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योगी के गढ़ गोरखपुर में कांग्रेस के 'ब्राह्मण' कंडीडेट ने बढ़ाई बीजेपी और रवि किशन की मुश्किल!

योगी के गढ़ गोरखपुर में कांग्रेस के 'ब्राह्मण' कंडीडेट ने बढ़ाई बीजेपी और रवि किशन की मुश्किल!

गोरखपुर में बीजेपी प्रत्याशी रवि किशन (file photo)

गोरखपुर में बीजेपी प्रत्याशी रवि किशन (file photo)

गोरखपुर लोकसभा सीट पर निषाद नेताओं की हुई गोलबंदी और सवर्ण नेता आमने-सामने, उलझ गया चुनावी गणित

योगी आदित्यनाथ के गढ़ गोरखपुर में लोकसभा चुनाव की लड़ाई दिलचस्प हो गई है. कांग्रेस ने भी यहां पर 'ब्राह्मण दांव' चल दिया है. इसलिए बीजेपी की चुनौती और भोजपुरी अभिनेता रवि किशन की बेचैनी दोनों बढ़ गई है. अब बीजेपी की निगाह किसी तरह निषाद वोटरों को लुभाने पर है. बीजेपी नेता उम्मीद कर रहे थे कि उप चुनाव की तरह इस बार भी कांग्रेस शायद मुस्लिम प्रत्याशी उतारेगी. लेकिन उसने मधुसूदन तिवारी के रूप में ब्राह्मण कार्ड खेलकर महागठबंधन की राह पहले से थोड़ी आसान कर दी है.

ब्राह्मण-ठाकुर की जंग वाली इस सीट पर यह लड़ाई ‘जूताकांड’ के बाद अब और मजबूत हो गई है. ऊपर से एक ठाकुर प्रत्याशी के रूप में हिंदू युवा वाहिनी के बागी प्रदेश अध्यक्ष सुनील सिंह प्रवीण तोगड़िया की पार्टी हिंदुस्तान निर्माण दल के प्रत्याशी हैं. सवर्ण वोटरों का विभाजन कांग्रेस प्रत्याशी भी करेगा. गोरखपुर में हुए पिछले चार लोकसभा चुनाव का परिणाम देखें तो कांग्रेस कुछ खास नहीं कर पाई है. कांग्रेस यहां 18 से लेकर 45 हजार तक वोट तक ही लेती रही है. लेकिन गोरखपुर की सियासत के जानकार बता रहे हैं कि इस बार के समीकरण में इतना वोट भी बड़ा उलटफेर कर सकते हैं. (ये भी पढ़ें: ब्राह्मण-ठाकुर की राजनीति में कितना कारगर होगा बीजेपी का 'शुक्ला' दांव?)

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योगी के सीएम बनने के बाद हुए 2018 के उप चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी रहीं डॉ. सुरहिता करीम अपनी जमानत नहीं बचा पाई थीं. उन्हें सिर्फ 18,858 वोट मिले थे. 2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के शरदेंदू पांडे ने 33,477 वोट लिए थे. जबकि 2009 में इसके उम्मीदवार लालचंद निषाद को 30,262 वोट ही हासिल हुए थे. 2014 के चुनाव में उसके प्रत्याशी अष्ठभुजा प्रसाद त्रिपाठी को मोदी लहर में 45,719 वोट मिले. गोरखपुर के वरिष्ठ पत्रकार राजीव दत्त पांडे कहते हैं इस बार भी कांग्रेस को 50 हजार के आसपास वोट मिलने की संभावना है. कांग्रेस के इस दांव ने बीजेपी प्रत्याशी रवि किशन की बेचैनी बढ़ा दी है.

पांडे कहते हैं, मधुसूदन तिवारी यहां के जानेमाने वकील हैं. उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के सदस्य हैं. उनकी वकीलों में अच्छी पैठ है. कई मशहूर लोगों के वे केस लड़ते हैं. ऊपर से रवि किशन के बाहरी होने का मुद्दा. स्थानीय कार्यकर्ता को टिकट न मिलने का रोष...यह सब बीजेपी की मुश्किल बढ़ा रहा है.

पांडे के मुताबिक सपा-बसपा गठबंधन के प्रत्याशी रामभुआल निषाद का रास्ता कांग्रेस ने थोड़ा आसान कर दिया है. गोरखपुर की तीन विधानसभा सीटों पिपराइच, कैंपीयरगंज और सहजनवा में निषाद समुदाय की अच्छी संख्या है. पूर्व विधायक राजमती निषाद और उनके बेटे अमरेंद्र भी बीजेपी छोड़कर दोबारा सपा में आ गए हैं. 2014 में राजमती निषाद ही सपा प्रत्याशी थीं. उन्हें सवा दो लाख वोट मिले थे.

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गोरखपुर में करीब 20 लाख मतदाता हैं जिसमें से सबसे अधिक लगभग 4 लाख निषाद बताए जाते हैं. इसलिए इस उलटफेर में गोरखपुर के सियासी समीकरण तेजी से बदले हैं. हालांकि वरिष्ठ पत्रकार टीपी शाही का मानना है कि गोरखपुर में बीजेपी कहीं से कमजोर नहीं है. एक तरफ मोदी लहर है तो दूसरी ओर योगी का प्रभाव. सीएम के रूप में उन्होंने शहर को जो दिया है शायद ही कोई दे पाए.

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