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इंसानियत की मिसाल: इन तीन मरीजों के लिए दिन-रात एक कर रही हैं अस्पताल की नर्सें

इंसानियत की मिसाल: इन तीन मरीजों के लिए दिन-रात एक कर रही हैं अस्पताल की नर्सें

भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, अनैतिकता जैसे शब्द आज सरकारी व्यवस्था का हिस्सा बन गए हैं, लेकिन इस सबके बीच ऐसे भी लोग है जो बुराइयों में रहते हुए अपनी राह जुदा करते है और दुनियां के लिए मिसाल बन जाते है। बुलंदशहर के जिला अस्पताल की नर्सें बीते आठ महीनों से तीन ऐसे मरीजों की सेवा कर रही है, जिनका इस दुनियां में शायद कोई नहीं है।

भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, अनैतिकता जैसे शब्द आज सरकारी व्यवस्था का हिस्सा बन गए हैं, लेकिन इस सबके बीच ऐसे भी लोग है जो बुराइयों में रहते हुए अपनी राह जुदा करते है और दुनियां के लिए मिसाल बन जाते है। बुलंदशहर के जिला अस्पताल की नर्सें बीते आठ महीनों से तीन ऐसे मरीजों की सेवा कर रही है, जिनका इस दुनियां में शायद कोई नहीं है।

भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, अनैतिकता जैसे शब्द आज सरकारी व्यवस्था का हिस्सा बन गए हैं, लेकिन इस सबके बीच ऐसे भी लोग है जो बुराइयों में रहते हुए अपनी राह जुदा करते है और दुनियां के लिए मिसाल बन जाते है। बुलंदशहर के जिला अस्पताल की नर्सें बीते आठ महीनों से तीन ऐसे मरीजों की सेवा कर रही है, जिनका इस दुनियां में शायद कोई नहीं है।

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भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, अनैतिकता जैसे शब्द आज सरकारी व्यवस्था का हिस्सा बन गए हैं, लेकिन इस सबके बीच ऐसे भी लोग है जो बुराइयों में रहते हुए अपनी राह जुदा करते है और दुनियां के लिए मिसाल बन जाते है। बुलंदशहर के जिला अस्पताल की नर्सें बीते आठ महीनों से तीन ऐसे मरीजों की सेवा कर रही है, जिनका इस दुनियां में शायद कोई नहीं है।

बीमार आए ये तीनों मरीज उठने-बैठने से लाचार हैं। लेकिन इनकी छोटी-बड़ी जरूरत और डेली-रूटीन की गतिविधियां इन्हीं नर्सों के जिम्मे है।

जिला अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड के इस ब्लाक में तीन मरीज रहते है। एक का नाम मनीष दुबे है, लेकिन बाकी दो ऐसे है जिनका न तो नाम मालूम है और न पता। ये दोनों न तो बोलते है और न सुनते है। चलने-फिरने से लाचार है। अस्पताल में जब ये भर्ती हुए तो इन्हें बुखार था और सरकारी एम्बुलेंस इन्हें लावारिस हालत में पड़ा देखकर अस्पताल लाई थी।

कई महीने गुजर गये। ये तीनों अब जिला अस्पताल के मेहमान है। सुबह से लेकर शाम और फिर पूरी रात इनके खाने-पीने, नहाने-कपड़े पहनने और यहां तक की बाथरूम तक की जिम्मेदारी जिला अस्पताल की नर्सों ने उठा रखी है। खुद को बैंगलोर का रहने वाला मनीष दोनों टूटे पैरों के साथ अस्पताल आया था।

पैरों की हड्डियां तो जुड़ गईं, लेकिन शारीरिक कमजोरी की वजह से वह उठने-बैठने में लाचार है। उसके घर सम्पर्क करने की कोशिशें भी हुईं, लेकिन उसकी खैर-खबर लेने कोई नहीं आया। मरीजों की सेवा कर रही जिला अस्पताल की नर्स मेहा ने बताया किस तरह वह लोग इनकी सेवा करती हैं और अपनी ड्यूटी पूरी ईमानदारी से करती हैं।

मनीष के साथ रह रहे बाकी दो मरीजों के तो घर-परिवार का भी पता नहीं है। आठ महीने हो गए इसी हाल में। सुबह दैनिक क्रियाओं के बाद मरीजों को नहलाना, उन्हें कपड़े पहनाना, बैड के बिस्तर बदलना, उन्हें ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर देना, इन सब कामों का बीड़ा जिला अस्पताल की नर्सो ने उठा रखा है।

मरीजों को वक्त से दवा और इंजेक्शन देना भी नर्सो की जिम्मेदारी है। अस्पताल की इन नर्सों को मालूम है कि इन मरीजों का कोई परिजन भी अब इन्हें लेने नहीं आएगा, इसलिए अफसरों से विशेष अनुरोध करके उन्होंने इन मरीजों को अलग से ब्लॉक में शिफ्ट करा लिया। जिला अस्पताल में इन मरीजों की सेवा का आलम यह है कि देखने आश्चर्य करते हैं।

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