Home /News /uttar-pradesh /

बाबरी मस्जिद केस: 49 FIR वाले मामले ने इसलिए पकड़ी फैसले की रफ्तार

बाबरी मस्जिद केस: 49 FIR वाले मामले ने इसलिए पकड़ी फैसले की रफ्तार

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट ने लोन मोरेटोरियम अवधि को फिर बढ़ाने का विरोध किया है.

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट ने लोन मोरेटोरियम अवधि को फिर बढ़ाने का विरोध किया है.

आपको बता दे कि सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने अप्रैल 2017 में दो साल के भीतर बाबरी मस्जिद केस (Babri Masjid Case) का मुकदमा निपटा कर फैसला सुनाने का आदेश दिया था.

  • News18Hindi
  • Last Updated :
    लखनऊ. अयोध्या (Ayodhya) में ढांचा विध्वंस मामले में करीब 28 साल बाद अब अगले हफ्ते 30 सितंबर को फैसला आएगा. यह मुकदमें के निपटारे और फैसला सुनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की तय समय सीमा की आखिरी तारीख है. इस लंबे खिचे मुकदमें ने वास्तविक रफ्तार तब पकड़ी जब देश की सबसे बड़ी अदालत ने इसे निपटाने के लिए एक समय सीमा तय कर दी. आपको बता दे कि सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2017 में दो साल के भीतर बाबरी मस्जिद केस (Babri Masjid Case) का मुकदमा निपटा कर फैसला सुनाने का आदेश दिया था.

    इसके बाद सुप्रीम कोर्ट तीन बार और पहले से तय वक्त को बढ़ा चुका है. लेकिन इस बार आखिरी तारीख 30 सितंबर 2020 तय की थी. इसी तारीख पर फैसला आएगा जिसमें महज अब गिनती के कुछ ही घंटे बचे हैं. मुकदमें पर अगर नजर डालें तो इस पूरी घटना की पहली प्राथमिकी उसी दिन 6 दिसंबर 1992 को श्रीराम जन्मभूमि सदर फैजाबाद पुलिस थाने के थानाध्यक्ष प्रियंबदा नाथ शुक्ल ने दर्ज कराई थी. दूसरी प्राथमिकी राम जन्मभूमि पुलिस चौकी के प्रभारी गंगा प्रसाद तिवारी की थी. मामले में विभिन्न तारीखों पर कुल 49 प्राथमिकी दर्ज कराई गईं.



    केस की जांच बाद पूरा मामला सीबीआइ को सौंप दिया गया. सीबीआई ने इस केस को अपने हाथ में लिया और जांच शुरू कर दी. सीबीआइ ने जांच करके 4 अक्टूबर 1993 को 40 आरोपियो के खिलाफ पहली चार्जशीट कोर्ट में दाखिल की. वहीं सीबीआई ने 9 अन्य आरोपियो के खिलाफ 10 जनवरी 1996 को एक और चार्जशीट दाखिल की. सीबीआइ ने कुल 49 आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया. वही आपको बता दे कि 28 साल में 17 अभियुक्तों की मृत्यु हो चुकी है और अब सिर्फ 32 अभियुक्त बचे हैं जिनका फैसला आना है.


    यह भी पढ़ें- West UP में जमकर हो रही है इस अधिकारी की तारीफ, महिलाओं को ऐसे दे रहे हैं रोज़गार


    babri masjid demolition case lucknow high court, lal krishna advani, uma bharti, ram mandir, vinay katiyar, supreme court, बाबरी मस्जिद विध्वंस का मामला, उच्च न्यायालय, लालकृष्ण अदानी, उमा भारती, राम मंदिर, विनय कटियार, सर्वोच्च न्यायालय
    मंदिर आंदोलन के सबसे चर्चित किरदार


    2001 में हाईकोर्ट का आया फैसला

    हालकि केस के लंबे समय तक लंबित रहने के पीछे भी वही कारण थे जो हर हाई प्रोफाइल केस में होते हैं. अभियुक्तों ने हर स्तर पर निचली अदालत के आदेशों और सरकारी अधिसूचनाओं को हाईकोर्ट में चुनौती दी जिसके कारण मुख्य केस की सुनवाई में देरी होती रही. हालांकि इसी मामले से जुड़े अभियुक्त मोरेसर सावे ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर मामला सीबीआइ को सौंपने की अधिसूचना को चुनौती दी. हाईकोर्ट में कई साल याचिका लंबित रहने के बाद 2001 में हाईकोर्ट का फैसला आया जिसमें अधिसूचना को सही ठहराया गया. इस बीच अभियुक्तों ने आरोप तय करने से लेकर कई मुद्दों पर हाइकोर्ट के दरवाजे खटखटाए जिससे देरी हुई.

    यह भी पढ़ें- इन आंकड़ों के दम पर कहती है Delhi की केजरीवाल सरकार- हमारी पढ़ाई औरों से अच्छी

    इस केस में सीबीआइ को लड़नी पड़ी लंबी कानूनी लड़ाई

    पहले यह मुकदमा दो जगह चल रहा था. भाजपा के वरिष्ठ नेताओं लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी सहित आठ अभियुक्तों के खिलाफ रायबरेली की कोर्ट में और बाकी लोगों के खिलाफ लखनऊ की विशेष कोर्ट में. रायबरेली में जिन आठ नेताओं का मुकदमा था उनके खिलाफ साजिश के आरोप नहीं थे. उन पर साजिश में मुकदमा चलाने के लिए सीबीआइ को लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी और अंत में सुप्रीम कोर्ट के 19 अप्रैल 2017 के आदेश के बाद 30 मई 2017 को अयोध्या की विशेष कोर्ट ने उन पर भी साजिश के आरोप तय किये और सारे अभियुक्तों पर एक साथ संयुक्त चार्जशीट के मुताबिक एक जगह लखनऊ की विशेष कोर्ट में ट्रायल शुरू हुआ.

    babri masjid demolition case lucknow high court, lal krishna advani, uma bharti, ram mandir, vinay katiyar, supreme court, बाबरी मस्जिद विध्वंस का मामला, उच्च न्यायालय, लालकृष्ण अदानी, उमा भारती, राम मंदिर, विनय कटियार, सर्वोच्च न्यायालय
    9 नवंबर 1989 को विश्व हिंदू परिषद ने अयोध्या में मंदिर का शिलान्यास किया था


    इस वजह से मुकदमे ने पकड़ी रफ्तार

    अप्रैल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने आठ नेताओं के खिलाफ ढांचा ढहने की साजिश में मुकदमा चलाने को हरी झंडी देते समय और रायबरेली का मुकदमा लखनऊ ट्रंसफर करते वक्त ही केस में हो चुकी अत्यधिक देरी पर क्षोभ व्यक्त करते हुए साफ कर दिया था कि फिलहाल अब नये सिरे से ट्रायल शुरू नहीं होगा. जितनी गवाहियां रायबरेली में हो चुकी हैं उसके आगे की गवाहियां लखनऊ में होंगी.

    मामले में रोजाना सुनवाई होगी. सुप्रीम कोर्ट का यह वही आदेश था जिससे इस मुकदमें ने रफ्तार पकड़ी. कोर्ट ने कहा था मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट से बेवजह का स्थगन नहीं दिया जाएगा और सुनवाई पूरी होने तक इस मामले की सुनवाई करने वाले जज का ट्रांसफर भी नहीं होगा.

    इस आदेश के बाद मुकदमे की रोजाना सुनवाई शुरू हुई जिससे केस ने रफ्तार पकड़ी. आपको बता दे कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पहले जिस आदेश ने लगभग ठहरी सुनवाई को गति दी थी वह था इलाहाबाद हाईकोर्ट का 8 दिसंबर 2011 का आदेश जिसमें हाईकोर्ट ने रायबरेली के मकुदमें की साप्ताहिक सुनवाई का आदेश दिया था. लेकिन असली रफ्तार सुप्रीम कोर्ट के रोजाना सुनवाई के आदेश से आयी.

    इसके बावजूद मुकदमा दो साल में नहीं निबटा और सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई कर रहे जज के आग्रह पर तीन बार समय सीमा बढ़ाई. 19 जुलाई 2019 को 9 महीने और 8 मई 2020 को चार महीने बढ़ा कर 31 अगस्त तक का समय दिया और अंत में तीसरी बार 19 अगस्त 2020 को एक महीने का समय और बढ़ाते हुए 30 सितंबर तक फैसला सुनाने की तारीख तय की थी.

    Tags: Ayodhya ram mandir, Babri Masjid Demolition Case, Lal Krishna Advani, Lucknow city, Supreme Court, Uma bharti

    विज्ञापन

    राशिभविष्य

    मेष

    वृषभ

    मिथुन

    कर्क

    सिंह

    कन्या

    तुला

    वृश्चिक

    धनु

    मकर

    कुंभ

    मीन

    प्रश्न पूछ सकते हैं या अपनी कुंडली बनवा सकते हैं ।
    और भी पढ़ें
    विज्ञापन

    टॉप स्टोरीज

    अधिक पढ़ें

    अगली ख़बर