इस गांव के लिए साल भर की रोजी-रोटी कमाने का 'सीजन' है कुदरत का कहर बाढ़

नांव बनाने मुख्तार और राजू कहते हैं कि इलाके में जब बाढ़ आती है, तभी उनके पास काम आता है. दो महीने तक नाव बनाकर वह अपने परिवार के रोजी-रोटी का इंतजाम करते हैं.

News18 Uttar Pradesh
Updated: July 19, 2018, 2:10 PM IST
इस गांव के लिए साल भर की रोजी-रोटी कमाने का 'सीजन' है कुदरत का कहर बाढ़
बाढ़ से जूझने के लिए नाव तैयार करते ग्रामीण. Photo: News 18
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Updated: July 19, 2018, 2:10 PM IST
कहते हैं बाढ़ कभी भी बताकर नहीं आती, लेकिन जब आती है तो हर तरफ तबाही का मंजर साफ दिखाई पड़ता है. वहीं बाढ़ के वक्त खतरे से निपटने के सरकारी इंतजामों हमेशा से नाकाफी ही साबित होते हैं. जाहिर है जिंदगी बचानी है तो जद्दोजहद खुद लोगों को ही करनी पड़ती है.

बाराबंकी और बहराइच बॉर्डर पर स्थित गांव बेहटा में कुछ लोग हैं, जो नांव बनाने का काम करते हैं. बाढ़ के समय लोग इन्हीं की नाव जिंदगी का आसरा होती हैं. इन्हीं के सहारे लोग सुरक्षित ठिकानों तक पहुंचते हैं. इन लोगों के लिए बाढ़ कुदरत का कहर तो है ही साथ ही कमाई का 'सीजन' भी है. नाव बनाने वालों के लिए ये 'सीजन' अच्छी कमाई का जरिया बन जाता है.

बाराबंकी में जैसे ही घाघरा नदी में पानी बढ़ने की आहट सुनाई पड़ी, ये लोग नाव बनाने की तैयारी में जुट गए हैं. बाढ़ और बरसात के पूरे सीजन में ग्रामीण इन्हीं नाव के सहारे ही अपनी मंजिलों तक पहुंचते हैं. दरअसल हर साल बाढ़ और कटान के चलते दर्जनों गांवों में पानी का भर जाता है और सड़कें गायब हो जाती हैं. जिसके चलते ग्रामीण जरूरी सामान की खरीदारी, खेती, बीमार लोगों को अस्पताल ले जाने जैसे तमाम कामों के लिए नाव का सहारा लेते हैं, जिसके चलते जुलाई महीना शुरू होते ही नाव बनाने वाले अपने काम में जुट जाते हैं.

नांव बनाने मुख्तार और राजू कहते हैं कि इलाके में जब बाढ़ आती है, तभी उनके पास काम आता है. दो महीने तक नाव बनाकर वह अपने परिवार के रोजी-रोटी का इंतजाम करते हैं. नांव बनाने वालों ने बताया कि बाढ़ तो कुदरत का कहर है लेकिन उसी समय उनके काम की डिमांड भी होती है. वह कभी नहीं चाहते कि बाढ़ से कोई नुकसान हो. उन्होंने बताया कि गांव में जिसका खेत नदी के उस पार है, वह बिना नांव के वहां पहुंच नहीं सकता. इसीलिए उनकी बनाई हुई नांव किसान तो खरीदते ही हैं. वहीं अगर कहीं बांध कट जाए तो जरूरत पड़ने पर सरकारी लोग भी खरीदकर लेकर जाते हैं. जिससे उनकी अच्छी आमदनी हो जाती है.

वहीं नांव बनवाने वाले एक ग्रामीण से जब हमने बात की तो उसने बताया कि वह भी अपने लिए एक नांव बनवा रहा है. क्योंकि जब इलाके में बाढ़ का पानी बढ़ जाता है तो अपने खेतों तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है. उस समय ये नांव ही उनका सहारा बनती है और वह इसी के सहारे अपने खेतों तक पहुंच पाते हैं. ग्रामीण ने बताया कि बाढ़ के समय वह इससे लोगों को नदी भी पार कराता है और इससे कुछ कमाई भी हो जाती है.

(रिपोर्ट: अनिरुद्ध शुक्ला)

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