भाई-बहनों के साथ सरायमीर ने भी डॉन अबू सलेम से तोड़ लिया नाता
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भाई-बहनों के साथ सरायमीर ने भी डॉन अबू सलेम से तोड़ लिया नाता
सरायमीर उस समय सुर्ख़ियों में आया जब पहली बार 1993 में मुंबई के श्रृंखलाबद्ध बम धमाकों में सलेम का नाम उछला. कभी सरायमीर की गलियों में कंचे खेलने वाला अबू सालिम अंसारी अब डॉन अबू सलेम बन चुका था.

सरायमीर उस समय सुर्ख़ियों में आया जब पहली बार 1993 में मुंबई के श्रृंखलाबद्ध बम धमाकों में सलेम का नाम उछला. कभी सरायमीर की गलियों में कंचे खेलने वाला अबू सालिम अंसारी अब डॉन अबू सलेम बन चुका था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 28, 2017, 2:33 PM IST
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आजमगढ़ से 35 किलोमीटर दूर स्थित कस्बा सरायमीर में आज काफी कुछ बदल गया है. कभी इस गांव के बाजार में पीसीओ की भरमार थी और आज सस्ते इंटरनेशनल टैरिफ वाले सिम कार्ड खूब बिक रहे हैं.

इस बात का जिक्र इसलिए क्योंकि यह वही गांव है, जहां अंडरवर्ल्ड डॉन अबू सलेम का जन्म हुआ.

सरायमीर उस समय सुर्ख़ियों में आया जब पहली बार 1993 में मुंबई के सीरियल बम धमाकों में सलेम का नाम उछला. कभी सरायमीर की गलियों में कंचे खेलने वाला अबू सालिम अंसारी अब डॉन अबू सलेम बन चुका था.



परिवार, दोस्त और सरायमीर नहीं मानते सलेम से रिश्ता
1960 के दशक में पठान टोला में एक छोटे से घर में एडवोकेट अब्दुल कय्यूम के यहां दूसरे बेटे अबू सालिम का जन्म हुआ. वकील होने की वजह से अब्दुल कय्यूम का इलाके में काफी दबदबा था, लेकिन एक सड़क हादसे में हुई मौत के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति ख़राब हो गई.

लिहाजा अबू सालिम को यहीं एक मोटरसाइकिल रिपेयरिंग की दुकान में नौकरी करनी पड़ी. इसके बाद उसने दिल्ली में ड्राईवर की नौकरी की. यहां से वह मुंबई पहुंचा और कुछ दिनों तक डिलीवरी ब्वाय के रूप में काम करने के बाद वह दाऊद के छोटे भाई अनीस इब्राहीम के संपर्क में आया. और यहीं से शुरू हुई अबू सालिम की डॉन अबू सलेम बनने की कहानी.

स्वतंत्र पत्रकार मस्सू भाई
स्वतंत्र पत्रकार मस्सू भाई


लेकिन आज अबू सलेम के भाई और बहन ही नहीं सरायमीर भी उसका नाम नहीं लेना चाहता. उसके बारे में पूछने पर या तो लोग कन्नी काटते नजर आए या फिर साफ-साफ कह दिया कि उनका सलेम से कोई वास्ता नहीं.

न्यूज़18 की टीम जब सरायमीर पहुंची तो वहां एक स्वतंत्र पत्रकार मस्सू भाई से बात की. उनसे जब सलेम के सरायमीर कनेक्शन पर पूछा तो उन्होंने कहा, “उसका यहां से कोई लेना देना नहीं. 15-16 की उम्र में वह यहां से चला गया और फिर पलटकर कभी नहीं देखा. उसकी मां बीड़ी बेचकर किसी तरह गुजारा करते-करते मर गई, फिर भी वह नहीं आया. मां की मौत के बाद तीसरे और 40वें में वह जरुर आया था. अब उसका यहां से कोई लेना देना नहीं है.”

मस्सू भाई ने कहा, “ सलेम की मां ने अपनी आखिरी सांस तक उसके मुंबई अंडरवर्ल्ड से जुड़ने और 1993 के सीरियल बम धमाकों में शामिल होने के लिए माफ नहीं किया था.”

अब क्या करते हैं सलेम के भाई-बहन?

अबू सलेम के सबसे बड़े भाई अबू हाक़िम उर्फ चुनचुन परिवार के साथ सरायमीर में ही रहते हैं और चाईनीज ढाबा चलाते हैं. उनके तीन मंजिला आलिशान घर को देखकर लोग दबी जुबान में कहते हैं कि सलेम की वजह से है यह. उनके दूसरे भाई अबुल लैस परिवार से अलग रहते हैं. 2005 में जब अबू सलेम का पुर्तगाल से प्रत्यर्पण हुआ तो वे उससे मिलने गए थे, लेकिन अब उनका भी सलेम से कोई वास्ता नहीं है. सलेम के तीसरे भाई अबुल जैस लखनऊ में रहते हैं और लॉज चलाते हैं.

सलेम के बड़े भाई का मौजूदा घर
सलेम के बड़े भाई का मौजूदा घर


दोनों बहनों की शादी हो चुकी है. एक की शादी जगदीशपुर में हुई है तो दूसरी मुबारकपुर में बस चुकी है. इनका भी सलेम से कोई लेना देना नहीं है.

परिवार के सदस्यों से बात करने की सभी कोशिशें नाकाम रही. इतना ही नहीं सलेम का नाम लेते ही लोग शक की निगाहों से देखते मिले. कोई भी बात करने को तैयार नहीं था. वे दोस्त जो कभी बचपन में साथ कंचे खेलते थे वे भी कन्नी काटते नजर आए.
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