मजदूर की मजबूरी: 10 दिन में 780 KM पैदल चला श्रमिक, 7 दिनों तक नसीब नहीं हुई रोटी
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मजदूर की मजबूरी: 10 दिन में 780 KM पैदल चला श्रमिक, 7 दिनों तक नसीब नहीं हुई रोटी
उत्तर प्रदेश में प्रवासी मजदूरों की वापसी कोरोना संक्रमण की नई चुनौती खड़ी कर रही है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

लॉकडाउन (Lockdown) के कारण काम बंद हुआ तो धीरे-धीरे पैसे खत्म हो गए. मजबूरी में मजदूर (Labourer) पैदल ही आजमगढ़ (Azamgarh) स्थित घर के लिए निकल पड़े. रामकेश ने गांव में परिवारीजनों और दोस्तों को यात्रा का दर्द सुनाया तो सबकी आंखों से आंसू छलक पड़े.

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आजमगढ़. कोविड-19 (COVID-19) के कारण लागू किए गए लॉकडाउन की सबसे अधिक मार प्रवासी मजदूरों पर पड़ी है. जिले का एक प्रवासी मजदूर 10 दिनों तक यात्रा कर पानीपत (Panipat) से आजमगढ़ (Azamgarh) जिले के रानी की सराय थाना क्षेत्र के गाहूंखोर गांव पहुंचा. इन 10 दिनों के दौरान श्रमिक को केवल 3 दिन तक ही रोटी नसीब हुई. 7 दिनों तक श्रमिक ने भूखे पेट रहकर 780 किलोमीटर की यात्रा की, हालांकि इस दौरान उसने बीच-बीच में कभी-कभी गाड़ियों से छोटी दूरी भी तय की. इस मजदूर का नाम रामकेश गोंड है.

वे हरियाणा के पानीपत में एक मोटर पार्ट्स कंपनी में काम करते थे. लॉकडाउन के कारण काम बंद हुआ तो धीरे-धीरे पैसे खत्म हो गए. मजबूरी में वे पैदल ही घर के लिए निकल पड़े. रामकेश ने गांव में परिवारीजनों और दोस्तों को यात्रा का दर्द सुनाया तो सबकी आंखों से आंसू छलक पड़े.

मालिक ने श्रमिकों से मिलना बंद कर दिया




वे हरियाणा के पानीपत में एक मोटर पार्ट्स की कंपनी में कई साल से काम करते हैं. कोरोना महामारी से निपटने के लिए लॉकडाउन लागू कर दिया गया. कंपनी में काम-काज ठप हो गया. मजदूर इस उम्मीद में पानीपत में ही रुके रह गए कि काम जल्द शुरू हो जाएगा. बार-बार लॉकडाउन बढ़ने से आर्थिक स्थिति खराब हो गई. श्रमिक के पास जितने पैसे थे, वे सब खर्च हो गए. कंपनी के मालिक ने श्रमिकों से मिलना बंद कर दिया. भूखों रहने की नौबत आ गई. रामकेश के साथी श्रमिक घर जाने लगे.



पुलिस ने रोका और आजमगढ़ की बस में बैठा दिया

श्रमिकों ने एक बार और पैसे के लिए मालिक से संपर्क किया, मालिक के इंजतार में कई दिन बीत गए, लेकिन मालिक नहीं आया. मजबूरी में श्रमिक पैदल ही घर के लिए निकल पड़े. पैदल चलने के साथ-साथ रामकेश को बीच-बीच में ट्रक आदि गाड़ियों का सहारा भी मिला. इस तरह से वे सुल्तानपुर जनपद पहुंच गए. यहां रामकेश के लिए एक अच्छी बात यह हुई कि पुलिस ने उसे रोक लिया, लेकिन इसके बाद उसे रोडवेज बस में बैठाकर आजमगढ़ भेज दिया.

थककर चूर हो जाती थी शरीर

अपनी यात्रा का दर्द बयां करते हुए रामकेश ने बताया कि, ‘इस तरह से बहुत मुश्किलें झेलकर मैं 10 दिन में घर पहुंचा. यात्रा इतनी मुश्किल थी कि 7 दिनों तक भूखे पेट यात्रा करनी पड़ी. पूरे दिन पैदल चलने से शरीर थककर चूर हो जाती थी. कुछ ग्रामीण और कुछ संस्थाओं के लोग रास्ते में कुछ खाने को दे देते थे. मन में कई बार ऐसा नकारात्मक विचार आता था कि घर तक जीवित नहीं पहुंच पाऊंगा. मैं अभी गांव के स्कूल में क्वारंटीन हूं, लेकिन घर पहुंच जाने से सुकून मिला है. अपनों को देखकर दिल को चैन मिल रहा है.

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