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OPINION: कहां गए वो लोग जिन्होंने रखी थी राम मंदिर निर्माण की नींव?

अमिताभ सिन्हा | News18 Uttar Pradesh
Updated: November 15, 2019, 8:44 PM IST
OPINION: कहां गए वो लोग जिन्होंने रखी थी राम मंदिर निर्माण की नींव?
राम मंदिर निर्माण आंदोलन में लाल कृष्ण अडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, विनय कटियार, उमा भारती, प्रवीण तोगड़िया आदि बहुत सारे नेताओं का योगदान रहा है. (File Photo)

अयोध्या में राम मंदिर (Ram Temple) निर्माण को आंदोलन का स्वरूप देने में बहुत सारे नेताओं (Politicians) और कार्यकर्ताओं (Workers) ने मेहनत की. हालांकि वे आज मुख्यधारा से दूर हो गए हैं .

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नई दिल्ली. अयोध्या विवाद (Ayodhya Dispute over) खत्म हो चुका है. न तो देश का सौहार्द बिगड़ा और न ही कहीं हिंसा की कोई घटना हुई. सभी पक्षों ने फैसले को स्वीकारा और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सराहा. हालांकि, कई ऐसे चेहरे थे, जो अयोध्या आंदोलन से शुरू से जुड़े रहे और अब जब फैसला आया है तब वो या तो दुनिया में नहीं रहे या फिर राजनीति की मुख्यधारा से दूर बैठे हैं. उनके योगदान को भुलाना शायद आंदोलन चलाने वालों के लिए मुश्किल होगा, लेकिन एक बात तो साफ है कि तब के तल्ख तेवर अब कहीं नजर नहीं आ रहे हैं.

'आजादी के बाद सबसे बड़े जन आंदोलन में मेरा भी छोटा योगदान'
देश के उपप्रधानमंत्री रह चुके लालकृष्ण आडवाणी (Lal Krishna Advani) की रथ यात्रा ने अयोध्या आंदोलन को देश भर में पहुंचाया. चाहे बीजेपी के हों या फिर विपक्ष के, आज के तमाम बड़े नेताओं ने उसी आंदोलन से अपनी जड़ें मजबूत करनी शुरू की थीं.

आज आडवाणी राजनीति से दूर हैं. वो बीजेपी के मार्गदर्शक मंडल में हैं. लेकिन सुप्रीम कोर्ट का फैसला आते ही वो खुद को रोक नहीं पाए. उन्होंने एक बयान जारी कर कहा कि आज वो सही साबित हुए हैं. वर्ष 1990 में आंदोलन को नई दिशा देने वाले आडवाणी की मानें तो राम जन्मभूमि आंदोलन आजादी की लड़ाई के बाद का सबसे बड़ा जन आंदोलन था.

आडवाणी ने कहा कि उन्हें संतुष्टि इस बात की है कि इस आंदोलन में उनका भी एक छोटा सा योगदान था. ये राहत की बात है कि लोगों की भावना और भरोसे का सम्मान किया गया है. आडवाणी ने मस्जिद के लिए जमीन देने का भी स्वागत किया. कभी साम्प्रदायिकता फैलाने का आरोप झेलने वाले अडवाणी ने सभी समुदायों से शांति बनाए रखने की अपील भी की. आडवाणी ने रामजन्मभूमि आंदोलन के वक्त कही अपनी बात भी दोहराई कि राम मंदिर से ज्यादा जरूरी है राष्ट्र मंदिर का निर्माण.

अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के ठीक से अनुपालन की जरूरत है: मुरली मनोहर जोशी
डॉ. मुरली मनोहर जोशी (Dr. Murli Manohar Joshi) की 6 दिसंबर 1992 की तस्वीर कोई आंदोलनकारी नहीं भूल सकता है. राम मंदिर को लेकर उनके कमिटमेंट पर कोई सवाल खड़े नहीं होते. डॉ. जोशी भी सक्रिय राजनीति से दूर बीजेपी के मार्गदर्शक मंडल में हैं. इस फैसले के बाद डॉ. जोशी ने कहा कि अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के ठीक से अनुपालन की जरूरत है और इसके बाद ऐसी मानसिकता का निर्माण हो जिसके सहारे देश आगे जा सके.
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ये फैसला पूरी तरह से निष्पक्ष है: उमा भारती
राम जन्मभूमि आंदोलन का एक अहम हिस्सा रहीं उमा भारती फिलहाल सक्रिय राजनीति से दूर ही हैं. उन्होंने 2019 में हुआ लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा. वह इस समय किसी मंत्रालय की मंत्री भी नहीं हैं. लेकिन 6 दिसंबर 1992 को बीजेपी के आला नेताओं के साथ उनकी हंसती हुई तस्वीर को कौन भूल सकता है? ये तस्वीर तो आज भी यदा-कदा वायरल हो ही जाती है.

आंदोलन के समय के अपने तल्ख भाषणों के लिए जानी जाने वाली उमा भारती फैसले के बाद सीधे आडवाणी के यहां पहुंच गईं. उन्होंने कहा कि ये फैसला पूरी तरह से निष्पक्ष है. उमा भारती ने कहा कि अशोक सिंघल उन लोगों में थे, जिन्होंने इस आंदोलन की रचना की थी और फिर आडवाणी ने पॉलिटिकल प्लेटफॉर्म से इसे नई दिशा दे दी थी.

वर्ष 1984 में आंदोलन शुरू करने के लिए न पैसे थे और जगह: विनय कटियार
1984 में जब संघ ने तय किया कि ये आंदोलन चलाना है तब विनय कटियार और विश्व हिंदू परिषद के महेश नारायण सिंह ने राम जन्मस्थान पर ही अभिरंजदास मंडप में डेरा डाल दिया. कटियार कहते हैं कोई सहमत नहीं था, लेकिन बाला साहेब देवरस और रज्जू भैया ने उन्हें कहा कि वो एक शुरुआत करें. विनय कटियार ने उसी साल बजरंग दल की स्थापना की और बाद में हिंदू जागरण मंच का गठन हुआ. आंदोलन शुरू करने के लिए न पैसे थे और जगह. बस रोज कमाओ और रोज खाओ का काम था. साल भर के भीतर पूरा संघ लग गया और वो भी पूरी ताकत से.

'अशोक सिंघल का इस आंदोलन में सबसे बड़ा योगदान'
कटियार (Vinay Katiyar) ने बताया कि हर रोज सुबह वो और महेश नारायण सिंह एक एम्बेसडर टैक्सी से निकलते थे जिसका किराया 125 रुपया प्रतिदिन था. इसका टैक्सी ड्राइवर वीर बहादुर इतना एक्सपर्ट हो गया था कि सरसंघचालक रज्जू भैय्या ने उसे अपना ड्राइवर बना लिया. कटियार कहते हैं कि अशोक सिंघल का इस आंदोलन में सबसे बड़ा योगदान है और आडवाणी की यात्रा ने इसे ऐसी दिशा दे दी जिसके कारण से आंदोलन बड़ा बन गया.

हिंदू जागरण मंच की स्थापना के बाद कानपुर के फूलबाग में एक बड़ी रैली हुई. उस रैली में विश्व हिंदू परिषद के अशोक सिंघल समेत तमाम नेता आए. फूलबाग खचाखच भर गया था, जिसे भरना किसी भी पार्टी के लिए आसान नहीं होता था. कटियार गर्व से याद करते हुए बताते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी ने तब कहा था- 'विनयजी फूलबाग फुल.' बजरंग दल की स्थापना के वक्त रामजन्मभूमि न्यास के परमहंस रामचन्द्रदास आए थे. वो पहले संत थे जो अयोध्या आंदोलन से जुड़े. धीरे-धीरे संत सम्मेलन में भारी भीड़ इकट्ठा होने लगी थी. ये संघ का ही दबाव था कि 1989 की पालनपुर कार्यकारिणी में बीजेपी को प्रस्ताव पारित करने पड़ा.

आजादी के बाद सबसे आंदोलन: प्रवीण तोगड़िया
प्रवीण तोगडिया की जुबान तो मानो राम जन्मभूमि आंदोलन के लिए आग उगलती थी. उनकी रैलियों में भारी भीड़ भी इकट्ठी हो जाती थी. लेकिन अब वो विश्व हिंदू परिषद से बाहर हैं और इन तमाम गतिविधियों से भी दूर-दूर का नाता नहीं है. फिलहाल अहमदाबाद में अपनी बीमार मां की तीमारदारी में लगे हैं. वो कहते हैं कि ये तो आजादी के बाद का सबसे बड़ा आंदोलन था. आजादी की लड़ाई की तरह कई लोगों ने रामजन्भूमि के लिए कुर्बानियां दीं जिसमें से वो एक रहे. इसलिए आंदोलन को जीत मिली है और राम मंदिर का निर्माण भी हो रहा है इसलिए वो संतुष्ट हैं.

चंपत राय ने पर्दे के पीछे रचा इतिहास
चंपत राय वीएचीपी के अंतरराष्ट्रीय महासचिव हैं. 1984 से ही आंदोलन की नींव पड़ने से लेकर 40 दिन तक सुप्रीम कोर्ट में बैठने तक पूरे आंदोलन से जुड़े रहे. वो हाशिए पर नहीं है बल्कि सिस्टम का हिस्सा हैं, लेकिन वो परदे के पीछे छिपा एक चेहरा हैं, जो आज इस केस के बारे में वकीलों से ज्यादा जानते हैं.

आंदोलन के बारे में बहुत कुछ लिखा गया लेकिन चंपत राय की मानें तो वो सारा श्रेय कांग्रेस के नेता बूटा सिंह को देंगे. चंपत राय ने बताया कि जब 1989 में मुकदमा दर्ज किया तो पता भी नहीं था कि रामलला क्या होते हैं. तब तक देवकी अग्रवाल भाई मुकदमे से जुड़ चुके थे. बूटा सिंह ने कहा कि केस हार जाओगे. शीला दीक्षित ये संदेश देने आईं थीं. बूटा सिंह ने संदेश भेजा कि केस हार जाओगे और अगर जीतना है तो पटना जाओ. तब वीएचपी की टीम, जिसमें चंपत राय भी शामिल थे, पटना जाकर लाल नारायण सिन्हा से मिली जो कभी इंदिरा गांधी के कानूनी सलाहकार थे. वहां पूरे केस की फिर से ड्राफ्टिंग हुई. फिर जुलाई 1989 में राम जन्मभूमि का केस दायर हुआ और इस मुकाम तक पहुंचा.

ये कुछ ऐसे चेहरे थे जो केस पर अंतिम फैसले की गहमागहमी के बीच चमक नहीं पाए लेकिन आंदोलन की नींव और ढांचा तैयार करने में इनका खासा योगदान रहा. आज सभी मुख्यधारा से दूर हैं.

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First published: November 15, 2019, 4:02 PM IST
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