तीसरे फेज़ में मतदान के लिए तैयार बरेली, नोटबंदी और GST से त्रस्त हैं 'मांझे' वाले

देश भर के पतंगबाज़ों के बीच बरेली का बेहतरीन क्वालिटी का मांझा लंबे समय से मशहूर रहा है. नवंबर 2016 से लागू हुई नोटबंदी और उसके बाद जुलाई 2018 से लागू हुए जीएसटी की मार शहर के ये मांझे वाले झेल रहे हैं.

News18Hindi
Updated: April 22, 2019, 8:59 PM IST
तीसरे फेज़ में मतदान के लिए तैयार बरेली, नोटबंदी और GST से त्रस्त हैं 'मांझे' वाले
प्रतीकात्मक तस्वीर
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Updated: April 22, 2019, 8:59 PM IST
कटने, छिलने के निशानों और खून से भरी खरोंचों वाले हाथ जब शाम को घर लौटते हैं, तो उनमें बमुश्किल ढाई सौ रुपये होते हैं. ये रकम सुबह 6 बजे से शाम 4 से 5 तक की मेहनत की कमाई होती है. बरेली के इन मांझा मेकरों की ज़िंदगी चल तो ठीक रही है, लेकिन नोटबंदी के बाद से ये कर्ज़ में डूब चुके हैं और कर्ज़ कैसे चुका पाएंगे? इसी फिक्र में ये खटे जा रहे हैं.

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'बारीक पत्थरों और कांच के मिश्रण से तैयार ये खास मसाला घिसकर हम कपास के धागे से मांझा तैयार करते हैं. इन्हें नंगे हाथों से ही तैयार किया जाता है इसलिए अक्सर हाथ कट या छिल जाते हैं और खून बहता है. लेकिन मांझा ऐसे ही बनता है इसलिए हम इसके आदी हो चुके हैं.' मांझा बनाने वाले 39 वर्षीय तस्लीम ने ये बताते हुए अपना दर्द भी बयान किया.

बरेली में आप किसी भी रिक्शे वाले से कहें कि पतंग के लिए मांझा बनाने वाले के पास ले चलो, तो वो आपको शहर की सीमा पर रामपुर के पास स्वाले नगर ले जाएगा. बरेली का बेहतरीन क्वालिटी का मांझा लंबे समय से मशहूर रहा है. गुजरात और राजस्थान तक से पतंग के शौकीन यहां से मांझा खरीदते रहे हैं.

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नोटबंदी के बाद से इन मांझा निर्माताओं का हाल बेहाल है. नवंबर 2016 से लागू हुई नोटबंदी और उसके बाद जुलाई 2018 से लागू हुए जीएसटी की मार शहर के ये मांझे वाले झेल रहे हैं. मांझा बनाने वाले बबलू कहते हैं कि बारिश और जाड़े के मौसम को छोड़कर मांझा बनाने का धंधा साल में 7 महीने का होता है. 'औसतन एक कारीगर साढ़े सात हज़ार रुपये प्रतिमाह तक कमाता है. चूंकि साल में 5 महीने काम नहीं होता इसलिए साल भर इसी से गुज़ारा करना होता है.'

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प्रतीकात्मक तस्वीर.

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तीन बच्चों के बाप इस कारीगर ने कहा कि 'नोटबंदी के बाद ये पूरा धंधा छिन्न भिन्न हो गया इसलिए हममें से कई को प्राइवेट लेवल पर लोन लेना पड़ा. मैंने किश्तों में कर्ज़ लिया जो अब करीब एक लाख रुपये तक हो चुका है'. कितना कर्ज़ चुकाया है? इस सवाल के जवाब में बबलू ने बताया कि 'कुछ नहीं. जितने पैसे मैं कमा पा रहा हूं, उसमें घर के खर्चे ही पूरे नहीं होते. कर्ज़ मेरे जी का जंजाल बनता जा रहा है. ये तो शुक्र है कि कर्ज़ देने वाला ब्याज नहीं मांग रहा, फिर भी अब क्या होगा? मुझे नहीं पता'.

बीवी और दो बच्चों के साथ रहने वाले तस्लीम ने भी कहा कि उसने भी 50 हज़ार रुपये कर्ज़ लिया है. दोनों ने ये बताने से मना किया कि कर्ज़ किससे लिया है. 42 वर्षीय ज़ाएद खान ने कहा कि जीएसटी लागू होने से पहले मांझे पर कोई टैक्स नहीं था, बस सूत के धागे पर पांच परसेंट टैक्स लगता था.

ज़ाएद ने बताया कि 'जीएसटी की मार सबसे ज़्यादा हम कारीगरों पर पड़ी. एक कंपनी कच्चा धागा बनाती है, तो टैक्स लगता है, ठीक है. लेकिन कंपनियां मांझा नहीं बनातीं, छोटे मोटे कारीगर बनाते हैं. इस पर जीएसटी लगा देना समझ के बाहर है'. एक मोबाइल फोन तक न खरीद पाने के लिए मजबूर ज़ाएद का कहना है कि 'मांझा बनाने की कला में कुशल कई कारीगर ये काम छोड़कर दूसरे धंधे करने पर मजबूर हैं. नोटबंदी के बाद कोई फल का ठेला लगा रहा है तो कोई रिक्शा चला रहा है.'

पतंग और उससे जुड़ा सामान बेचने वाले तलत ने पीटीआई को बताया कि जीएसटी के बाद से विक्रेताओं का प्रॉफिट भी कम हो गया है और कारीगरों के हाथ में आने वाली रकम भी कम हो गई. मांझा बनाने की बारीकी बताते हुए उन्होंने कहा कि पंजाब की कंपनियां जो धागा बनाती हैं, उसकी एक रील में 900 मीटर धागा होता है जिसकी कीमत 10 से 12 रुपये होती है. इसके बाद इस रील से मांझा तैयार होता है, तो यही 30 से 42 रुपये या सौ रुपये तक भी बिकती है.

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सिंथेटिक मांझा बाज़ार में आसानी से उपलब्ध है, जिसे चाइनीज़ मांझा भी कहा जाता है. फाइल फोटो.


तलत ने कहा कि 'मांझे की क्वालिटी पर उसकी कीमत तय होती है और ये कारीगर की कुशलता पर निर्भर करती है'. उन्होंने कहा कि अपनी कुशलता के हिसाब से एक कारीगर दिन के 150 रुपये से लेकर 350 रुपये तक कमा लेता है. 'लेकिन अब चूंकि इस काम में प्रॉफिट नहीं बचा है इसलिए नई पीढ़ी इस काम में हाथ नहीं डाल रही. आने वाले समय में पतंग के इस धंधे पर बड़ी मार पड़ती दिखती है'.

कभी मांझा बनाने वाले तलत अब शहर में तलत पतंग सेंटर चलाते हैं और उनका कहना है कि 'सरकार को सिंथेटिक मांझा पूरी तरह प्रतिबंधित करना चाहिए और एक पुरानी कारीगरी को बचाने के लिए टैक्स में राहत देना चाहिए'.

गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव के तीसरे चरण के मतदान के लिए बरेली शहर 23 अप्रैल को वोट करने वाला है. इस सीट से केंद्र के श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय के राज्य मंत्री संतोष गंगवार भाजपा के टिकट पर इस बार भी मैदान में हैं.

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First published: April 22, 2019, 8:59 PM IST
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