न दूल्हा, न दूल्हन पर इस बारात में शामिल होते हैं हजारों बाराती

कहा जाता है कि दिल्ली के शासक फिरोजशाह तुगलक सहित अनेकों राजा महाराजाओं ने गाजी के दरबार में दस्तक दी थी.

News18 Uttar Pradesh
Updated: May 7, 2018, 1:59 PM IST
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आपने कई बारातें देखी होंगी और कई के बारे मे सुना भी होगा लेकिन क्या आपने कभी बिना दूल्हा और बिना दुल्हन की बारत देखी है? अब आप सोच रहे होंगे कि जब दूल्हा और दल्हन ही नहीं होंगे तो बारात होगी किसकी? तो आपको बता दें कि बहराइच में 'सैयद सलार मसूद गाजी' की दरगाह पर हर साल  कई अनोखी बारात आती है. इनमें न दूल्हा होता है न ही दुल्हन फिर भी हजारों बाराती शामिल रहते हैं और दहेज भी दिया जाता है. अनोखी बारात की यह परंपरा करीब 1000 साल पुरानी है.

दरअसल 'सैयद सलार मसूद गाजी' की दरगाह पर हर साल हिन्दी कलेण्डर के ज्येष्ठ माह में 30 दिनों तक चलने वाला मेला लगता है. इसमें दस लाख से अधिक श्रद्धालु श्रद्धा सुमन अर्पित करने आते हैं. इस मेले की खास बात यह है यहां हिंदू संप्रदाय के 80% श्रद्धालु आते हैं. हिन्दू अपनी परंपरा के अनुसार अपने धार्मिक रीति रिवाज से श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं और मन्नत मांगते हैं.

मन्नत पूरी होने पर बारात लाने की परंपरा

दरगाह पर बारात लाने की प्रथा मन्नत पूरी होने से जुड़ी हुई है. जिसकी मनौती पूरी होती है वह बारात लेकर आता है. बारात लाने का सिलसिला जोहरा बीबी के परिवार की तरफ से शुरू किया गया था जो आज तक जारी है. कहा जाता है कि रुदौली शरीफ बाराबंकी के एक नवाब रुकनुद्दीन की बेटी जोहरा बीबी दोनों आंखों से अंधी थी. उनकी मां ने अपनी बेटी की आंख की रोशनी के लिए गाजी के दरबार में हाजिरी दी और उनकी आंखों की रोशनी आ गई. लेकिन जोहरा बीबी गाजी की दरगाह से अपने घर नहीं गई यहीं रहकर दरगाह की खिदमत करने लगी. इसके बाद परिजन उनकी शादी के लिए रखा दहेज लेकर यहां आए. तभी से यहां मुराद पूरी होने पर बारात लाने की परंपरा जारी है.

किसी पर नहीं थोपी जाती पाबंदी 

यहां किसी पर किसी तरह की कोई पाबंदी नहीं थोपी जाती है. कोई त्रिशूल गाड़कर पूजा अर्चना करता है तो कोई फातिया करके श्रद्धा सुमन अर्पित करता है. आमतौर पर दरगाह पर ढोल, तमाशा, गोला, पटाखे दागने आदि की इजाजत नहीं होती है  लेकिन 'सैयद सलार मसूद गाजी' की दरगाह पर लोग एक माह तक ढोल और गाजे-बाजों पर जमकर नाचने के साथ पटाके भी छुड़ाते हैं.

फिरोजशाह तुगलक ने दी थी हाजिरी

कहा जाता है कि दिल्ली के शासक फिरोजशाह तुगलक सहित अनेकों राजा महाराजाओं ने गाजी के दरबार में दस्तक दी थी. फिरोजशाह तुगलक के आने के संबंध में बताया जाता है कि उनकी मां ने मन्नत मांग थी जिसके पूरा होने के बाद उन्होंने अपने बेटे फिरोजशाह तुगलक को गाजी के दरबार में भेजा था. दरगाह आने के बाद फिरोजशाह तुगलक ने दरगाह का किलानुमा निर्माण कराया और काफी जमीन दान की. बताया जाता है कि गाजी की मजार का निर्माण एक यदुवंशी ने पुत्र रत्न की प्राप्ति के बाद दूध और राख से कराया था.

(रिपोर्ट: एस.एम.ए.कादरी)
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