा सकता है. अब इस पर 5 जजों की मुहर लगने के बाद यह विधिक व्यवस्था और बेहतर तरीके से पुष्ट हो गई है.

अयोध्या में विवादित जमीन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है.


न्यायिक व्यवस्था तर्क और प्रमाणों से चलती है. इसीलिए राम मंदिर के हक़ में फैसले के बावजूद सर्वोच्च अदालत ने आस्था के आधार पर हिन्दुओं के अनेक पक्षकारों द्वारा किए गए दावों को अस्वीकार कर दिया है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित स्थान को तीन भागों में विभाजित किया था, जिसे सर्वोच्च अदालत ने अस्वीकार कर दिया.

राममंदिर के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक सुखद निर्णय हैं. इस फैसले के अनेक एवं निष्कर्ष भी हैं जो आने वाले समय में न्यायिक सुधारों के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं. यह मामला पिछली दो शताब्दियों से प्रशासन और अदालतों के समक्ष विवादों से घिरा है. सुप्रीम कोर्ट में भी यह मामला नौ वर्षों से लंबित था. वर्तमान चीफ जस्टिस गोगोई ने दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए इतने पुराने मामले को दो महीने में निपटा कर एक बड़ी मिसाल कायम की है. इस सबक को यदि न्यायपालिका के सभी जजों द्वारा अपना लिया जाए तो देश में तीन करोड़ से ज्यादा लंबित मामलों का जल्द फैसला हो सकता है. सीएएससी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सितम्बर 2018 के फैसले से बड़े मामलों के सीधे प्रसारण का अनुमोदन किया था. मैंने इस मामले के सीधे प्रसारण की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट के अपने ही फैसले पर अमल की मांग की थी. उम्मीद है कि आगामी चीफ जस्टिस द्वारा सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अमल होगा जिससे न्यायपालिका में पारदर्शिता के साथ लोगों का भरोसा और बढ़ सके. सभी पक्षों द्वारा इस फैसले का सम्मान किया जाना जरूरी है, जिससे क़ानून के शासन के साथ भारत की न्यायिक व्यवस्था को एक नयी ऊंचाई मिल सके.
(विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं. विराग गुप्ता ने कानूनी आधार पर इस फैसले का विश्लेषण किया है. ट्विटर- @viraggupta)

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First published: November 9, 2019, 12:09 PM IST
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