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Ground Report: विकास की बाट जोह रहा बहराइच आश्वासनों के सहारे ही चुनता रहा है सांसद

News18 Uttar Pradesh
Updated: May 3, 2019, 3:22 PM IST
Ground Report: विकास की बाट जोह रहा बहराइच आश्वासनों के सहारे ही चुनता रहा है सांसद
बहराइच रेलवे स्टेशन

इस संसदीय सीट पर वर्ष 1998 के चुनाव से कभी किसी एक दल का कब्जा नहीं रहा. जनप्रतिनिधि आश्वासनों की घुट्टी के सहारे ही संसद पहुंचे. जनता ने भी परखा और दूसरे चुनाव में नकार दिया.

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उत्तर प्रदेश के अति पिछड़े जिलों में शुमार बहराइच विकास को आज भी तरस रहा है. इस सीट पर अब तक 15 लोकसभा चुनाव हो चुके हैं, लेकिन बहराइचवासी आश्वासनों की घुट्टी के सहारे ही जिंदगी जी रहे हैं. बाढ़ और आग जहां बहराइच के लिए त्रासदी हैं, वहीं बिजली, पानी, रेल और सड़क की समस्याओं से भी जिला अभी तक उबर नहीं सका है. शायद यही कारण है कि इस संसदीय सीट पर वर्ष 1998 के चुनाव से कभी किसी एक दल का कब्जा नहीं रहा. जनप्रतिनिधि आश्वासनों की घुट्टी के सहारे ही संसद पहुंचे. जनता ने भी परखा और दूसरे चुनाव में नकार दिया.

जिले की समस्याएं ज्यों की त्यों बनी रहीं, बेरोजगार पलायन करते रहे तो उद्योग धंधों के अभाव में जिंदगी रफ्तार नहीं पकड़ सकी. आजाद भारत में संसदीय चुनाव की शुरुआत 1952 से हुई. अब तक 16 लोकसभा चुनाव हो चुके हैं. लेकिन प्रदेश के मानचित्र में पिछड़े जिले के रूप में अंकित बहराइच की सूरत जस की तस ही है. सर्वाधिक छह बार कांग्रेस औैर पांच बार बीजेपी के प्रत्याशियों ने संसद में बहराइच का प्रतिनिधित्व किया है. लेकिन लोगों की समस्या बढ़ती ही गई. इसी कारण मतदाता भी हर बार प्रत्याशियों और दलों को टटोलते नजर आए. 1998 के बाद बहराइच संसदीय सीट पर कोई भी जनप्रतिनिधि जनता के विश्वास और उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सका. ऐसे में मतदाता हर बार पाला बदल रहे हैं. मतदाता हर चुनाव में उस उम्मीदवार को टटोल रहे हैं जो उनकी उम्मीदों को पंख लगा सके.

लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने इस बार बीजेपी की बागी सांसद सावित्री बाई फुले पर दांव आजमाया है. वहीं बसपा व सपा गठबंधन से शब्बीर अहमद वाल्मीकि चुनाव मैदान में हैं. बीजेपी ने बलहा विधायक अक्षयवर लाल गोंड पर दांव आजमाया है. ऐसे में विकास की चाहत रखने वाली बहराइच संसदीय क्षेत्र की जनता 17वीं लोकसभा के चुनाव में किस प्रत्याशी पर भरोसा जताएगी, यह तो ईवीएम से पता चलेगा. लेकिन मतदाताओं के मूड को बदलने और एक बार फिर विकास का ककहरा रटते हुए उम्मीदवार मतदाताओं की परिक्रमा कर रहे हैं.

जाम से नहीं मिली निजात

बहराइच शहर जाम की समस्या से जूझ रहा है. शहर के साथ ही नानपारा, नवाबगंज, रुपईडीहा, जरवल और कैसरगंज समेत अधिकांश कस्बों में आए दिन लोग जाम और अतिक्रमण से जूझते हैं. लेकिन जनप्रतिनिधि उपेक्षा का बर्ताव कर रहे हैं. नानपारा निवासी सुशील कुमार का कहना है कि बहराइच और नानपारा शहर में प्रवेश करने की हिम्मत नहीं होती.

प्रतिवर्ष बेघर होते हैं 1800 लोग

बाढ़ की विभीषिका से महसी, कैसरगंज, नानपारा तहसील प्रभावित है. प्रति वर्ष बाढ़ से पौने दो लाख लोग और 425 गांव प्रभावित होते हैं. घाघरा की कटान से औसतन 1800 लोग बाढ़ की चपेट में आकर बेघर होते हैं. लगभग दस करोड़ की संपत्ति का नुकसान होता है. औसतन 15 हजार हेक्टेयर भूमि बालू में तब्दील होती है.आधे जिले में बड़ी रेल लाइन अभी भी सपना

बहराइच जिले के आधे हिस्से में बड़ी रेल लाइन अभी भी सपना ही है. मीटर गेज की रेल लाइन से जिले के पश्चिमी हिस्से की जिंदगी घिसट रही है. सर्वे हुआ था, लेकिन फिर बजट आवंटित नहीं हुआ. जिसके चलते बहराइच का एक बड़ा हिस्सा प्रदेश के अन्य जनपदों से ब्राडगेज रेल सेवा से नहीं जुड़ सका. आमान परिवर्तन का पूरा कार्य न होने के कारण बहराइच में उद्योग धंघे भी नहीं पनप पा रहे हैं. स्थानीय जनप्रतिनिधि समय-समय पर पूरे जिले में रेल लाइन का काम शुरू करवाने का दिलासा देते जरूर दिखे, लेकिन अब तक सिर्फ बहराइच गोंडा के मध्य ही बड़ी रेल लाइन बिछ सकी है. व्यापारी सुमित कुमार का कहना है कि ब्राडगेज की रेल सुविधा पूरे जिले में न होने से बाहर के व्यापारी बहराइच से किनारा किए हुए हैं. लोग यहां उद्योग में निवेश करने से कतराते हैं.

आग की लपटें विकास में बाधक

प्रति वर्ष आग से जिले में औसतन 1.5 अरब की संपत्ति का नुकसान होता है. गांव के गांव जलते हैं. इन अग्निकांडों से उबरने में लोगों को वर्षों लग जाते हैं. लेकिन अग्निकांड पर अंकुश के उपाय नहीं हो सके हैं. जिले में महज मुख्यालय पर एक अग्निशमन केंद्र स्थापित है. तहसील मुख्यालयों पर जमीन व बजट के अभाव में स्थायी अग्निशमन केंद्र की स्थापना नहीं हो पा रही है. जिस कारण दमकल वाहन तब पहुंचते हैं जब सब कुछ जलकर राख हो चुका होता है. जिले में नानपारा, महसी और कैसरगंज क्षेत्र में प्रतिवर्ष आग की लपटें तबाही मचाती हैं, लेकिन इन समस्याओं के प्रति भी जनप्रतिनिधि संवेदनहीन ही नजर आ रहे हैं.

पानी बना रहा है विकलांग

पेयजल की स्थिति यह है कि आर्सेनिक युक्त पानी लोगों को विकलांग कर रहा है. तेजवापुर, महसी, शिवपुर, चित्तौरा, रिसिया ब्लाक के पानी में आर्सेनिक की मात्रा अधिक है. इस पानी को पीने से लोग त्वचा की गंभीर बीमारियों के शिकार हो रहे हैं.

इस बार ये प्रत्याशी मैदान में

सावित्री बाई फुले सिटिंग सांसद हैं. इस बार बीजेपी से किनारा कर कांग्रेस का दामन थामा है. कांग्रेस ने भरोसा जताते हुए बहराइच से टिकट दे दिया. ऐसे में अपने कराए गए कार्यों के साथ ही संगठन की नीतियों के सहारे फिर चुनाव मैदान में हैं. सभी मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश भी है.

अक्षयवर लाल गोंड (बीजेपी)- बलहा विधान सभा क्षेत्र से विधायक हैं. पूर्वांचल के मतदाताओं में गहरी पैठ है. जन सुलभ होने के साथ ही मोदी का नाम उनकी मुख्य ताकत है. विकास के मुद्दे पर वोटरों को लुभाकर चुनावी वैतरणी पार करने की कवायद है.

शब्बीर अहमद बाल्मीकि (सपा)- चरदा विधान सभा क्षेत्र से तीन बार एमएलए रहे. जनसुलभ नेता की छवि है. सपा की उपलब्धियों और बसपा वोट बैंक के साथ ही सवा छह लाख मुस्लिम मतदाताओं के भरोसे सफल होने की उम्मीद है.

(रिपोर्ट-अखिलेश कुमार)

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First published: May 3, 2019, 3:03 PM IST
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