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यूपी के इस जिले में पानी की एक-एक बूंद के लिए हो रहा खूनी संघर्ष

हमीरपुर में गड्ढे से पानी भर्ती महिला

हमीरपुर में गड्ढे से पानी भर्ती महिला

2007 से बुंदेलखंड में बारिश का मौसम घटकर 24 दिन ही रह गया. 2007 से शुरू हुई समस्या आज विकराल हो चुकी है.

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    न्यूज18 हिंदी की खास मुहिम पानी की कहानी सीरीज की इस रिपोर्ट में हम बुंदेलखंड की एक ऐसी हकीकत आपको बताने जा रहे हैं जिसके बारे में शायद ही आपको जानकारी हो. हमीरपुर जिले में 10 हजार की आबादी वाले इचौली कस्बे में लोग बाजार तो आते हैं, लेकिन खरीदारी करने नहीं, बल्कि पानी की जुगाड़ करने के लिए. जल विभाग से सप्लाई होने वाले पानी के लिए यहां खूनी लड़ाई तक हो जाती है. पढ़िए यह रिपोर्टः  

    कहते हैं बिन पानी सब सून. यह कहावत यूपी के बुंदेलों से बेहतर कौन समझ सकता है. वैसे तो भगौलिक परिस्थिति की वजह से यह इलाका पानी के मामले में पिछड़ा ही रहा, लेकिन जो स्थिति पिछले एक दशक में पैदा हुई, वैसी कभी देखने को नहीं मिली. आजादी के समय से बात करें तो यहां बारिश करीब 52 दिन हुआ करती थी. उस समय तालाब और पोखरों में पानी का संचय किया जाता था. जिससे साल भर की खेती और पीने के लिए पानी का उपयोग हो जाता था. लेकिन 2007 से बुंदेलखंड में बारिश का मौसम घटकर 24 दिन ही रह गया. 2007 से शुरू हुई समस्या आज विकराल हो चुकी है.

    बुंदेलखंड में भूगर्भ जल स्तर गिरने से सूखे का कहर अब गांव से शहरों और कस्बों की तरफ पहुंचने लगा है. शहरों और कस्बों के भी हैंडपंप और कुएं सूखने लगे हैं. जलकल  विभाग द्वारा दी जाने वाली वाटर सप्लाई यहां के लोगों की प्यास बुझाने के लिए नाकाफी साबित हो रही है. विभाग द्वारा दी जाने वाली वॉटर सप्लाई में भी लोगों को लाइन लगानी पड़ती है. अपनी बारी आने का घंटों इंतजार करना पड़ता है. पानी भरने को लेकर अक्सर लोगों के बीच खून संघर्ष का होना आम बात हो गई है.

    हमीरपुर जिले के 10 हजार की आबादी वाले इचौली कस्बे के बाजार में आपकी नज़र जहां तक जाएगी, वहां तक लोगों की भीड़ नज़र आएगी. यह भीड़ बाजार में किसी सामान की खरीदारी के लिए नहीं है, बल्कि पानी की मारामारी के लिए खड़ी है. इस बाजार में दुकानदार भी अपनी दुकानें छोड़कर पानी भरने के लिए लाइन में लगे हुए मिल जाएंगे.

    भयानक सूखे से जूझ रहे इस बाजार में प्रशासन ने रोड के किनारे अस्थायी  पाइप लाइन डाल दी है. जिसमें सुबह और शाम एक घंटे पानी सप्लाई की जाती है. लेकिन जो पानी इन लोगों को मिल रहा है उससे इन लोगों का गुजर-बसर होना मुश्किल है. इन लोगों का कहना है की जितना पानी मिल रहा है वह सिर्फ प्रसाद जैसा है. किसी को दो बाल्टी पानी मिलता है तो किसी को चार बाल्टी.

    ऐसा नहीं है कि इस कस्बे में पानी नही है. पानी है, लेकिन नमक के जैसा खारा. जिसे जानवर तक पीना गंवारा नहीं करते. ऐसे में इंसान उस पानी को कैसे पिए. शासन और प्रशासन ने भी यहां पानी की व्यवस्था के लिए टंकियां बनवाईं, सरकारी नलकूप लगवाए और तो और बांदा जिले की केन नदी से एक पाइप लाइन व्यवस्था भी शुरू की थी. लेकीन वो सब व्यवस्था बेकार साबित हुई और मजबूरन आज लोगों को अपने सारे कामकाज छोड़ पानी का इंतजाम करना पड़ रहा है.

    स्थिति कितनी भयावह है इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है. सूबे की योगी सरकार ने 43 करोड़ रुपये से बुंदेलों की प्यास बुझाने का इंतजाम करने का आदेश दे दिया है. लेकिन, जहां बाजार ही पानी के घड़ों से सज जाता हो, वहां लोगों के लिए कोई दूसरा काम कैसे हो सकता है. बूंद-बूंद पानी के लिए तरसते बुंदेलों की यह हालात देख शायद शासन और प्रशासन कि आंखें खुल जाएं.

    न्यूज18 हिंदी की पानी की कहानी सीरीज में आप भी अपनी कहानियां साझा कर सकते हैं #PaaniKiKahani पर.

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