सूखे से जूझ रहे बुंदेलखंड में बांदा का कुओं और तालाब से ‘फॉल इन लव’

बांदा जिले की पूरी 470 पंचायतों में रहने वाला हर बाशिंदा, पूरा सरकारी अमला और गैर सरकारी संगठन एकजुट होकर पानी के प्रबंधन में जुटे हुए हैं.

News18 Uttar Pradesh
Updated: June 20, 2019, 8:49 PM IST
सूखे से जूझ रहे बुंदेलखंड में बांदा का कुओं और तालाब से ‘फॉल इन लव’
गर्मी में मिट्टी उठाता इदरिस बरकत
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Updated: June 20, 2019, 8:49 PM IST
पंकज रामेंदु

‘पीपली लाइव’ फिल्म में एक किरदार है, ख़ामोश किरदार, जिस पर अगर ध्यान न दिया जाए तो शायद फिल्म देखने वाले का ज्यादा कुछ बिगड़े नहीं. उस किरदार को नहीं देखने पर आपके मनोरंजन पर तो आंच नहीं आएगी, लेकिन आप मर्म नहीं छू पाएंगे. गांव के एक कोने में चुपचाप गड्ढ़ा खोदता ये किरदार है होरी महतो, जो अपने खेत से पानी निकालने में अकेला ही जुटा है.

तपती हुई गर्मी, जिसमें यह तय है कि हमें घर से बाहर नहीं निकलना है, ऐसे भयानक आग बरसाते मौसम में गांव के कई खेतों में ढेर सारे होरी महतो खुदाई करने में लगे हुए हैं. उनके साथ उनकी पत्नियां और बच्चे भी काम में शामिल है.

बांदा के बरक़त के लिए तो मिट्टी उठा कर सिर पर रखना और पटकना ही गर्मी की छुट्टी वाला खेल है, उसके साथ उसकी छोटी बहन इदरिस भी लगी हुई है.
बांदा के बरक़त के लिए तो मिट्टी उठाकर सिर पर रखना और पटकना ही गर्मी की छुट्टी वाला खेल है, उसके साथ उसकी छोटी बहन इदरिस भी लगी हुई है.


एक गिलास पानी जितनी तेजी से हलक से उतारा जा सकता है, उससे ज्यादा तेजी से पानी पसीना बनकर बह रहा है. 'सूरज' इन दिनों जल्दी उठ रहा है. सात बजते-बजते सूरज तैयार होकर आपके दरवाजे पर मुस्तैद खड़ा है. दो रोटी का नाश्ता जल्दी से करके 48 साल के संतोष खेंघर, अपने से 6-7 साल कम उम्र के साथी के साथ काम पर निकल पड़े हैं. उन्हें मालूम है उनका काम गांव के लिए कितना जरूरी है.

उनका गांव है बांदा का महुई, जिसकी 1800 की आबादी है. संतोष तेजी दिखाते हुए गांव के कुएं पर पहुंच जाते हैं, जहां उनके कुछ और साथी उनका पहले से इंतजार कर रहे हैं. वो अपनी लंगोट कसते हैं और एक मोटे रस्से की मदद से 70 फीट गहरे कुएं में उतर जाते हैं. अब वो 10-11 बजे तक अंदर ही रहेंगे और कुएं की सफाई करके कचरा ऊपर भेजेंगे. उनके शरीर से पसीना इस तरह बह रहा है, जैसे शरीर में कई नल लगा दिए गए हो. लेकिन वो कोई शिकायत नहीं कर रहे हैं वो बस काम कर रहे हैं.

कुएं में उतरता संतोष

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महुई गांव से दूर शहर के कलेक्ट्रेट में बने हुए बड़े से सभागार में भी हलचल मची हुई है. गैर सरकारी संगठन तैयारियों में जुटे हुऐ है. पूरे जिले की 470 ग्राम पंचायतों के नोडल अधिकारियो को यहां बुलाया गया है. 10 बजते-बजते पूरा सभागार खचाखच भर गया है. परियोजना निदेश, चीफ डेवलपमेंट ऑफिसर और तमाम अधिकारी, साथ में प्रशिक्षण देने वाले गैर सरकारी संगठन के कार्यकर्ता सभी मौजूद है. सामने लगे बड़े से स्क्रीन पर लखनऊ से कलेक्टर, नोडल अधिकारियों से मुखातिब हो रहे हैं. उन्हें एक ऐसे टूल से परिचित करवाया जा रहा है, जिससे वो अपने किये हुए काम को ऑनलाइन भर सकें और पता चल सके की क्या काम हो रहा है.

पूरा बांदा एक उत्सव की तैयारी में जुटा हुआ है. ये है मॉनसून

बांदा जिले की पूरी 470 पंचायतों में रहने वाला हर बाशिंदा, सारा सरकारी अमला और गैर सरकारी संगठन एकजुट होकर पानी के प्रबंधन में जुटे हुए हैं. ये उस मॉनसून से पहले की तैयारी है, जिसमें पानी हमारे पास आता तो है लेकिन रहता नहीं है. लेकिन इस बार बांदावासियों ने सोच लिया है कि खेत का पानी खेत में रहेगा या तालाब भरेगा या फिर जमीन में रहेगा, यूं ही व्यर्थ नहीं बहेगा. यहां आपको हर कोने पर होरी महतो नजर आ जाएंगे, प्रेमचंद की किताबों के किरदार नजर आएंगे, बस फर्क इतना है कि वो अकेले नहीं है और हारे नहीं हैं.

कुआं-तालाब में पानी लाएंगे, बांदा को खुशहाल बनाएंगे

अगर प्रशासन चाह ले तो हर बात मुमकिन है. बांदा जिले में युद्ध स्तर पर पानी सरंक्षण को लेकर चल रहे काम और लोगों के साथ शासकीय, गैर शासकीय अमलों की एकजुटता इसकी नज़ीर पेश करती है. परंपरागत तरीकों का इस्तेमाल करके बांदा जिले में ‘जल सरंक्षण अभियान’ को सफल बनाया जा रहा है. जिलाधिकारी हीरालाल की इस अभियान को सफल बनाने में अहम भूमिका रही. उनका कहना है कि बांदा जिले में पहले बहुत सुंदर कुएं थे लेकिन धीरे-धीरे इसकी जगह नल और नलकूपों ने ले ली, जिससे हम अपनी परंपराओं से दूर हट गए. उनकी कोशिश है कि लोगों का अपने तालाब, कुओं के प्रति आदर, सम्मान, लगाव बढ़े और वो इससे प्यार करें.

इस कहानी की इबारत महज़ 8 महीने में लिखी गई. 6 अक्टूबर 2018 को कृषि विश्वविद्यालय में एक गोष्ठी रखी गई, जहां प्रशासनिक अमले के साथ-साथ देश के जाने माने सामाजिक कार्यकर्ताओं और तकनीकी पक्ष जानने वाले एक्सपर्ट ने शिरकत की. इस अभियान को सफल बनाने के लिए इसमें अखिल भारतीय समाज सेवा संस्थान, बांदा, लोक विज्ञान केंद्र, देहरादून और जल सेवा चैरिटिबेल फाउंडेशन (वॉटरएड इंडिया) जैसे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों की भी मदद ली गई. अभियान को दो चरणों में बांटा गया.

जल संरक्षण पर पिछले 20 सालों से काम कर रहे पुनीत कुमार श्रीवास्तव बताते हैं कि ‘हमने इसके लिए पहले चरण में कुओं और तालाब के पास खंतियां खुदवाए जाने का सुझाव दिया. लेकिन उससे जरूरी था लोगों को ये समझा पाना की आखिर ये ज़रूरी क्यों है? इसके लिए हमने जल चौपाल लगाने का फैसला किया.‘

क्या होती है जल चौपाल

वॉटर कन्सलटेंट पुनीत कुमार श्रीवास्तव इसे जल का लोकतांत्रिकरण कहते हैं. पुनीत बताते हैं ‘जल चौपाल परिवार की ही तरह संगठित होकर काम करने में यकीन करता है. जबसे हम लोगों ने संगठित होकर जीना सीखा है, तबसे अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए हम लोगों ने चौपालों का सहारा लिया है. जल चौपालों में पानी को बचाने के लिए समुदाय की क्या भूमिका हो सकती है और किस तरह से वो योगदान दे सकता है इस पर चर्चा होती है. जल चौपाल में कुछ सख्त नियम है जिन्हें बदला नहीं जाता है क्योंकि ये लोकतंत्र की व्यवस्था से जुड़े हैं इसलिए इसमें कोई भी बड़ा या छोटा नहीं है.

इसमें आदमी पद के नहीं बल्कि पानी के उपभोक्ता के तौर पर हिस्सा लेता है और उसी से जुड़े अपने अनुभवों को साझा करता है. इसके समुदाय को प्रोत्साहित करने में काफी मदद मिलती है. इसके ज़रिये पानी की बजटिंग भी हो जाती है. पानी की बजटिंग में ये पता लगाया जाता है कि प्रति व्यक्ति हमें कितने पानी की ज़रूरत है और हमारे पास कितना पानी उपलब्ध हो रहा है. पानी की गुणवत्ता के आधार पर पेय जल और दूसरे इस्तेमाल के पानी के स्रोतों को बांटा जा सकता है.

चौपाल के दूसरे मॉड्यूल में हम जन-जल सुरक्षा के बारे में बात करते हैं, जिसके ज़रिये पानी को बचाने के विभिन्न तरीकों पर बात की जाती है. औऱ मौसम परिवर्तन के प्रति जागरुकता भी पैदा की जाती है. अभी इसमे एक और मॉड्यूल जोड़ा जा रहा है जिसे हमने ‘सोशल अकाउंटेबिलिटी’ यानी सामाजिक जिम्मेदारी का नाम दिया है. इसके तहत पानी की सेवा लेने वाला, चौपाल के माध्यम से पानी की सेवा देने वाले विभागों (जैसे जल निगम या पंचायत) को सुधार के लिए सुझाव दे सके और यहां से पिछले काम का डाटा एकत्र किया जा सके.‘

अभियान की खासियत

इस अभियान में एक खास तरीके का टूल यानि पानी की मांग और आपूर्ति को समझने का तरीका बनाया गया. इसे ‘वॉटर बजटिंग टूल‘ का नाम दिया गया. इसके ज़रिये ये पता करने में आसानी हुई कि हर रोज किसी परिवार को कितने पानी की जरूरत होती है. साथ ही जानवरों की जरूरत का भी पता लगाया गया, इस तरह ये पता चल पाया कि एक ग्राम पंचायत को कितने पानी की ज़रूरत होती है. फिर ये देखा गया कि ग्राम पंचायत के पास इस मांग को पूरा करने के लिए क्या-क्या स्रोत हैं. यानि कुल कितने हैंडपंप या कुएं है. और एक ग्राम पंचायत कितना भूजल ले रही है और इससे भू जल पर क्या असर पड़ रहा है.

इस तरह इन स्रोतों के आस-पास बारिश के पानी को एकत्र करने के लिये खेती निर्माण किया गया. करीब 2443 जल स्रोतों के इर्दगिर्द 2665 खंतियों का निर्माण किया गया, इसमें 2183 हैंडपंप औऱ 260 कुएं हैं.

जिला विकास अधिकारी केके पांडेय कहते हैं ‘बांदा में पानी की कोई कमी नहीं है, लोगों की सोच बदलने की जरूरत है. यहां हरियाणा और पंजाब से ज्यादा पानी बरसता है. पूरे साल भर में यहां करीब 902 मिलीमीटर बारिश होती है जबकि पंजाब में 600 मिलीमीटर होती है. अगर आप आय से ज्यादा खर्च करते हैं तो आप हमेशा भिखारी बने रहेंगे, यही हाल बांदा का था. जो था उसे बचाते नहीं थे, इसलिए हमने ये अभियान लोगों की सोच बदलने के लिए शुरू किया.'



बांदा में कुल 69 कुएं थे, यहां मोहल्लों के नाम कुओं के नाम पर थे, जैसे कालू कुआं, कुन्ना कुंआ, राजा का कुआं जैसे कई मोहल्ले यहां मौजूद हैं लेकिन अब बस इनका नाम रह गया है. कुएं पाट दिए गए हैं, इसके अलावा यहां 7 बावड़ी थी. जो भर गई हैं. खास बात ये थी कि ये सभी बावड़िया नहर के ज़रिये एक दूसरे से जुडी हुई थी, शहर में मोजूद नवाब टैंक में इसके साक्ष्य अभी भी देखने को मिल जाते हैं.

खेत पर मेड़, मेड़ पर पेड़

बांदा जिला सिर्फ खेती निर्माण पर नहीं रुका, अपने अभियान को और गति लाते हुए प्रशासन और लोगों ने दूसरे चरण में जिले के तालाब और कुओं के पुनरुद्धार का बीड़ा उठाया और इस पर जुट गए. बांदा जिले की किसी भी पंचायत में आपको इन दिनों एक जैसा ही माहौल देखने को मिल रहा है, सब तरफ तालाब निर्माण चल रहा है या कुओं की सफाई चल रही है. इसी जिले का एक गांव है जखनी जो जिले के लिए ही नहीं, देश के लिए जल प्रबंधन के मामले में एक रोल मॉडल बन कर उभरा है, जहां जून की तपती हुई गर्मी में भी तालाब लबालब है औऱ भूजल स्तर 15 फुट पर है.

इसी गांव के सामाजिक कार्यकर्ता उमाशंकर पांडेय बताते हैं

‘हमने बस ऐसी व्यवस्था की है, जिससे खेत का पानी खेत में ही रहे. इसके लिए खेत पर मेड़ बंदी कर दी गई है. इस तरह बारिश का पानी या सिंचाई का पानी खेत पीते हैं और बचा हुए पानी को नाली या दूसरे निकासी तरीकों से पास बनाए गए तालाब में डाल दिया जाता है. इस तरह भू-जल स्तर भी बढ़ रहा है औऱ पानी की बरबादी से भी बचाव हो रहा है.‘

गांव घुरौंडा के गजेन्द्र बताते हैं कि गांव के ही समाजसेवी उमाशंकर पांडेय के कहने पर उनके बेटों ने खेतों पर मेड़ बंदी करवाई तो पहले उन्हें लगा था कि उनका 60-70 हज़ार रुपए का नुकसान हो गया. लेकिन पानी रुकने से फायदा हुआ और अब दो फसल ले रहे हैं. जिसे अभी तक नुकसान समझा जा रहा था, वो फायदे का सौदा बन गया. साथ ही इससे वॉटर टेबल भी बढ़ गया.

मेड़ बन जाने से जमीन ज़ाया होने और उत्पादकता पर असर पड़ने के सवाल पर गजेन्द्र बताते हैं कि मेड़ पर अरहर, मूंग की पैदावार काफी अच्छी होती है. साथ ही इस पर गांव के जानवरों के लिए चारा भी मिल जाता है. आमतौर पर एक मेड़ तीन फिट चौड़ी और दो फिट ऊंची होती है, जिसे दोनों तरफ के किसान आधा-आधा इस्तेमाल करके उत्पादकता ले सकते हैं.

खेतों की मेड़बंदी


चीफ डेवलपमेंट अधिकारी हरीशचंद्र बताते हैं – ‘हमारा उद्देश्य लोगों के अंदर कुएं, तालाबों के प्रति जो विरक्ति पैदा हो गई थी, उससे दोबारा जुड़ाव पैदा करना है. हम कुआं तालाब पूजन करवाते हैं ताकि लोगों के मन में उनके प्रति सम्मान जागे और वो फिर से उन्हें जीवित करने और बनाए रखने का प्रयास करें.‘

कलेक्टर हीरालाल बोलते हैं कि कई बार उन्हें तालाब कुआं पूजन करवाने को लेकर – जो कि उनके दूसरे चरण कुआं तालाब जियाओ अभियान का अहम हिस्सा है - अंधविश्वासी मान लिया जाता है लेकिन इससे लोगों का तालाब कुओं के प्रति सम्मान बढ़ेगा और वो उसे मरने नहीं देंगे.

परियोजना निदेशक आर.पी.मिश्र का कहना है – ‘किसी भी कार्य को पूरा करने के लिए हमें सीमाओं से परे जाकर कुछ करना पड़ता है. अगर हम ऐसा नहीं करते हैं तो काम नहीं बनता. बांदा में पहले से करीब 2200 तालाब हैं, अगर उनका ही पुनरुद्धार कर दिया जाए तो पेयजल संकट खत्म हो जाएगा, बतौर मनरेगा परियोजना निदेशक हमारा उद्देश्य इस अभियान के तहत इन तालाबों को पुनर्जीवित करना है.’

अपने खेत में तालाब खुदवा रहे शब्बीर का कहना है कि तालाब खुद जाएगा तो उन्हें कहीं जाना नहीं पड़ेगा, तालाब से पानी भी मिलेगा और उसमें मछली पालन भी होगा, उनके तीन लड़के है वो भी गांव में ही रहेंगे.

खेत तालाब योजना

इस योजना के तहत 865 तालाब खोदने का लक्ष्य था, जिसे बढ़ाकर 2500 कर दिया गया है. इस योजना के तहत किसान अपने खेत पर निजी तालाब बनवा सकता है. खेत तालाब योजना में कृषि विभाग से ग्रांट दी जाती है. इस योजना के तहत किसान को ही काम करवाना होता है, उसे एक लाख 14 हज़ार रू की राशि दी जाती है जिसमें उसे 35 मीटर चौड़ी, 30 मीटर लंबी और 3 मीटर गहरा तालाब खुदवाना होता है.

खेत में तालाब बनाते मजदूर


उसी तरह मनरेगा के तहत भी तालाब खुदवाया जा सकता है, इसके अलावा श्रमदान से भी सार्वजनिक तालाब खुदवाने का प्रयास किया जा रहा है.

तालाब को 3 मीटर गहरा रखना इसलिए ज़रूरी होता है क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया जाए तो रिचार्ज नहीं होता है, पहला साल तालाब खोदने पर उसमें पानी नहीं रुकता है, पानी रोकने के लिए उसमें जब जानवर जाते हैं और उनके खुर से उसकी मिट्टी चिकनी होती है, तब उसमें पानी रुकता है.

माइनर इरिगेशन के जेई संदीप श्रीवास्तव बताते हैं  ‘अभी हम लोग प्री-मॉनसून भूजल स्तर का डाटा ले रहे हैं, मॉनसून के बाद फिर से हम डाटा लेंगे, जिससे हमें ये पता चल पाएगा कि हमारे यहां पानी का स्तर कितना बढ़ा है. टेक्निकली भूजल स्तर को नापने के लिए हम पीजोमीटर का इस्तेमाल करते हैं और देसी तरीके से हम ये देख लेते हैं कि कुएं में कितना पानी ऊपर आया है. अगर कुएं में पानी ऊपर आया है तो इसका मतलब पानी का स्तर बढ़ा है. इस तरह पानी का लेवल और टेबल पता लगाया जा सकता है.’

क्या होता है लेवल और टेबल

सतह के ऊपर मौजूद पानी को लेवल से नापा जाता है, वहीं जमीन के अंदर जो पानी मौजूद रहता है, उसे पानी का टेबल कहा जाता है. इस तरह अगर सतही पानी बढ़ता है तो उसे वॉटर लेवल बढ़ना कहते है और भूजल स्तर के बढ़ने पर वॉटर टेबल का बढ़ना कहा जाता है.

एम वॉटर टूल और अभियान का पूरा ज्ञान

अभियान की प्रशासनिक गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जिले की सभी 470 ग्राम पंचायतों के नोडल अधिकारियों को कलेक्ट्रेट में एम वॉटर टूल का प्रशिक्षण दिया गया जिससे पंचायत में हुए काम की जानकारी डिजिटली साझा हो सके. ये एक प्रकार का सर्वेक्षण फॉर्म है, जिसका यूआरएल हर अधिकारी और संबधित कार्यकर्ता के पास मौजूद है जिसे भरकर ऑनलाइन डाटा एकत्र हो सकेगा कि जिले भर में कुएं और तालाब पर कितना काम हुआ है और कितना बाकी है. खास बात ये है कि इस टूल मे मौके पर जाकर ही तालाब या कुएं की फोटो लेनी होती है और काम की ईमानदारी पर भी सवाल खड़ा नहीं होता है.

वॉटरएड इंडिया के शिशिर चंद्रा का कहना है कि वो तमाम जगह पर पानी को लेकर काम कर रहे हैं लेकिन बांदा इसलिए खास हैं क्योंकि यहां पर विभागों के बीच की दीवार नज़र नहीं आती है. यहां हर विभाग दूसरे विभाग के लोगों को नाम से जानते हैं, जनता की सीधे कलेक्टर तक पहुंच है. ऐसी एकजुटता और कहीं देखने को नहीं मिलती.

कीर्तिमान तय करता अभियान

इस अभियान के तहत 14 मार्च को बांदा के आठों ब्लॉकों की सभी 471 ग्राम पंचायतों में एक साथ जल चौपाल लगी. इसमें जल बजटिंग और कंटूर ट्रेंच (खंती) के डिजाइन पर चर्चा हुई. पानी की किल्लत का असर सबसे ज्यादा महिलाओं पर पड़ता है. इसलिए इस अभियान से उन्हें विशेषतौर पर जोड़ा गया. इस अभियान के अनूठेपन और एक साथ एक दिन में इतनी जल चौपालों के आयोजन और इतनी बड़ी जन भागीदारी (करीब 35 हजार लोगों ने सीधे तौर पर भाग लिया) और एक दिन में इतनी सारी खंतियों के निर्माण को देखते हुए इस अभियान को लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स के लिए भी भेजा गया है. यही नहीं बांदा को नेशनल वॉटर मिशन 2019 के लिए अवॉर्ड भी मिल चुका है.

कलेक्टर हीरालाल अपने देसी अंदाज में कहते हैं, ‘मैं तो बस यहां की जनता का तालाब, कुओं से ‘फॉल इन लव’ करवाना चाहता हूं.’

बांदा ने जो मेहनत की है उसके परिणाम तो मॉनसून के बाद देखने को मिलेंगे लेकिन जिस तरह किसान से लेकर कलाकार तक यहां पानी को बचाने और गांव को संवारने में लगा हुआ है उसे देखकर लगता है कि वाकई मे यहां के लोगों का पानी के साथ ‘फॉल इन लव’ हो चुका है.

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First published: June 20, 2019, 7:46 PM IST
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