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लोकसभा चुनाव 2019: संत कबीर की धरती पर कांग्रेस ने बढ़ाई अखिलेश यादव-मायावती की चुनौती!

लोकसभा चुनाव 2019: संत कबीर की धरती पर कांग्रेस ने बढ़ाई अखिलेश यादव-मायावती की चुनौती!

अखिलेश यादव और मायावती (फाइल फोटो)

अखिलेश यादव और मायावती (फाइल फोटो)

सपा से दो बार सांसद रहे भालचंद्र यादव को कांग्रेस का टिकट मिलने के बाद बदले समीकरण, आसान नहीं बसपा की राह!

योगी आदित्यनाथ के गढ़ पूर्वांचल की संत कबीर नगर लोकसभा सीट पर कांग्रेस ने महागठबंधन यानी मायावती और अखिलेश यादव की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. कांग्रेस ने यहां से पहले घोषित अपने प्रत्याशी को बदलकर समाजवादी पार्टी से सांसद रह चुके भालचंद्र यादव को मैदान में उतार दिया. इस सीट पर यादवों की अच्छी आबादी और उनमें भालचंद्र की पकड़ के कारण महागठबंधन की चुनौती बढ़ गई है. यादव के नाम की घोषणा से पहले बसपा-सपा के प्रत्याशी भीष्म शंकर उर्फ कुशल तिवारी का रास्ता आसान नजर आ रहा था.

अब गोरखपुर से सटी हुई इस सीट पर तीन पूर्व सांसदों की लड़ाई है. भालचंद्र यादव, कुशल तिवारी और प्रवीण निषाद. कुशल तिवारी इसी क्षेत्र से पहले सांसद रह चुके हैं. जबकि प्रवीण निषाद गोरखपुर के सांसद रहे हैं. प्रवीण अब इस सीट पर बीजेपी प्रत्याशी हैं. कांग्रेस ने संत कबीर नगर लोकसभा क्षेत्र से परवेज खान को टिकट दिया था. लेकिन ऐसा क्या हुआ कि अचानक उसने भालचंद्र पर भरोसा कर लिया? (ये भी पढ़ें: लोकसभा चुनाव 2019: पांचवें चरण में होगी बीजेपी, कांग्रेस की बड़ी परीक्षा, जीती सीटें बचाने की चुनौती!)

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गोरखपुर के वरिष्ठ पत्रकार टीपी शाही के मुताबिक, "भालचंद्र पूर्वांचल के बड़े सपा नेताओं में गिने जाते हैं. वो दो बार सांसद रह चुके हैं. बस्ती और संत कबीर नगर जिलों में सपा के जिलाध्यक्ष भी रह चुके हैं. जमीनी नेता माने जाते हैं, अपनी बिरादरी में उनकी पकड़ है. कुछ मुस्लिम भी उनके साथ हैं. इसके बावजूद इस बार यह सीट सपा-बसपा गठबंधन के चलते बसपा (बहुजन समाज पार्टी) के पास चली गई. बसपा ने इसी सीट से अपने सांसद रहे कुशल तिवारी को यहां से फिर मैदान में उतारा है. कुशल तिवारी हरिशंकर तिवारी के बेटे हैं. सीट खाली नहीं थी इसलिए भालचंद्र यादव नाराज हो गए. फिर यह नाराजगी बगावत में बदल गई."

हालांकि, पत्रकार राजीव दत्त पांडे मानते हैं कि संत कबीर नगर में सपा-बसपा गठबंधन का गणित मजबूत है. गठबंधन का टारगेट यादव, मुस्लिम और दलित वोट हैं, जबकि प्रत्याशी ब्राह्मण है. इसलिए चार जातियों की गोलबंदी को कोई कितना तोड़ पाएगा. भालचंद्र यादव की एंट्री के बाद गठबंधन वोट परसेंट जरूर थोड़ा कम हो सकता है, लेकिन चमत्कार हो जाए, तो ऐसा नहीं होने वाला है.

संत कबीर नगर को लोकसभा क्षेत्र के तौर पर 2008 में मान्यता मिली. 2009 में यहां पहली बार चुनाव हुए. जिसमें कुशल तिवारी ने बीजेपी के शरद त्रिपाठी (जिन्होंने अपनी ही पार्टी के एक विधायक की पिटाई कर दी थी) को 29,496 मतों के अंतर से हरा दिया था. कुशल तिवारी को इस चुनाव में 2,11,043 वोट मिले थे. जबकि 2014 के चुनाव में शरद त्रिपाठी ने कुशल तिवारी को हराया. 2009 से पहले यह खलीलाबाद सीट के रूप में अस्तित्व में थी.

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फिलहाल, संत कबीर नगर लोकसभा क्षेत्र में खजनी, आलापुर, मेंहदावल, खलीलाबाद, धनघटा विधानसभा क्षेत्र आते हैं. इन सभी पर बीजेपी का कब्जा है. यह बीजेपी प्रत्याशी प्रवीण निषाद के लिए प्लस है. लेकिन इस संसदीय क्षेत्र में मुस्लिमों की आबादी करीब 23 फीसदी है़ और यादव भी मजबूत स्थिति में हैं. इसलिए सपा-बसपा गठबंधन और कांग्रेस प्रत्याशी भालचंद्र यादव भी समीकरण बनाते-बिगाड़ते नजर आ रहे हैं.

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