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आजमगढ़ के ‘भूत’ ने यूपी सरकार से मांगा 25 करोड़ का मुआवजा
Azamgarh News in Hindi

Amit Tiwari | News18Hindi
Updated: February 27, 2018, 12:36 PM IST
आजमगढ़ के ‘भूत’ ने यूपी सरकार से मांगा 25 करोड़ का मुआवजा
लाल बिहारी मृतक

निजामाबाद तहसील क्षेत्र के खलीलाबाद गांव निवासी लालबिहारी को उनके चचेरे भाईयों और पट्टीदारों ने जमीन कब्जे के उद्देश्य से सरकारी अधिकारीयों के साथ मिलकर मृत घोषित कर दिया और जमीन हड़प ली.

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  • Last Updated: February 27, 2018, 12:36 PM IST
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देश के सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार की जड़ें अपना पैर किस कदर मजबूती से जमाए बैठी हैं, इसके अनेकों उदाहरण देखने को मिल जाएंगे. लेकिन वास्तविक जिंदगी में इसका दंश आजमगढ़ निवासी लाल बिहारी उर्फ मृतक ने झेला है. ‘मृतक’ उपनाम से मशहूर लाल बिहारी ने अपनी जिंदगी के 18 वर्ष खुद को जिंदा साबित करने में जाया कर दिया है, लेकिनअब उन्होंने अपनी गुमनाम जिंदगी का मुआवज मांगा है.

रिपोर्ट के मुताबिक 18 साल ‘मृतक’ की जिंदगी गुजारने वाले लाल बिहारी ने प्रशासन से अपनी गुमनाम जिंदगी की कीमत वसूलने की लड़ाई छेड़ दी है. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में लाल बिहारी ने सरकार के खिलाफ दायर मुकदमें में बतौर मुआवजा 25 करोड़ रुपए की मांग की है.

लाल बिहारी मामले की सुनवाई करते हुए सोमवार को न्यायमूर्ति अजय लांबा और न्यायमूर्ति अनंत कुमार की खंडपीठ ने सरकार से पूछा है कि लाल बिहारी को उनके संत्रास व विपत्तियों के लिए क्यों न मुआवजा दिया जाए. कोर्ट ने मुख्य सचिव और आजमगढ़ के जिलाधिकारी को 13 मार्च तक का समय दिया है.

दरअसल, 25 जून 1994 को आजमगढ़ के तत्कालीन जिलाधिकारी ने लाल बिहारी को पुनः जिंदा होने का प्रमाणपत्र दिया था. जिसके बाद लाल बिहारी ने 2005 में मुआवजे की याचिका दाखिल की थी. लाल बिहारी ने याचिका में सरकार से 25 करोड़ का मुआवजा मांगा है.

हालांकि उनकी याचिका पर जवाबी हलफनामा दायर करते हुए वर्ष 2005 में आजमगढ़ के तहसीलदार ने कहा था कि लाल बिहारी द्वारा मांगा गया मुआवजा उसे नहीं दिया जा सकता. हलफनामे में उन्होंने माना कि सरकारी अधिकारियों की गलती की वजह से वर्ष 1976 में सरकारी अभिलेखों में उन्हें मृत घोषित कर दिया गया था, लेकिन वर्ष 1994 में अधिकारियों की इस गलती को सुधारते हुए तत्कालीन डीएम ने उन्हें फिर से जिंदा कर दिया था. सरकार दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई भी कर रही है.

लाल बिहारी ऐसे बने ‘जिंदा भूत’
निजामाबाद तहसील क्षेत्र के खलीलाबाद गांव निवासी लाल बिहारी को उनके चचेरे भाईयों और पट्टीदारों ने जमीन कब्जे के उद्देश्य से सरकारी अधिकारीयों के साथ मिलकर मृत घोषित कर उसकी जमीन हड़प ली. लाल बिहारी कहते हैं कि उनके पिता की मौत के बाद राजस्व विभाग के रिकॉर्ड में उनका नाम था, लेकिन वर्ष 1976 कारोबारी लोन के लिए जाति व आय प्रमाण पत्र बनवाने के लिए जब वो लेखपाल से मिले तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई. लेखपाल ने उन्हें बताया कि वे मर चुके हैं. उनकी संपत्ति चचेरे भाईयों को ट्रांसफर कर दी गई है. इसके बाद बिहारी लाल का शुरू हुआ खुद को जिंदा साबित करने का संघर्ष. इस दौरान वो कई अधिकारीयों से मिले, लेकिन किसी ने कुछ भी नहीं किया.मृतक विधायक के पास पर विधानसभा में घुसकर फेंका पर्चा
लाल बिहारी कहते हैं जब कहीं से कोई आस नहीं दिखी तो उन्होंने 9 सितम्बर, वर्ष 1986 को मृतक विधायक स्व. काजी कलिमुर्रह्मन के पास पर विधानसभा में घुस गए और पर्चा फेंका. उनका कहना था कि यह अपराध है, जिसके बाद उन पर केस दर्ज होता और वो यह साबित कर सकते हैं कि यह अपराध किसी मृत व्यक्ति ने नहीं, बल्कि जिंदा इंसान ने किया है. लेकिन फिर भी उन्हें अब तक न्याय नहीं मिला.

जगदम्बिका पाल ने विधानसभा में उठाया था मुद्दा

फिल्म निर्माता सतीश कौशिक ने लाल बिहारी पर फिल्म बनाने की घोषणा भी कर चुके हैं


वर्ष 1984 में मौजूदा बीजेपी सांसद जगदम्बिका पाल ने लाल बिहारी का मुद्दा विधानसभा में भी उठाया बावजूद इसके कुछ नहीं हुआ. लाल बिहारी कहते हैं इसके बाद उन्होंने खुद को जिंदा साबित करने के लिए चुनाव लड़ने का फैसला किया. क्योंकि नामांकन के दौरान उनका नाम सरकारी दस्तावेजों में है.

वर्ष 1988 लोकसभा चुनावों में लाल बिहारी इलाहाबाद सीट से पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह और तत्कालीन बसपा अध्यक्ष कांशीराम के खिलाफ भी चुनाव लड़ चुके है. इसके बाद भी बात नहीं बनीं तो वर्ष 1989-90 में राजीव गांधी के खिलाफ अमेठी सीट से चुनाव लड़ा. बाद उन्होंने आजमगढ़ के मुबारकपुर सीट से वर्ष 1992 में विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन चुनावों में मिली हार की तरह खुद को जिंदा साबित करने में पराजय का सामना करना पड़ा.

जेल भेजने के लिए एसओ को दी 500 रुपए घूस की पेशकश
तमाम विफलताओं के बाद भी लाल बिहारी हार नहीं माने. वो कहते हैं उन्हें एक और तरकीब सूझी. एक बार जेल जाने के लिए निजामाबाद एसओ को 500 रुपए घूस देने पहुंचे. उनका कहना था कि पुलिस धारा 151 में उन्हें जेल भेज देती तो उनका काम बन जाता. किसी भी सरकारी दस्तावेज में उनका नाम आते ही उन्हें यह साबित करना आसान हो जाता कि वो मरे नहीं हैं, लेकिन जब एसओ को पता चला कि वे सरकारी दस्तावेजों में मर चुके हैं तो उसने भी पल्ला झाड़ लिया.

अपने जैसों के लिए बनाया मृतक संघ
हालांकि 18 साल बाद 25 जून, वर्ष 1994 को तत्कालीन जिलाधिकारी हौसला प्रसाद वर्मा और मुख्य राजस्व अधिकारी कृष्ण श्रीवास्तव ने उन्हें सरकारी अभिलेखों में पुनः जिंदा कर दिया. इस लड़ाई के दौरान लाल बिहारी को पता चला कि वे ऐसे अकेले नहीं है, बल्कि सैकड़ों ऐसे हैं जो खुद को जिंदा साबित करने की लड़ाई लड़ रहे हैं जो अपने रिश्तेदारों द्वारा जमीन हड़पने की साजिश का शिकार होकर सरकारी दस्तावेजों में मृत घोषित हो गए हैं.

लाल बिहारी कहते हैं कि यहीं से उनके एक और संघर्ष की कहानी शुरू हई, जिसके बाद उन्होंने मृतक संघ नाम की एक संस्था बनाई, जिसके माध्यम से अब वो उन लोगों की लड़ाई लड़ते हैं जो 'जिंदा भूत' हैं. लाल बिहारी के मृतक संघ द्वारा लड़ी गई लड़ाई की वजह से फ़रवरी, वर्ष 2016 में आजमगढ़ के राजबली 46 साल बाद जिंदा हो सके.

भूत ने भिखारी बना दिया
बकौल लाल बिहारी, लंबी कानूनी लड़ाई में मेरी साड़ी की फैक्ट्री भी बंद हो गई. बैंक ने लोन देता था और न ही कोई सरकारी काम होता था. मुझे 18 साल तक मृतक माना गया. मेरी संपत्ति छीन ली गई. मेरा सामाजिक रूप से बहिष्कार किया गया. लोग मुझे ‘भूत’ कहकर बुलाते थे. दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ा. मैं भिखारी बन गया. मेरे साथ मेरी पत्नी, बेटे और बेटी ने विपत्तियां झेलीं. इन सबके लिए मुझे 25 करोड़ का मुआवजा मिलना ही चाहिए.

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First published: February 27, 2018, 11:48 AM IST
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