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साहब! दिन भर के मिलते हैं पचास रुपए, कैसे करूं बुजुर्गों की सेवा

साहब! दिन भर के मिलते हैं पचास रुपए, कैसे करूं बुजुर्गों की सेवा

कहते हैं मां के पैरों तले जन्नत है लेकिन आज के इस आधुनिक युग में लोग भी आधुनिक हो गए हैं। जिस मां ने अपने बच्चों को सीने से लगाकर रखा, चलना सिखाया, अपनी जरूरतों को मार कर अपने बच्चों की खुशी के लिए अपनी सारी खुशियां कुर्बान कर दी, वही मां वृद्धा आश्रमों में अपनी बेबसी पर आंसू बहा रही है। मामला बस्ती जनपद के वृद्धाश्रम का है, जहां पर लगभग 40 वृद्ध माएं रहती हैं, जिन को देख कर किसी के भी आंखों से आंसू निकल जाते हैं।

कहते हैं मां के पैरों तले जन्नत है लेकिन आज के इस आधुनिक युग में लोग भी आधुनिक हो गए हैं। जिस मां ने अपने बच्चों को सीने से लगाकर रखा, चलना सिखाया, अपनी जरूरतों को मार कर अपने बच्चों की खुशी के लिए अपनी सारी खुशियां कुर्बान कर दी, वही मां वृद्धा आश्रमों में अपनी बेबसी पर आंसू बहा रही है। मामला बस्ती जनपद के वृद्धाश्रम का है, जहां पर लगभग 40 वृद्ध माएं रहती हैं, जिन को देख कर किसी के भी आंखों से आंसू निकल जाते हैं।

कहते हैं मां के पैरों तले जन्नत है लेकिन आज के इस आधुनिक युग में लोग भी आधुनिक हो गए हैं। जिस मां ने अपने बच्चों को सीने से लगाकर रखा, चलना सिखाया, अपनी जरूरतों को मार कर अपने बच्चों की खुशी के लिए अपनी सारी खुशियां कुर्बान कर दी, वही मां वृद्धा आश्रमों में अपनी बेबसी पर आंसू बहा रही है। मामला बस्ती जनपद के वृद्धाश्रम का है, जहां पर लगभग 40 वृद्ध माएं रहती हैं, जिन को देख कर किसी के भी आंखों से आंसू निकल जाते हैं।

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कहते हैं मां के पैरों तले जन्नत है लेकिन आज के इस आधुनिक युग में लोग भी आधुनिक हो गए हैं। जिस मां ने अपने बच्चों को सीने से लगाकर रखा, चलना सिखाया, अपनी जरूरतों को मार कर अपने बच्चों की खुशी के लिए अपनी सारी खुशियां कुर्बान कर दी, वही मां वृद्धा आश्रमों में अपनी बेबसी पर आंसू बहा रही है। मामला बस्ती जनपद के वृद्धाश्रम का है, जहां पर लगभग 40 वृद्ध माएं रहती हैं, जिन को देख कर किसी के भी आंखों से आंसू निकल जाते हैं।

बहादुरपुर ब्लाक की प्रमुख नीलम सिंह ने आश्रम में सहभोज कार्यक्रम आयोजित करवाया, जिसमें खाने के साथ फलों का वितरण किया गया। मेडिकल कैम्प लगा कर चेकप करके दवाइयां बांटी गईं। वहीं वृद्ध महिलाओं ने कहा की बहुत दिनों बाद इतना अच्छा खाना खाने को मिला है। वहीं इन की बेबसी पर सरकार भी गंभीर नहीं नजर आ रही है। सिर्फ 50 रुपए महीने के हिसाब से इन वृद्ध महिलाओं को दवाओं और देख रेख के लिए दिया जाता है।

आश्रम की वार्डन का कहना है की 50 रुपए तो अस्पताल तक इन्हें ले जाने पर रिक्शे का किराया ही लग जाता है। वहीं बहुत सी वृद्ध महिलाओं को सरकारी पेंशन भी नहीं मिल रही है, जिससे उन्हें काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। समाज के लोगों को आगे आकर इन बेबस महिलाओं की ओर भी ध्यान देना चाहिए।

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