Loksabha election 2019: कांग्रेस के इस दांव ने यूपी में किसके लिए बढ़ाई मुश्किल?

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: March 9, 2019, 4:36 PM IST
Loksabha election 2019: कांग्रेस के इस दांव ने यूपी में किसके लिए बढ़ाई मुश्किल?
यूपी में क्या है कांग्रेस की रणनीति?

'सपा-बसपा के पुराने नेताओं को अपनी ओर करना कांग्रेस की मजबूरी है. क्योंकि उसे यूपी में फिर से पैर जमाने के लिए मजबूत लोग चाहिए. इसलिए वो दूसरी पार्टियों से नाराज नेताओं को अपने पाले में कर रही है.'

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कांग्रेस के बाद समाजवादी पार्टी ने भी अपने प्रत्याशी यूपी की लोकसभा सीटों पर उतारने शुरू कर दिए हैं. कांग्रेस ने जिन 11 सीटों पर प्रत्याशी उतारे हैं उनमें से कुछ पारंपरिक रूप से सपा-बसपा की हैं. अब इन्हीं सीटों को लेकर गठबंधन और कांग्रेस के बीच तनातनी बढ़ती दिख रही है. ऐसी सीटों में बदायूं भी शामिल है. सियासी विश्लेषकों का कहना है कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के इस दांव से सपा-बसपा गठबंधन की परेशानी बढ़ गई है.

कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी और सोनिया गांधी के अलावा जिन नौ नेताओं को 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए प्रत्याशी बनाया है उनमें दो ऐसे हैं जिनका सियासी सफर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से शुरू हुआ था. दिलचस्प बात ये है कि कांग्रेस ने इन दोनों को उन्हीं सीटों पर टिकट दिया है जो सपा-बसपा गठबंधन में बसपा के खाते में आई हैं. कांग्रेस की इस रणनीति से गठबंधन के नेता बेचैन हैं. लेकिन सत्ताधारी बीजेपी के लिए दोनों की यह तनातनी फायदा दिलाती नजर आ रही है.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पश्चिमी यूपी के प्रभारी ज्योतिरादित्य सिंधिया ने साफ कर दिया है कि कांग्रेस यूपी में अपने दम पर लोकसभा चुनाव लड़ेगी. उधर, सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा है कि अमेठी और रायबरेली सीट कांग्रेस के लिए छोड़ी गई हैं.

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कानपुर देहात की अकबरपुर सीट पर कांग्रेस ने राजाराम पाल को प्रत्याशी बनाया है. पाल यहीं से 2009 में कांग्रेस की टिकट पर सांसद बने थे. 2014 की मोदी लहर में वो हार गए थे. यह कुर्मी और पाल बहुल सीट है. जातीय समीकरण के हिसाब से पाल पर ही कांग्रेस ने फिर से दांव खेला है. इस सीट पर बसपा प्रमुख मायावती तीन बार सांसद रह चुकी हैं. पाल ने अपना सियासी सफर बसपा से शुरू किया था.  (ये भी पढ़ें: क्या मुस्लिम बीजेपी को वोट नहीं देते, आंकड़ों में देखिए सच क्या है?)

इसी तरह बृजलाल खाबरी जालौन (सु.) से कांग्रेस के प्रत्याशी होंगे. वो बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से होते हुए कांग्रेस में आए हैं. बुंदेलखंड में बसपा के कर्ताधर्ता रहे हैं. वो 1999 में बसपा की टिकट पर जालौन से ही सांसद चुने गए थे. इस बार गठबंधन में यह सीट बसपा के खाते में गई है.

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दूसरी ओर समाजवादी पार्टी की एक सीट पर कांग्रेस ने पूर्व समाजवादी को ही उतार दिया है. सलीम इकबाल शेरवानी बदायूं सीट से पांच बार सांसद रह चुके हैं. जिनमें से चार बार समाजवादी पार्टी से सांसद बने और एक बार कांग्रेस से. केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं. राजीव गांधी के नजदीकी रहे हैं. स्वास्थ्य और विदेश राज्य मंत्री रह चुके हैं.

फिलहाल बदायूं से समाजवादी पार्टी के धर्मेंद्र यादव सांसद हैं और इस सीट पर कांग्रेस ने शेरवानी को अपना प्रत्याशी बना दिया है. समाजवादी पार्टी ने भी यहीं से धर्मेंद्र यादव को 2019 के लिए प्रत्याशी घोषित करके मुकाबला दिलचस्प बना दिया है.

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दूसरी ओर, सपा ने बहराइच से शब्बीर वाल्मीकि को उतार दिया है. जबकि यहां से कांग्रेस वर्तमान सांसद सावित्रीबाई फुले को टिकट देने की तैयारी में है. सावित्रीबाई फुले हाल ही में बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुई हैं. फुले भी पुरानी बसपाई रह चुकी हैं.

वरिष्ठ पत्रकार टीपी शाही कहते हैं "सपा-बसपा गठबंधन और कांग्रेस के बीच यूपी को लेकर जिस तरह से तनातनी चल रही है उसे देखते हुए तो नहीं लगता कि कांग्रेस अब गठबंधन में शामिल होगी. कांग्रेस ने 2017 का यूपी विधानसभा चुनाव सपा के साथ मिलकर लड़ा था. लेकिन उसे इसका कोई फायदा नहीं हुआ. इसलिए अब वो गठबंधन की बजाय अकेले लड़ रही है."

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शाही कहते हैं, "सपा-बसपा के पुराने लोगों को लेना कांग्रेस की मजबूरी है. क्योंकि उसे यूपी में फिर से पैर जमाने के लिए मजबूत लोग चाहिए. इसलिए वो दूसरी पार्टियों से नाराज नेताओं को अपने पाले में कर रही है. वो तीन दशक से यूपी की सत्ता से बाहर है. दरअसल, कांग्रेस लोकसभा के साथ-साथ 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव को देखते हुए भी अपने दांव चल रही है." हालांकि कुछ विश्लेषकों का कहना है कि ये सियासत है और इसमें पर्चा दाखिल करने से पहले कुछ भी हो सकता है.

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First published: March 9, 2019, 3:30 PM IST
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