ब्रज भाषा विशेष - तौकों ठौर मिलेगौ ना कोरोना, तेरो नास जाएगो
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ब्रज भाषा विशेष - तौकों ठौर मिलेगौ ना कोरोना, तेरो नास जाएगो
हंस सुता की सुंदर कगरी अरु कुंदन की छाहीं.. सांकेतिक फोटो - न्यूज 18

कबहुं कम ना होवे जा ब्रज कौ रस. कैसिऊ विपदा पड़ि जाए ब्रजबासी तौ खूब आनंद ते रहि रहो है. ब्रज के कण कण के आनंद ते ब्रज के ग्वालवाल, गोपी गोपिका मस्त हैं.

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  • Last Updated: August 28, 2020, 10:32 AM IST
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सबेरे की ताजी ताजी हवा, मिट्टी की खसबोयी, पक्षीनि कौ चहचहाहट, मोरों की बहुतायत व उनकी पियूँ - पियूँ की आवाज, राम राम सा और राधे राधे की धुनि के संग सबनिकुं अभिवादन, दूध दही मक्खन खस्ता कचौरी जलेबी कौ नाश्ता, मंदिरनि के घण्टनि की अवाज, एक दूसए के हाल चाल पूछिवो, दोस्तनि की मंडली, पेड़ों की छाव, कुल्हड कौ दूध, ताऊ- ताई, चाचा- चाची, भैया- भाभी, अम्मा- बाबा के रिश्ते, मंदिरिनि में ते तड़के ही चारि बजें घन्टे घड़ियाल शंखध्वनि की गूँज, पंडों का सबेरे ही सबेरे सबनिकुं राधे राधे जि सबु तौ जा ब्रज में अबऊ है रहो है और ब्रजबासी खूब आनन्द ते रै रहो है.

कृष्ण जन्माष्टमी, यम द्वितीया, गुरु पूर्णिमा, राधाष्टमी पे खूब आनन्द मंगल भये हैं. जन्माष्टमी पे राधारमण जी के मंदिर में जब सेवायत राधारमणलाल की जय जयकार करति भए अपने मूड पै मट्टी के घडनि में जमुनाजी कौ पानी लेके आए तौ एक दम ते आनंद की खूब वर्षा सी भई. चारि घंटा नौ अभिषेक भयो. एक ओर 27 मन दूध, दही, खंडसारी, शहद, घी, जड़ीबूटीनि ते ठाकुरजी कौ अभिषेक चल रह्यो तौ दूसई ओर घंटे, घड़ियाल, जयकारे वैदिक मंत्रों के पाठ ते आसपास कौ वातावरण पूरो भक्ति में छाइ गयौ. ठाकुरजी कूं रेशम, जरी, रत्न, प्रतिकृति के सुंदर संयोजन ते बनी पुष्प वृन्त पोशाक पहिनाई गयी. फिर आरती करिकें सेवायतों नि सबनिकुं चरणामृत बाँटो. खूब आनंद भयो, शहनाई ठोल नगाडो के संग महिलाओं की मंडली और ग्वालों की टोली ने गीत मल्हार गाए. महिला अपने घरनि में गावन उठीं "जशोदा जायो लालना में वेदनि में सुनि आई"

ब्रज में कबहुँ मायूसी ना छा सके.
सब जगह सब मंदिरनि में खूब उत्सव भयो. भैया या ब्रज में कबहुँ मायूसी ना छा सके. कृष्ण कन्हैया लाल की बाल लीला की धुनि यां रोम रोम में बसी है. हाँ जा कोरोना ते इतेक जरूर भयो कि जो हर साल यां पे बाहिर ते देश विदेशनि ते हज़ारों लाखों श्रद्धालु ब्रज के रास, भगवान की बाल लीलाओं की मनोहारी यादें, ब्रजयात्रा कौ आनंद, कृष्ण जन्मभूमि, द्वारिकाधीश मंदिर, राजकीय संग्रहालय, बाँके बिहारी मंदिर, रंगनाथ जी मंदिर, गोविन्ददेव जी मंदिर, इस्कॉन मंदिर, मदन मोहन मंदिर, दानघाटी मंदिर, मानसी गंगा, कुसुम सरोवर, राधा रानी मंदिर, नंद जी मंदिर विश्रामघाट, दाऊजी मंदिर, ब्रज चौरासी कोस की परिकम्मा, ब्रज के वन- उपवन, कुंज- निकुंज, यमुना व गिरिराज जी का अत्यंत दुर्लभ दृश्य, कोटिवन, काम्यवन, कुमुदवन, कोकिलावन, मधुवन, महावन का प्राकृतिक सौंदर्य ते परिपूर्ण विहंगम दृश्य के दर्शन कूं आवते बे ना आए. कोरोना के मारे श्रद्धालुनि के आईवे पे नेक विरामु सो लग गयो.परंतु ब्रज के कण कण के आनंद ते ब्रज के ग्वालवाल, गोपी गोपिका खूब मस्त हैं.
पूरी दुनिया में जा कोरोना की दहशति है परि जा ब्रज में तौ ब्रजवासी नि कोरोनो के गीत नि की धूम मचा दी है. -


"तौकों ठौर मिलेगौ ना, कोरोना तेरे नास जाएगो, तैने ब्रजवासिनि ते छीनि लियौ जलेबी कचौड़ी कौ दौना"

जे गीत इस समय हर काहू की जुबान पे सुनिबे कूं मिल जावेगो.

ऊधो मोहि ब्रज बिसरत नाहीं
ब्रजवासी तौ इंद्र के भायनक प्रकोप ते ना डरे, जब उसने पूरे ब्रज कूं भयानक आँधी तूफान के साथ जलमग्न कर दिया तब भी भगवान श्रीकृष्ण ने गिरिराज पर्वत उठाईकें उनकी रक्षा करी. ऐसो ही विश्वास ब्रजवासीनि में अबऊ है. या ब्रज के आनंद और यां के प्राकृतिक सौंदर्य, धूल मिट्टी में लिपटकें ग्वालवाल नि के संग खेलिवो, गोपी गोपिका नि के संग ब्रज कौ रास रचाईबो, माखन चुराइवों या सबे स्वयं साक्षात निर्मोही भगवान श्रीकृष्ण महलों का सुख प्राप्त करकेउ न भूलि सके तौ सोचो ब्रज में कितनो आनंद होगो. ई कोरोना का करि सके कितहु न टिके या ब्रज में तौ.

महाकवि सूरदार की जे पंक्तियाँ अपने आप में बहुत कुछ बतावे हैं-
ऊधो मोहि ब्रज बिसरत नाहीं, वृंदावन गोकुल तन आवत सघन तृनन की छाहीं..
प्रात समय माता जसुमति अरु नंददेखि सुख पावत, माखन रोटी दही सजायौ अति हित साथ खवावत.
हंस सुता की सुंदर कगरी अरु कुंदन की छाहीं, ऊधौ मोहि ब्रज विसरत नाहीं.

ब्रज में ही बहुत कुछ बसौं है.
जे सब आनंद, प्रकृति कौ अनुपम दृश्य आजुहु ब्रज में है. या ब्रज में तौ चाहे कछू है जावे है परि या पें तौ प्रभु की ऐसी कृपा है कि कबहुँ या से आनन्द खत्म ना है सके. ब्रजबासीनि कौ जे आत्मविश्वास कबहुँ ना कम हो सके. ब्रजबासी बड़े ही प्यारे, धैर्यशील, सहनशील होवे हैं. राधाष्टमी के पर्व पे श्रीजीकी झाँकी बड़े धूमधाम ते निकली. इन ब्रजबासिनि कूं कोई डगमग ना कर सके. अब कछु बंद हैवे की वजह से ब्रजबासिनि को खूब नुकसान जरूर भयो है परि इनको उत्साह, उमंग, प्रेम, विश्वास अद्भुत और अतुलनीय है. इनकी भूख तौ या गईया नि के पैरों की धूल और उनके दूध से ही मिट जावे है. ब्रजबासिनि कूं तौ कछु न चाहिए ब्रज में ही बहुत कुछ बसौं हैहंस सुता की सुंदर कगरी अरु कुंदन की छाहीं
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