यूपी के वोट बैंक: इस बार किस पार्टी का 'राजतिलक' करेगा ब्राह्मण?

आजादी के बाद यूपी में आठ बार ब्राह्मण मुख्यमंत्री बनाया गया, लेकिन मंडल-कमंडल की सियासत के दौर में वे पिछड़ गए. 1989 से अब तक कोई ब्राह्मण नेता सीएम नहीं बन पाया है!

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: April 2, 2019, 5:42 PM IST
यूपी के वोट बैंक: इस बार किस पार्टी का 'राजतिलक' करेगा ब्राह्मण?
यूपी के वोट बैंक
ओम प्रकाश
ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: April 2, 2019, 5:42 PM IST
यूपी का राजनीतिक इतिहास इस बात का गवाह है कि राज्य का तीसरा सबसे बड़ा वोट बैंक 'ब्राह्मण' जिसकी तरफ खड़ा हो जाता है अक्सर उसी के पास कुर्सी भी होती है. यूपी के 21 मुख्यमंत्रियों में 6 ब्राह्मण रहे और एनडी तिवारी तो तीन बार सीएम रहे. ब्राह्मणों ने 23 साल तक यूपी पर राज किया, जब सीएम नहीं भी रहे तो भी मंत्री पदों पर उनकी संख्या और जातियों की तुलना में सबसे बेहतर रही. फिलहाल मोदी मंत्रिमंडल में 11 केंद्रीय मंत्री ब्राह्मण हैं, जबकि पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में बनी पहली केंद्र सरकार में सात ब्राह्मण मंत्री थे, जो कि उस मंत्रिमंडल का 30%था.

बहरहाल, साल 1980 आया और मंडल कमीशन की रिपोर्ट पेश हुई, 10 साल बाद ये रिपोर्ट लागू हुई और यूपी में दलित-ओबीसी राजनीति ने ब्राह्मणों को पीछे धकेल दिया. मंडल के बाद भले ही बीजेपी भी सत्ता में आई लेकिन कोई ब्राह्मण सीएम नहीं बन पाया. 1990 के बाद वो वक्त आया जब मजबूत ब्राह्मण नेता वाले वसंत साठे, मधु दंडवते, रामकृष्ण हेगड़े चुनाव हारे और हाशिए पर चले गए. चुनावी विश्लेषकों का कहना है कि सियासत और सत्ता के 'ड्राइवर' रहे ब्राह्मण अब 'स्टेपनी' हो गए हैं!  (ये भी पढ़ें: क्या दलित बीजेपी को वोट नहीं देते, आंकड़ों में देखिए सच क्या है?)

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मंडल के बाद यूपी में ब्राह्मणों की भूमिका बदली और वो 'ड्राइविंग फ़ोर्स' की जगह 'सपोर्टिव वोट बैंक' में बदल गए. सत्ता में न सिर्फ उनकी भागीदारी कम होती गई बल्कि उन्हें वक्त के साथ अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने के लिए सपा-बसपा जैसी उन पार्टियों के साथ भी खड़ा होना पड़ा जिनकी राजनीति का आधार ही ब्राह्मणों की सत्ता को चुनौती देना था.

2009, 2014 में किसके साथ रहे ब्राह्मण!

सीएसडीएस ने अपने एक सर्वे में बताया कि पिछले दो लोकसभा चुनावों में ब्राह्मण किसके साथ नजर आया. 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में 31 फीसदी ब्राह्मणों ने वोट किया था. जबकि  2014 में उसके पक्ष में सिर्फ 11 फीसदी ही रह गए. 2009 में बीजेपी को 53 परसेंट ब्राह्मणों ने वोट किया. जबकि 2014 में 72 फीसदी का समर्थन मिला. बीएसपी को इस वर्ग का 2009 में 9 फीसदी जबकि 2014 में सिर्फ 5 फीसदी वोट मिला. समाजवादी पार्टी इन्हें नहीं रिझा पाई. उसे 2009 और 2014 दोनों लोकसभा चुनाव में पांच-पांच फीसदी ही ब्राह्मण वोट हासिल हुए.

15% से ज्यादा वोट वाली सीट:
बलरामपुर, बस्ती, संत कबीर नगर, महाराजगंज, गोरखपुर, देवरिया, जौनपुर, अमेठी, वाराणसी, चंदौली, कानपुर, इलाहाबाद

यूपी और ब्राह्मण
यूपी की राजनीति में ब्राह्मण वर्ग का लगभग 10% वोट होने का दावा किया जाता है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भले ही मुस्लिम-दलित आबादी 20-20% हो लेकिन रणनीति और समझदारी से वोटिंग के मामले में ब्राह्मणों से बेहतर कोई नहीं है. ब्राह्मणों की इसी खासियत ने उन्हें हर पार्टी नेतृत्व के करीब रखा.

मंडल आंदोलन के बाद यूपी की सियासत पिछड़े, दलित और मुस्लिम केंद्रित हो गई. नतीजतन, यूपी को कोई ब्राह्मण सीएम नहीं मिल सका. ब्राह्मण एक दौर में पारंपरिक रूप से कांग्रेस के साथ था, लेकिन जैसे-जैसे कांग्रेस कमजोर हुई यह वर्ग दूसरे ठिकाने खोजने लगा. मौजूदा समय में वो बीजेपी के साथ खड़ा नजर आता है. कांग्रेस उन्हें दोबारा अपने पाले में लाने की जद्दोजहद कर रही है.

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'कांग्रेस ऐसी पार्टी है जिसके खून में ब्राह्मण समाज का डीएनए है.'

3 सितंबर 2018 को कांग्रेस के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी रणदीप सुरजेवाला'ब्राहमण सम्मलेन' में थे. वहां उन्होंने कहा, 'कांग्रेस ऐसी पार्टी है जिसके खून में ब्राह्मण समाज का डीएनए है.' साथ ही आश्वासन दिया कि कांग्रेस सरकार में आई तो ब्राह्मण कल्याण बोर्ड बनेगा. इससे पहले गुजरात चुनाव के दौरान रणदीप सुरजेवाला ने ही राहुल गांधी को जनेऊधारी हिंदू बताते हुए उनकी जनेऊधारी वाली तस्वीरें भी जारी की थीं.

ब्राह्मणों का समर्थन पाने के लिए राजनीतिक दल ब्राह्मण चेहरे पेश करते रहे हैं. दिक्कत ये है कि यूपी में न तो अब कांग्रेस के पास जवाहरलाल नेहरू, बीजेपी के पास अटल बिहारी वाजपेयी और सपा के पास जनेश्वर मिश्र जैसा कोई सर्वमान्य नेता नहीं है. बीजेपी में इस वक्त मुरली मनोहर जोशी और कलराज मिश्र जैसे बड़े ब्राह्मण नेता तो हैं लेकिन उन्हें मुख्य धारा से लगभग अलग कर दिया गया है.

सीएसडीएस के भारतीय भाषा कार्यक्रम के निदेशक अभय दुबे कहते हैं कि लोकतंत्र संख्याबल का खेल है, जिसकी संख्या ज्यादा है वो बढ़ते रहेंगे. इसीलिए ओबीसी वर्ग का प्रतिनिधित्व लगातार विधानसभा और लोकसभा में बढ़ रहा है और ब्राह्मणों का प्रभाव सीमित हो रहा है. ब्राह्मणों का प्रभाव विशेष रूप से हिंदी पट्‌टी में तेजी से कम हुआ है. 1984 में जहां लोकसभा में पहुंचने वाले सांसदों का प्रतिशत 19.91 था, वहीं 2014 में घटकर 8.27 पर आ गया है. हालांकि ब्राह्मण ऐसा वर्ग है जो सत्ता के करीब रहना जानता है और इसके लिए अपनी भूमिका में लगातार बदलाव करता रहता है.

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यूपी में क्यों फिर जरूरी हुए ब्राह्मण ?

मंडल के बाद भले ही ब्राह्मण ड्राइविंग सीट से बेदखल हो गया लेकिन 1995 का गेस्ट हाउस कांड यूपी की राजनीति में वो टर्निंग पॉइंट साबित हुआ जब दलित-ओबीसी राजनीति ताकतें एक दूसरे की सबसे बड़ी दुश्मन बन गईं. सपा-बसपा की इसी दुश्मनी का सीधा फायदा ब्राह्मण वोट बैंक को हुआ जो कांग्रेस के ख़त्म होते जाने से बीजेपी में जगह तलाश रहा था लेकिन यूपी बीजेपी में भी ठाकुर-बनिया राजनीति हावी थी और लगातार विपक्ष में रहना या तीसरे नंबर की पार्टी के साथ रहना ब्राह्मणों का 'स्टाइल' नहीं था. 2007 के चुनाव में यूपी में सिर्फ़ 17% ब्राह्मणों ने ही मायावती को वोट दिया था और इसमें से भी अधिकतर वोट बसपा को वहां मिले थे जहां उसने ब्राह्मण उम्मीदवार खड़ा किए हुए थे.

राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव कहते हैं कि मंडल ने देश और खासकर यूपी की राजनीति का चेहरा बदल दिया. इसने राजनीति को हॉरिजेंटली और वर्टिकली दोनों तरह से बदला और जो हाशिए पर थे केंद्र में आ गए, केंद्र वाले हाशिए पर चले गए. मायावती के उदय के साथ-साथ यूपी की राजनीति दो ध्रुवीय ही गई थी. एक तरफ सपा थी और दूसरी तरफ बसपा.

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2007 में मायावती ने ब्राह्मणों को साथ लिया क्योंकि तब तक सपा बसपा के बीच यूपी में वोटों का अंतर घटकर  8% से कम रह गया था. इतने ही वोट के अंतर से सरकार बन रही थी, और दूसरी बड़ी पार्टी विपक्ष में बैठ रही थी. ब्राह्मण एकजुट होकर रणनीतिक वोटिंग में महारथी थे. पहले 30 साल तक कांग्रेस,  2007 में मायावती, 2012 में सपा और 2014/2017 में बीजेपी के लिए उन्होंने ऐसा करके दिखाया भी.

राजनीति विश्लेषक और पत्रकार रमेश शर्मा बताते हैं कि 1857 में निकली कमल-रोटी यात्रा में ज्यादातर ब्राह्मण ही थे. यूपी में एक समय 60% विधायक ब्राह्मण होते थे. तब भी जनसंख्या तो मुसलमान, दलित और ओबीसी की ही 80% थी. मंडल कमीशन के बाद राजनीतिक पासा पलटा. राजनीतिक रूप से अभी भी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, दिल्ली, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, हिमाचल, उत्तराखंड आदि में ब्राह्मण अहम वोट बैंक है.

2009 के लोकसभा चुनाव में मन मुताबिक कामयाबी न मिलने के बाद बसपा ने भाईचारा कमेटियां भंग कर दी थीं. उधर समाजवादी पार्टी ने ब्राह्मण सम्मेलन शुरू किए थे और 'प्रमोशन में आरक्षण' के बीएसपी के कदम का विरोध कर ब्राह्मणों के एक हिस्से को अपने पाले में कर लिया.

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इसका सीधा फायदा अखिलेश को 2012 में हुआ. 2014 लोकसभा चुनावों में बसपा ने यूटर्न लेते हुए 22 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया. 2017 के यूपी विधानसभा चुनावों में भी 66 ब्राह्मण उम्मीदवारों को मैदान में उतारा लेकिन हालांकि तब तक काफी देर हो चुकी थी और ब्राह्मण बीजेपी के पाले में जा चुके थे.

आजादी से पहले ही मजबूत कर ली थी सत्ता पर पकड़

आजादी से पहले देश का शासन जब आंशिक रूप से भारतीयों के हाथ आने लगा तभी से ब्राह्मणों ने सत्ता में अपनी पकड़ मजबूत कर ली. 1935 में भारत शासन अधिनियम लागू होने के बाद उत्तर प्रदेश यूनाइटेड प्रोविंस के दूसरे प्रीमियर 17जुलाई 1935 को गोविंद बल्लभ पंत बने और इस पद पर वे 02 नवंबर 1939 तक रहे.

इसके बाद 1 अप्रैल 1946 से 25 जनवरी 1950 तक वे इस पद पर रहे. आजादी के बाद वे 26 जनवरी 1950 को यूपी के पहले सीएम बने. वे इस पद पर 27 दिसंबर 1954 तक रहे. यूपी में लगभग 10 फीसदी आबादी वाले ब्राह्मण पूर्वांचल में ज्यादा प्रभावी हैं. करीब 30 जिलों में उनकी अहम भूमिका होती है, लेकिन इनका प्रभाव वहां भी दिखता है जहां ये कम हैं. क्योंकि ये 'डिसाइडिंग शिफ्टिंग' वोट माना जाता है.

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यूपी में ब्राह्मणों की भागीदारी

पिछले 5 विधानसभा चुनावों की बात करें तो हर पार्टी ने चुनाव में ब्राह्मण कार्ड खेला. जिससे पार्टियों को अच्छा फायदा भी देखने को मिला. बसपा के टिकट पर 1993 में एक भी ब्राह्मण विधायक चुनकर विधानसभा नहीं पहुंच पाया था. हालांकि इसके बाद 1996 में 2, 2002 चुनाव में 4, 2007 में 41 और 2012 में 10 ब्राह्मण विधायक चुनकर सदन पहुंचे. 2017 में भी बसपा ने 66 ब्राह्मणों को टिकट दिया था.

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बीजेपी की बात करें तो 1993 में 17, साल 1996 के चुनाव में 14, 2002  में 8 विधायक, 2007 में 3 और 2012 में 6 ब्राह्मण विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे. 2017 में भी 17% से ज्यादा विधायक ब्राह्मण जाति से चुनकर विधानसभा पहुंचे हैं. सपा की बात करें तो 1993 में 2 विधायक, 1996 में 3, 2002 में 10 विधायक, 2007 में 11 और 2012 में 21 ब्राह्मण विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे. 2017 में भी सपा ने 10% ब्राह्मणों को टिकट दिया था. कांग्रेस से 1993 में 5 विधायक, 1996 में 4, 2002 में 1, 2007 में 2 और 2012 में 3 ब्राह्मण विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे थे जबकि 2017 में कांग्रेस ने 15% ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया था.

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ब्राह्मण और सोशल इंजीनियरिंग

2007 के विधानसभा चुनावों में मायावती ने जब दलित, ब्राह्मण सोशल इंजीनियरिंग का प्रयोग किया, तो यह प्रयोग यूपी के इतिहास का सबसे सफल प्रयोग साबित हुआ. पहली बार मायावती की पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनी. दलितों की पार्टी कही जाने वाली बीएसपी में दूसरे नंबर के नेता का कद सतीश चन्द्र मिश्रा को दिया गया. 2007 के चुनावों में मायावती ने ब्राह्मणों को उम्मीदवार बनाया, दलित-ब्राह्मण गठजोड़ के चलते 41 ब्राह्मण प्रत्याशी जीते भी. मायावती ने कई ब्राह्मण नेताओं को भी मंत्रिमंडल में जगह दी थी. 2007 के चुनावों की तरह ही 2009 के लोकसभा चुनाव में भी मायावती ने एक बार फिर सोशल इंजीनियरिंग की. मायावती ने 2009 के चुनाव में सबसे अधिक 20 सीटों पर ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे.

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उधर, ब्राह्मण मायावती के साथ तो गए लेकिन एससी/एसटी एक्ट और कई ज़मीन विवादों में बसपा सुप्रीमो के सीधे हस्तक्षेप के चलते ब्राह्मणों का एक हिस्सा नाराज़ हो गया. साल 2009 के लोकसभा चुनावों में बसपा से नाराज ब्राह्मण वोटरों ने 1989 के बाद पहली बार यूपी में कांग्रेस का साथ दिया.  इसका नतीजा ये हुआ कि 2004 के लोकसभा चुनावों में 4 सीट जीतने वाली कांग्रेस पार्टी को 2009 में 21 सीटों पर जीत गई.

बसपा से नाराज़ ब्राह्मण भले ही 2009 में कांग्रेस के साथ गए लेकिन यूपी विधानसभा चुनावों में उन्होंने फिर से अपनी रणनीति बदली और बीजेपी से काफी मजबूत नज़र आ रहे अखिलेश के पाले में चले गए. अपने चुनावी प्रचार में ही समाजवादी पार्टी ने ब्राह्मणों को बड़े पैमाने पर रिझाने की कोशिश की और यह छवि बनाई कि ब्राह्मण मायावती का साथ छोड़कर अखिलेश यादव के पास आ रहे हैं. राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, 2009 के लोकसभा चुनावों के बाद मायावती ने दलितों को कथित तौर पर बड़े पैमाने पर एससी-एसटी एक्ट के तहत मामले दर्ज करने की छूट दी. मायावती के इस कदम से ब्राह्मणों में नाराजगी बढ़ी और सपा को इसका सीधा फायदा हुआ.

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सियासत के 'ड्राइवर' रहे ब्राह्मण क्या अब 'स्टेपनी' हो गए हैं?


इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर एचके शर्मा यूपी में ब्राह्मणों की पॉलिटिकल पावर को दो हिस्सों में देखते हैं. प्री मंडल और पोस्ट मंडल. शर्मा इन दोनों के राजनीतिक पैटर्न में बड़ा अंतर बताते हैं. शर्मा के मुताबिक, 'मंडल आयोग ने बताया कि 50 फीसदी से अधिक पिछड़ी जातियां हैं. आयोग की रिपोर्ट उसे लागू होने के बाद इस वर्ग की राजनीति में सक्रिय भागीदारी को रोका नहीं जा सकता था. इसलिए मंडल के बाद जब अगड़ों की पार्टी कही जाने वाली बीजेपी की सरकार आई तो कलराज मिश्र जैसे ब्राह्रमण नेता की बजाय उसे कल्याण सिंह को चुनना पड़ा.'

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शर्मा के मुताबिक, 'मंडल से पहले यूपी की सियासत में ब्राह्मण अपनी संख्या की तुलना में अधिक थे लेकिन मंडल के बाद अपनी संख्या के मुकाबले उनकी भागीदारी कम हो गई. विधायक, मंत्री और सांसद बनते रहे हैं लेकिन उन्हें ड्राइविंग सीट नहीं मिली. वो कुछ दिन बैक सीट पर बैठाए गए और अब स्टेपनी बना दिए गए हैं. 2007 में बसपा प्रमुख मायावती ने इन्हें अपनी ओर किया लेकिन उतनी भागीदारी नहीं दी जितनी उन्हें चाहिए थी इसलिए उनसे यह वर्ग छिटक गया. 1989 के बाद यूपी में कोई ब्राह्मण सीएम नहीं बना. बीजेपी ने 2017 में डिप्टी सीएम बनाया लेकिन सिर्फ जातीय संतुलन बैठाने के लिए.'

हालांकि, अखिल भारतीय ब्राह्मण महासंघ के महासचिव नरेंद्र दधीचि कहते हैं, 'हर सरकार और पार्टी में ब्राह्मणों को प्रतिनिधित्व मिला हुआ है, चाहे कम चाहे ज्यादा.'

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दूसरी ओर, यूपी के वरिष्ठ पत्रकार टीपी शाही कहते हैं. 'मंडल के बाद भी लगभग हर सीएम की कैबिनेट में ब्राह्मणों की अच्छी संख्या रही है. कई मामलों में उनकी भागीदारी अन्य जातियों से ज्यादा रही है. योगी सरकार में भी आठ ब्राह्मण मंत्री हैं. हां, ये जरूर कहा जा सकता है कि जितना मंडल कमीशन लागू होने से पहले उनका प्रभाव था, अब नहीं है. क्योंकि कोई सीएम नहीं बन पाया.'

सीनियर जर्नलिस्ट राजीव दत्त पांडे कहते हैं, 'ब्राह्मण कभी कांग्रेस का कोर वोटबैंक हुआ करता था. लेकिन बाद में यह बिखर गया. सभी पार्टियों में ब्राह्मण नेता हैं और सभी को इसका वोट जाता है. ब्राह्मण क्षत्रप अपने-अपने क्षेत्रों में इस वर्ग का ज्यादातर वोट लेंगे. फिलहाल इस वोटबैंक का झुकाव बीजेपी की तरफ ज्यादा लगता है. मंडल के बाद राजनीति में धीरे-धीरे ब्राह्मण हाशिए पर जा रहे हैं. अब वो हर वर्ग के निशाने पर है.'

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कांग्रेस से ब्राह्मणों के मोह की वजह ?

राजनीतिक जानकारों इसकी वजह भागीदारी को मानते हैं. कांग्रेस ने मंडल कमीशन लागू होने से पहले ब्राह्मणों को आठ बार यूपी का सीएम बनवाया. जिनमें से तीन बार नारायण दत्त तिवारी और पांच बार अन्य ब्राह्मण नेताओं को कुर्सी दी गई. पांच दिसंबर 1989 के बाद कांग्रेस यूपी की सत्ता से दूर होती गई. इसके बाद ब्राह्मण अलग-अलग पार्टियों के हो गए. बीजेपी के बाद बीएसपी ने भी उनका समर्थन हासिल किया. यानी बसपा भी ब्राह्मणों के प्रभाव से बच नहीं पाई. मुस्लिमों,दलितों से कम आबादी होने के बावजूद ब्राह्मण सभी पार्टियों के अहम पदों पर है.

सियासी जानकारों का कहना है कि पूर्वांचल में कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को मैदान में उतारा है तो उसके पीछे एक बड़ी वजह ब्राह्मण वोटरों को अपनी ओर खींचना भी है. यूपी में ब्राह्मण सियासी रूप से कितना महत्वपूर्ण है इसकी एक बानगी कांग्रेस ने 2017 में दिखाई थी. विधानसभा चुनाव से पहले जब कांग्रेस-सपा गठबंधन नहीं हुआ था तब पार्टी ने मुख्यमंत्री के तौर पर शीला दीक्षित को प्रोजेक्ट किया था. तीन बार दिल्ली की सीएम रहीं दीक्षित को यूपी में कांग्रेस ने इसलिए पार्टी का चेहरा बनाया क्योंकि वह यहां के ब्राह्मण परिवार में ब्याही गईं. हालांकि कांग्रेस का यह दांव नहीं चला.

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बीजेपी और ब्राह्मण

फिलहाल, बीजेपी ने यूपी का प्रदेश अध्यक्ष ब्राह्मण (महेंद्रनाथ पांडे) को बना रखा है. डिप्टी सीएम ब्राह्मण है. पश्चिमी यूपी से महेश शर्मा केंद्रीय मंत्री हैं तो पूर्वांचल से शिव प्रताप शुक्ल को राज्यसभा सदस्य बनाकर उन्हें वित्त राज्य मंत्री जैसा अहम पद दिया है. हालांकि, कलराज मिश्र का मंत्री पद चला गया है. यूपी कैबिनेट में आठ ब्राह्मण मंत्री हैं. जिसमें बृजेश पाठक बसपा से बीजेपी में आए थे और डॉ. रीता बहुगुणा जोशी कांग्रेस से. पाठक बसपा में ब्राह्मण जोड़ो मुहिम से जुड़े रहे थे. यूपी बीजेपी की प्रदेश कार्यसमिति में जो 32 स्थायी आमंत्रित सदस्य बनाए गए हैं उनमें आठ ब्राह्मण नेता हैं. अध्यक्ष भी ब्राह्मण हैं. ब्राह्णण वोटों की सबसे बड़ी दावेदारी बनने वाली बीजेपी ने जब केन्द्रीय मंत्रिमंडल विस्तार किया, तो यूपी से महेन्द्र पांडे को जगह दी, राज्यसभा में सदस्य भेजने की बात आई, तब भी बीजेपी ने शिव प्रताप शुक्ला को आगे किया. ये सारे संकेत बताते हैं कि यूपी में ब्राह्मण वोटरों की अहमियत क्या है?

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बसपा और ब्राह्मण

तिलक तराजू और तलवार... का नारा देने वाली बसपा ने तीन बार सत्ता हासिल करने के बाद बसपा भी इस वर्ग की वोटिंग ताकत से अपने आपको बचा नहीं पाई. उसने 2007 के विधानसभा चुनावों में दलित, ब्राह्मण और मुस्लिम की सोशल इंजीनियरिंग की. नारा बदलकर 'ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा... और हाथी नहीं गणेश है ब्रह्मा, विष्णु,महेश है...' हो गया. यह प्रयोग यूपी के इतिहास का सबसे सफल माना जाता है. मायावती ने 403 में से 206 सीटों पर जीत दर्ज की. उसे 30.43 फीसदी वोट मिले. दलितों की पार्टी कही जाने वाली बसपा में इस वक्त मायावती के बाद सबसे ताकतवर नेता सतीश चंद्र मिश्रा को ही माना जाता है.

राइट के साथ 'लेफ्ट' में भी ब्राह्मण

वामपंथी राजनीति में ब्राह्मण वर्चस्व आज भी नहीं टूटा है. सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी ब्राह्मण हैं. पुराने वामपंथी नेता अवनि मुखर्जी, चतुरानन मिश्र, गीता मुखर्जी, बुद्धदेव भट्‌टाचार्य, अच्युतानंदन ब्राह्मण हैं. योगेंद्र यादव बताते हैं कि नंबूदिरीपाद से लेकर सीताराम येचुरी तक ब्राह्मणों का माकपा में इतने ताकतवर पदों पर रहना साफ बताता है कि वैचारिक तौर पर ब्राह्मण आज भी अन्य पर भारी हैं. कुछ अन्य विश्लेषक इसी संदर्भ में बीजेपी के साथ जुड़े आरएसएस के ब्राह्मणों को भी जोड़कर देखते हैं.

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बिजनेस स्कूल एक्सएलआरआई जमशेदपुर में प्रोफेसर और विप्र फाउंडेशन से जुड़े प्रो. गौरव वल्लभ शर्मा कहते हैं कि शुरुआत से ही वह संप्रदाय, समुदाय या जाति आगे रही जो शिक्षा में अग्रणी रही हो. ब्राह्मण राजनीति में आगे रहे हैं इसका कारण शिक्षा ही थी. अब ब्राह्मणों के प्रति जो लगाव था वह कम हो रहा है और उसका असर भी दिख रहा है.

दलितों की पार्टी में सबसे प्रभावशाली ब्राह्मण नेता

बहुजन समाज पार्टी में मायावती के बाद सतीशचंद्र मिश्र सबसे ताकतवर नेता माने जाते हैं. बीएसपी की ऑफीशियल वेबसाइट पर लीडरशिप कॉलम में सिर्फ दो नेताओं के ही नाम हैं. मायावती और सतीशचंद्र मिश्र. दलितों की पैरोकार पार्टी में ब्राह्मणों की कितनी अहमियत समझी गई है, इसका ये बड़ा उदाहरण है. 2007 में ब्राह्मणों के सहारे मायावती ने यूपी में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी. माना जाता है कि बसपा से ब्राह्मणों को जोड़ने का सबसे बड़ा योगदान मिश्र का ही है. ब्राह्मण भाईचारा सम्मेलन शुरू करवाए. मिश्र की वजह से ही कई बार ब्राह्मणों को टिकट देने में बीएसपी बीजेपी को चुनौती देती नजर आती है. हालांकि, कई सियासी विशेषज्ञों का कहना है कि दलित-ब्राह्मण का गठजोड़ सहज नहीं है. यह काठ की हांडी चढ़ने जैसा है. जो दूसरी बार शायद ही चढ़ाई जा सके.

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ब्राह्मण भी हमेशा एक नहीं रहे!

अपनी सहूलियत के लिए यूपी में सभी पार्टियों ने ब्राह्मण नेताओं को जगह दी. उन्हें पद से नवाजा. हर नेता अपनी पार्टी को ब्राह्मणों की सबसे बड़ी हितैषी बताता रहा. '24 अकबर रोड; के लेखक और सीनियर जर्नलिस्ट रशीद किदवई कहते हैं, 'पार्टी, क्षेत्र और सरनेम के हिसाब से ब्राह्मण नेताओं में काफी खींचतान रही है. क्योंकि हर कोई चाहता था कि वो सबसे बड़ा ब्राह्मण नेता माना जाए. जैसे नारायण दत्त तिवारी और हेमवती नंदन बहुगुणा में नहीं बनती थी. नारायण दत्त तिवारी और जितेंद्र प्रसाद में नहीं बनी. जितेद्र प्रसाद खुद को तिवारी से ज्यादा श्रेष्ठ ब्राह्मण मानते थे. पूर्वांचल में जब तक हरिशंकर तिवारी का जलवा था उन्होंने कभी किसी पार्टी में कोई बड़ा ब्राह्मण नेता नहीं उभरने दिया. गोविंद बल्लभ पंत पूर्वी यूपी के ब्राह्मणों को उतना पसंद नहीं थे जितने उन्हें पूर्वी यूपी के ब्राह्मण नेता पसंद आते थे.'

किदवई कहते हैं, 'अगर एक लोकसभा या विधानसभा क्षेत्र में तिवारी, शुक्ला, दूबे और पंत सरनेम वाले ब्राह्मण चुनाव लड़ रहे हैं तो निश्चित तौर पर ज्यादातर वोट अपने सरनेम वाले नेता को चुनेंगे. अपवाद हो सकता है लेकिन यह पैटर्न देखने को मिलता है.' जबकि वरिष्ठ पत्रकार टीपी शाही का मानना है कि, 'अगर किसी सीट से कई ब्राह्मण प्रत्याशी खड़े हैं तो वहां का ब्राह्मण वोटर प्रत्याशियों के गोत्र और सरनेम नहीं बल्कि काम और अन्य पहलुओं पर वोट देता है.

साथ में अंकित फ्रांसिस, ग्राफिक्स: अनिकेत

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