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क्या स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी भेद पाएंगी मुलायम परिवार का चक्रव्यूह!

क्या इस बार भी बदायूं में होगी सपा की जीत?
क्या इस बार भी बदायूं में होगी सपा की जीत?

बदायूं वो सीट है, जिसे भारतीय जनता पार्टी 1991 के बाद कभी जीत नहीं पाई. 1991 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी के स्वामी चिन्मयानंद इस सीट से चुनाव जीते थे.

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मुलायम सिंह यादव के परिवार का एक और अभेद्य किला है बदायूं. बदायूं लोकसभा वो सीट है, जिसे भारतीय जनता पार्टी 1991 के बाद कभी जीत नहीं पाई. आखिरी बार 1991 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के स्वामी चिन्मयानंद इस सीट से जीते थे. लाख कोशिशों के बाद भी बीजेपी, मुलायम सिंह यादव के असर वाली इस सीट को कभी जीत नहीं सकी. 1996 से अब तक हुए छह चुनावों में समाजवादी पार्टी (एसपी) ने लगातार इस सीट पर अपना कब्जा जमाए रखा है.

यहां से 1996, 98, 99 और 2004 में सपा से सलीम शेरवानी सांसद चुने गए. इसके बाद मुलायम सिंह यादव मैनपुरी लौटे तो उन्होंने अपने भतीजे धर्मेंद्र यादव को चुनाव लड़ने बदायूं भेजा. सलीम शेरवानी के विरोध के बाद भी धर्मेंद्र यादव ने 2009 में ये लोकसभा सीट जीत ली. 2014 की मोदी लहर में भी यादव परिवार का ये किला अभेद्य रहा. धर्मेंद्र यादव ने इस सीट से बीजेपी के उम्मीदवार वागीश पाठक को 1 लाख, 66 हजार से ज्यादा वोटों से हराया.

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करीब 18 लाख से ज्यादा मतदाताओं वाली इस सीट पर यादव और मुस्लिमों का वर्चस्व है. यादव और मुस्लिम दोनों की आबादी करीब-करीब 15-15 फीसदी है, इन दोनों को मिलाकर करीब साढ़े पांच लाख वोटर हैं और एसपी की ताकत भी हैं. बीजेपी ने इस बार इस सीट से प्रदेश सरकार के मंत्री और कभी बीएसपी के कद्दावर नेता रहे स्वामी प्रसाद मौर्या की बेटी संघमित्रा मौर्या को मैदान में उतारा है.
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संघमित्रा 2014 में बीएसपी के टिकट पर मुलायम सिंह यादव के खिलाफ चुनाव लड़ी थीं और उनके खिलाफ विवादास्पद बयान देकर चर्चा में आई थीं. बीजेपी ने इस बार इस सीट पर अपनी पूरी ताकत लगा दी है. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रदेश सरकार के मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्या पिछड़े वोटरों को बीजेपी के साथ लाने के लिए लगातार कैंप कर रहे हैं जबकि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह यहां पहले ही रैली कर चुके हैं.

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